कई सवाल खड़े कर गया न्यायिक अफसरों का सम्मेलन

वर्षों पुरानी व्यवस्थाओं पर आज की परिस्थितियों में बहस की जरूरत
बड़ा सवाल: मुख्यमंत्री को भी दूसरे राज्य का क्यों नहीं होना चाहिए
दो दिवसीय राज्य स्तरीय विधिक न्यायिक अधिकारियों का सम्मेलन संपन्न

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के नवीन भवन के सभागार में आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय विधिक न्यायिक अधिकारियों का सम्मेलन कई ऐसे सवाल छोड़ गया जिन पर भविष्य में बड़ी बहस हो सकती है। बलात्कार, ट्रैफिंकिंग की शिकार लड़कियों के मामले में संवेदनशील होने, गवाहों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने, न्यायिक अधिकारियों को कड़ा रवैया रखने ताकि वादकारी बार-बार मुकदमे में तारीख लेने से कतराएं जैसे कई अहम मामले उठे। सम्मेलन में यह भी कहा गया कि न्यायिक अधिकारियों की तरह मुख्यमंत्री भी दूसरे राज्य का होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के जज न्यायमूर्ति एके सिकरी ने कहा है कि अदालतें मुकदमों में अनावश्यक तारीखें बढ़ाने (एडजार्नमेंट) से बचें और एक कडक़ न्यायाधीश की छवि निर्मित करें, जिससे वादकारी तारीखें मांगने से परहेज करें। उन्होंने कहा कि जजों को बलात्कार, ट्रैफिंकिंग की शिकार लड़कियों के मामले में अत्यंत संवेदनशील और सहानुभूतिपूर्ण होने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में आप किस तरह से निस्तारण करते हैं यह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसके साथ ही उन्होंने गवाहों की सुरक्षा पर विशेष बल दिया।
सम्मेलन के समापन दिवस पर न्यायिक अधिकारियों ने ‘टै्रफिकिंग और व्यावसायिक सेक्सुअल शोषण के पीडि़त’ विषय पर न्यायमूर्तिगण व पैनल वक्ताओं से विचार-विमर्श किया। इस सत्र को पद्मश्री सुनीता कृष्णन ने भी सम्बोधित किया। उन्होंने बलात्कार पीडि़तों की विशिष्ट कमजोरियों को रेखांकित करते हुए आरोपियों के विरुद्ध न्यायपूर्ण निस्तारण पर बल दिया। उन्होंने बलात्कार पीडि़तों और ट्रैफिकिंग की शिकार महिलाओं के दर्द को रेखांकित करने वाले प्रस्तुतिकरण के साथ न्यायपालिका से आग्रह किया कि वह पीडि़तों के प्रति किए गए सामाजिक अन्याय को समाप्त करने की दिशा में कदम उठाएं।
‘पांच वर्षों में लंबित मुकदमों को समाप्त करने के एक्शन प्लान’ पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी और न्यायमूर्ति विक्रम नाथ जज इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा सत्र के सह अध्यक्ष न्यायमूर्ति एसएस चौहान ने उन मुकदमों के बारे में न्यायिक अधिकारियों को जानकारी दी जिन्हें जल्द से जल्द निस्तारित किया जा सकता है। वक्ताओं ने विशेषज्ञता और कार्य के समान वितरण पर जोर देते हुए कहा कि अनावश्यक तारीखें देने (एडजार्नमेन्ट) से पेंडेन्सी बढ़ती है इससे बचा जाना चाहिए। इस सत्र में पैनल वक्ताओं में न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा, न्यायमूर्ति हर्ष कुमार आदि शामिल थे।
सम्मेलन के पहले दिन सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायमूर्ति जस्ती चेलमेश्वर ने मुख्य न्यायाधीश के दूसरे प्रदेश का नियुक्त करने की चालीस साल पुरानी नीति पर बहस की जरूरत बताई। उन्होंने इशारों में उत्तर प्रदेश सरकार बनाम राजनारायण केस 1975 की चर्चा करते हुए कहा कि इसके बाद ही भारत सरकार ने सभी राज्यों के मुख्य न्यायाधीश उस राज्य से बाहर के नियुक्त करने की नीति बना दी। उन्होंने सवाल किया कि मुख्यमंत्री दूसरे राज्य का क्यों नहीं होना चाहिए।

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