उप चुनाव में होगा विपक्ष की रणनीति का इम्तिहान सीटें बचाने के लिए पूरा जोर लगाएगी भाजपा

यूपी में आसान नहीं होगा सपा और बसपा का एक मंच पर आना
गोरखपुर और फूलपुर सीट बचाने के लिए भाजपा बना रही रणनीति
देश की चार लोकसभा सीटों पर होगा उपचुनाव जल्द जारी होगी अधिसूचना

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। विधान परिषद की रिक्त सीटों पर उप चुनाव में भले ही विपक्ष के पास सत्ता पक्ष को चुनौती देने का कोई मौका न रहा हो लेकिन प्रदेश की दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट के लिए होने वाले उप चुनाव में विपक्ष के पास पर्याप्त अवसर होंगे और सही मायने में ये उप चुनाव विपक्ष की रणनीति का इम्तिहान होंगे। विपक्ष यदि उप चुनाव में संयुक्त प्रत्याशी उतारता है तो यह अगले लोकसभा चुनाव के लिए सत्ता पक्ष को बड़ा संदेश होगा।
विधान परिषद के लिए पांच सीटों पर निर्विरोध निर्वाचन के बाद अब प्रदेश में भाजपा का पूरा ध्यान उपचुनाव पर है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव में भी यूपी के उप चुनाव का प्रभाव देखने को मिला था। पूर्वांचल की गोरखपुर और फूलपुर लोकसभा सीटों पर उप चुनाव होना है। गोरखपुर सीट से मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और फूलपुर सीट से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य इस्तीफा देंगे क्योंकि दोनों नेता विधान परिषद के लिए निर्वाचित हो चुके हैं। विधान परिषद के सदस्य के रूप में शपथ ग्रहण के 14 दिन के भीतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ ही उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को भी सांसद पद से इस्तीफा देना होगा। इनका लोकसभा में उनका कार्यकाल मई 2019 तक है इसलिए दोनों सीटों पर उपचुनाव भी तय है।
लोकसभा की ये दोनों सीटें प्रदेश की राजनीति के लिहाज से काफी महत्वपूर्ण हैं। गोरक्षपीठ से जुड़ी गोरखपुर और नेहरू परिवार से जुड़ी होने के नाते फूलपुर सीट का ऐतिहासिक महत्व है। भाजपा इन दोनों सीटों को किसी भी हाल में हाथ से फिसलने नहीं देगी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ 1998 से गोरखपुर सीट पर लगातार लोकसभा का चुनाव जीत रहे हैं जबकि उसके पहले 1989, 1991 और 1996 में इस सीट पर ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ ने चुनाव जीता था। अवेद्यनाथ 1970 में अपने गुरु महंत दिग्विजय नाथ के ब्रह्मलीन होने के बाद हुए उप चुनाव में भी सांसद चुने गए थे। दिग्विजय नाथ 1969 में इस सीट पर चुने गए थे। गोरखपुर सीट मुख्यमंत्री से जुड़ी है इसलिए चुनौती भी कुछ ज्यादा ही है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव के समय भाजपा ने इन सभी समीकरणों को ध्यान में रखते हुए गोरखपुर के ब्राह्मण नेता शिवप्रताप शुक्ल को केंद्र में वित्त राज्य मंत्री बनाया है। इस सीट पर भाजपा की जीत के लिए शिवप्रताप शुक्ल की भी प्रतिष्ठा लगेगी। 
फूलपुर सीट 2014 में भाजपा पहली बार जीती। नेहरू की विरासत वाली इस सीट पर समाजवादी पार्टी पहले जीत चुकी है। भाजपा का झंडा केशव मौर्य की अगुआई में ही फहरा। केशव प्रसाद मौर्य ने यहां ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। कांग्रेस ने क्रिकेटर मोहम्मद कैफ को उनके मुकाबले उतारा था। भाजपा के लिए दोनों सीटों पर अब लोकप्रिय उम्मीदवार चाहिए। दोनों सीटों के लिए इन दिनों पार्टी प्रत्याशी तलाश रही है।
राजनीतिक हल्कों में पिछले काफी समय से विपक्ष की एकजुटता की बात सुनने को मिल रही है। हालांकि बिहार की लालू प्रसाद की रैली में विपक्ष को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जरूर रैली में पहुंचे लेकिन बसपा सुप्रीमो मायावती इस रैली में नहीं गईं। पिछले दिनों यह भी कहा गया था कि फूलपुर से मायावती संयुक्त विपक्ष की उम्मीदवार हो सकती हैं, लेकिन इस लाइन पर अभी तक विपक्षी दल आगे बढ़ते नहीं दिखाई दे रहे हैं। बसपा और सपा के बीच तालमेल होगा, इसकी संभावनाएं काफी कम हैं लेकिन सपा और कांग्रेस एक मंच पर जरूर दिखाई दे सकते हैं।

फूलपुर से अपर्णा यादव हो सकती हैं भाजपा उम्मीदवार!
अभी तक यह सिर्फ कयासबाजी ही कही जाएगी कि मुलायम सिंह यादव की छोटी बहु यानि प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव फूलपुर से भाजपा की उम्मीदवार हो सकती हैं। हालांकि यह बात राजनीतिक क्षेत्रों में काफी पहले से चल रही है। अपर्णा यादव मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिल भी चुकी हैं और स्वयं मुख्यमंत्री भी अपर्णा के कान्हा उपवन पर जा चुके हैं लेकिन अपर्णा अभी तक भाजपा की सदस्य नहीं हैं। दरअसल समाजवादी पार्टी कुनबे की रार को देखते हुए इस चर्चा को बल मिला है। मायावती के फूलपुर सीट पर संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भाजपा यह गेम खेल सकती है।

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