डरिये की आप लखनऊ में हैं…

दिनदहाड़े बैंक के बाहर दस लाख की लूट

राजधानी में दिनदहाड़े लूट से खुली पुलिस के दावों की पोल
जब दिन में हो रही है ऐसी लूट तो कानून व्यवस्था का भगवान मालिक

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ । राजधानी में बदमाशों के हौसले इस कदर बुलंद है कि उन्हें यूपी पुलिस पर पूरा भरोसा है कि वह कोई भी घटना को अंजाम दें पुलिस उनका कुछ नहीं बिगाड़ पायेगी। ऐसा ही मामला अलीगंज में देखने को मिला। अलीगंज में एचडीएफसी बैंक की शाखा में व्यापारी अपने मुनीम के साथ दस लाख 20 हजार रुपए जमा कराने के लिए पहुंचा, लेकिन बदमाश शाखा के बाहर से ही पैसे लूटकर फरार हो गए। लूट की सूचना मिलते ही मौके पर आईजी रेंज जयनारायण सिंह, एसएसपी दीपक कुमार, एएसपी ट्रांसगोमती हरेंद्र कुमार, सीओ अलीगंज डॉ. मीनाक्षी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने बैंक में लगे सीसीटीवी फुटेज को चेक किया और पूछताछ की।
जानकारी के मुताबिक कृष्ण जीवन जो की व्यवसायी हैं, अपने ड्राइवर और नौकर के साथ आज सुबह अलीगंज के नेहरू वाटिका के पास स्थित एचडीएफसी बैंक की शाखा में रुपये जमा करने के लिए गए थे। बताया जा रहा है कि वह तीन बैग में रुपये भरकर ले गए थे। व्यवसायी और उनका ड्राइवर आगे बैंक में घुस गए। पीछे नौकर के हाथ में रुपयों से भरे बैग थे। सुबह करीब 10:20 बजे अपाचे बाइक सावर तीन बदमाश आये और बैग लूटकर फरार हो गए। नौकर ने शोर मचाया तब तक बदमाश आंखों से ओझल हो चुके थे। लूट की सूचना जैसे ही पीडि़त ने पुलिस कंट्रोल रूम को दी वैसे ही पुलिस महकमें में हडक़ंप मच गया। आनन फानन में मौके पर आईजी रेंज लखनऊ जय नारायण सिंह, एसएसपी, एएसपी ट्रांसगोमती, सीओ अलीगंज पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस अधिकारियों ने बैंक कर्मियों और व्यापारी से पूछताछ की। पुलिस ने बैंक और आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज भी खंगाले। वहीं शक के आधार पर पुलिस ने ड्राइवर और नौकर को हिरासत में लिया है, जिनसे पूछताछ की जा रही है। पुलिस ने अज्ञात बदमाशों के खिलाफ लूट का मुकदमा दर्ज कर मामले की पड़ताल शुरू कर दी है।

मंत्री जी, नगर निगम में करोड़ों का गोलमाल करने वाले अभियंता के खिलाफ कब होगी कार्रवाई

नगर निगम टेंडर की फाइल दबाने वाले अभियंता एसके जैन को बचाने में जुटे अफसर
निजी प्रचार एजेंसी से साठ-गांठ कर घोटाले को दिया था अंजाम
तत्कालीन अपर नगर आयुक्त अवनीश सक्सेना की जांच में दोषी पाए जाने के बाद मामले को दबा दिया

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। नगर निगम में घोटालेबाज अभियंताओं का रसूख चरम पर है। विभाग में तमाम घोटाले उजागर हो चुके हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर छोटे कर्मचारियों को बलि का बकरा बनाकर बड़े अफसरों को बचाया जा रहा है। ऐसा ही कुछ अधिशासी अभियंता एसके जैन के साथ है। जैन के काले कारनामों की जानकारी निगम के आला अफसरों को है लेकिन उनके रसूख के चलते अब तक उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसा नहीं है कि नगर निगम प्रशासन को इन घोटालों की जानकारी नहीं है। यदि यह कहें कि घोटालों को नगर निगम प्रशासन की सरपरस्ती में ही अंजाम दिया जाता है तो गलत नहीं होगा।
नगर निगम में बीते दो साल पहले प्रचार घोटाला हुआ था। इस घोटाले में अधिशासी अभियंता एसके जैन का नाम सामने आया था। विभागीय सूत्रों के अनुसार एसके जैन का रसूख ऊंचे अफसरों तक है। इसलिए आज तक उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। हांलाकि तत्कालीन अपर नगर आयुक्त विशाल भारद्वाज ने मामले की जांच अपर नगर आयुक्त अवनीश सक्सेना को सौंपी थी, जिसमें एसके जैन दोषी पाये गए थे। जांच रिपोर्ट नगर आयुक्त को भेज दी गई, लेकिन आगे की कार्रवाई के लिए जांच आख्या शासन को नहीं भेजी गई। कुल मिलाकर मामले को दबाने की कोशिश में सभी जुटे रहे। एसके जैन के कई ऐेसे कारनामे है जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। मालूम हो कि नगर निगम में वित्तीय वर्ष 2015 में चारबाग, आलमबाग व पॉलीटेक्निक फुट ओवर ब्रिज पर विज्ञापन का टेंडर नहीं कराया गया। टेंडर कराने की जिम्मेदारी एसके जैन की थी, लेकिन उन्होंने टेंडर न कराकर अपनी हितैषी एंजेसी इन एंड आऊट को टेंडर दिलाने के लिए उसका दो साल का विस्तारित कराने के लिए फाइल अफसरों को भेज दिया। सूत्रों के अनुसार इस एंजेसी को पहले भी नियम कानून को ताक पर रखकर प्रचार का ठेका दिया गया था। जब जिम्मेदार अफसरों ने इस मामले को आवंटन समिति के सामने पेश करने की बात फाइल मे लिखी तो जैन ने एजेंसी के मालिक से साठगांठ कर फाइल को दबा दिया। इस बीच नगर निगम के प्रचार विभाग में फाइल न मिलने से हडक़ंप मचा गया। काफी खोजबीन की गई तो फाइल एसके जैन के पास मिली।

टेंडर घोटाले के दोषियों पर नहीं हुई कार्रवाई

वर्ष 2015 में नगर निगम में टेंडर घोटाला प्रकाश में आया, जिसमें लिपिक राजेंद्र यादव ने प्रचार विभाग की मिलीभगत से टेंडर प्रकाशन में फर्जीवाड़ा किया। टेंडर अखबारों में छपवाने की बजाए अखबारों की डमी तैयार की गयी और उसी डमी को फर्जीवाड़ा करने के लिए फाइलों में लगाया गया। इस फर्जीवाड़े में तमाम चहेते ठेकेदारों को नगर निगम से काम दिलाया गया, जिसमें तमाम अभियंताओं की मिली भगत होने का मामला प्रकाश में आया। इस मामले में बाबू राजेंद्र यादव को निलंबित कर दिया गया और संबंधित अभियंताओं के खिलाफ जांच बैठा दी। जांच के दौरान तीन जांच अधिकारी बदले गए, तब जाकर जांच पूरी की गई। जांच रिपोर्ट शासन को भेज दी गई, लेकिन लम्बे समय से मामला शासन स्तर पर विचाराधीन है।

मेेरा तबादला अक्टूबर 2015 में हो गया था। इसलिए इस मामले में मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है। टेंडर कराने की जिम्मेदारी प्रचार विभाग की होती है। फिर भी अगर मेरा दोष है तो हमसे रिकवरी करा लें।
-एसके जैन, अधिशाषी अभियंता, नगर निगम

मार्च 2015 खत्म होने तक फुटओवर ब्रिज का टेंडर हो जाना चाहिए था, लेकिन फाइल प्रचार विभाग को भेजी नहीं गई। यह फाइल हमको अक्टूबर 2015 में मिली। इससे पहले फाइल अधिशासी अभियंता एसके जैन के पास थी। चंूकि फाइल छह माह बाद मिली तब तक टेंडर का समय निकल चुका था। इसलिए फरवरी 2016 में टेंडर कराया गया। टेंडर की फाइल न मिलने के कारण नगर निगम को एक फुट ओवर ब्रिज से लगभग 24 लाख का नुकसान हुआ। इस वित्तीय क्षति का दोषी कौन है इसकी जिम्मेदारी नगर आयुक्त को तय करना है।
-अशोक सिंह, प्रचार प्रभारी, नगर निगम

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