छवि चमकाने की चतुर चाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तीसरा मंत्रिपरिषद्-विस्तार एकाधिक कारणों से चर्चा में है। मोदीजी की यह खूबी है कि वे अपने फैसलों को बहुचर्चित बना देते हैं। नोटबंदी के बारे में रिजर्व बैंक की रिपोर्ट आने के बाद उनकी चौतरफा आलोचना हो रही थी। मंत्रियों से लेकर सरकार और भाजपा का पूरा प्रचार तंत्र इसकी प्रभावी काट नहीं कर पा रहा था। मंत्रिपरिषद् में फेरबदल ने एक झटके में सरकार की नकारात्मक चर्चा को बंद करा दिया। विरोधी दल और मोदी के आलोचक भी एक परिवर्तन की प्रशंसा करने को बाध्य हुए हैं कि पहली बार एक महिला को पूर्णकालिक रक्षा मंत्री बनाया गया है।
क्या मोदीजी ने छुट्टी के दिन और अपनी विदेश यात्रा की सुबह अपनी टीम में बदलाव इसीलिए किया? मंत्रिपरिषद् में बदलाव की चर्चा कुछ दिन पहले से थी। कुछ मंत्रियों को हटाने, पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नियुक्त करने और नये सहयोगी दलों, जद(यू) एवं अन्नाद्रमुक को केंद्रीय मंत्रिपरिषद् में शामिल करने की खबरें चल रही थीं। कहा जा रहा था कि प्रधानमंत्री अपने विदेश दौरे से लौटकर यह बदलाव करेंगे। राष्ट्रपति को भी उत्तर-पूर्व के दौरे पर निकलना था। तो भी प्रधानमंत्री ने रविवार की सुबह शपथ-समारोह करवा लिया। सहयोगी दलों के बिना फेरबदल की जल्दबाजी के क्या कुछ निहितार्थ नहीं निकाले जा सकते?
जो भी हो, एक झटके में कुछ मंत्री नालायक साबित हो गये, कुछ तारीफें पाकर प्रोन्नत हो गये और दक्षिण भारत के ‘तीन राज्यों की प्रतिनिधि’ निर्मला सीतारमण रक्षा मंत्री की कुर्सी पाकर ‘स्टार’ बन गयीं। यह बदलाव प्रधानमंत्री को करना ही था। सरकार बने तीन साल से ऊपर हो चुके हैं। साल 2019 का चुनाव बहुत दूर नहीं है। ‘स्वच्छ भारत’, ‘नमामि गंगे’, ‘कौशल विकास’ से युवाओं को रोजगार देने, जैसी अपनी प्रिय योजनाओं के खाते में वास्तविक उपलब्धियों के नाम पर उनके पास ज्यादा कुछ नहीं है।
सरकारी आंकड़ों और खूबसूरत विज्ञापनों की बात अलग, मगर अर्थव्यवस्था संकट में है और किसानों-युवाओं में असंतोष है। सो, मोदीजी को सरकार की कमर कसना जरूरी लगने लगा था।
कुछ मंत्रियों को हटाकर, कुछ को महत्व कम करके चेतावनी देकर और कुछ को बड़ा दर्जा देकर प्रधानमंत्री ने जनता से लेकर अपनी पार्टी तक को कुछ साफ संदेश दे दिये हैं। यह कि, सरकार पर उनकी जबरदस्त पकड़ है, कि मंत्रियों के काम-काज पर वे कड़ी नजर रखते हैं, कि काम करना एवं नतीजे देना उनका लक्ष्य है, कि नाकामयाबी और ढीला-ढाला रवैया उन्हें बर्दाश्त नहीं, कि कड़े फैसले लेने में उन्हें कतई संकोच नहीं है।
चूंकि पार्टी और सरकार पर मोदीजी का पूर्ण नियंत्रण है, इसलिए हटाये या घटाये गये मंत्री नहीं पूछ सकते कि जो काम नहीं हुए या जो योजनाएं बहुत सुस्ती से चलीं, उनके लिए हम ही अकेले क्यों दोषी हैं। मसलन, राजीव प्रताप रूडी सवाल उठाने का साहस नहीं कर सकते कि प्रधानमंत्री जी, कौशल विकास आपका विजन था, यह मंत्रालय आपने ही बनवाया, इसलिए इसे चलाने में आपके मार्गदर्शन की बहुत जरूरत थी और अगर पिछले तीन साल में उसकी प्रगति संतोषजनक नहीं थी, तो आपने दिशा क्यों नहीं दिखायी? उमा भारती भी प्रश्न पूछ सकती हैं कि सारा दोष साध्वी के सिर ही क्यों डाल दिया गया, महोदय?
भाजपा में नहीं पूछे जा सकते, लेकिन नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को देखते हुए ये प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। साल 2014 में सरकार गठन के समय का एक वाकया हम यहां याद दिलाना चाहेंगे। तब अपने मंत्रालयों का कार्यभार संभालते ही मोदीजी के कई मंत्री अपनी-अपनी पसंद के अधिकारियों को अपना निजी सचिव तैनात करने लगे थे।
यह पता चलते ही मोदीजी ने निर्देश जारी कर मंत्रियों को ऐसा करने से मना कर दिया। सभी मंत्रियों के साथ अधिकारियों की तैनाती प्रधानमंत्री कार्यालय से की गयी। गृह मंत्री राजनाथ सिंह तक को अपना पसंदीदा अधिकारी हटाना पड़ा था। इस उदाहरण से दो बातें साफ हैं। एक, मोदीजी अपने मंत्रियों को ज्यादा छूट न देकर खास अनुशासन में रखते हैं और दो, अधिकारियों की मार्फत उन पर कड़ी नजर रखी जाती है। वे टीम लीडर से ज्यादा रिंग लीडर के रूप में काम करते हैं। विभिन्न मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनकी अक्सर होनेवाली बैठकें गवाह हैं कि वे अफसरों पर बड़ा भरोसा करते हैं। उन्हीं को निर्देश देते और रिपोर्ट लेते हैं।
कहा यह भी जाता है कि उनकी बैठकें मंत्रियों के साथ कम, अफसरों के साथ ज्यादा होती हैं. स्वच्छ भारत और नमामि गंगे जैसी अपनी प्रिय योजनाओं की देख-रेख तो वे अपने कार्यालय की मार्फत कराते ही रहते हैं। यह अकारण नहीं कि चार पूर्व-अधिकारियों को भी इस फेरबदल में मंत्री बनाया गया है।
मोदीजी के कुछ मंत्री अपेक्षाकृत तेज और कुछ सुस्त हो सकते हैं, कार्यशैली भी उनकी अलग-अलग होगी, लेकिन सफलता-विफलता अकेली उनकी नहीं हो सकती। प्रधानमंत्री का भी उसमें बराबर हिस्सा होगा। अगर पास-फेल के रूप में परिणाम जारी किया गया है, तो उसके मायने सियासी ही हैं।
निर्मला सीतारमण और धर्मेंद्र प्रधान ने बेहतर काम अवश्य किया होगा, लेकिन उन्हें प्रथम श्रेणी देने का सीधा मतलब दक्षिण के राज्यों और ओडि़शा में भाजपा की पैठ बढ़ाना है। उग्र और आपत्तिजनक बयानों के लिए कुख्यात अनंत कुमार हेगड़े को शामिल करने का उद्देश्य कर्नाटक में हिंदू-ध्रुवीकरण के अलावा और क्या हो सकता है। उत्तर भारत के जातीय समीकरणों पर तो ध्यान है ही।
प्रधानमंत्री ने मंत्रिपरिषद् का यह विस्तार बड़ी चतुराई से किया है। सरकार की विफलताओं या सुस्ती का जिम्मा कुछ मंत्रियों पर डालकर खुद अपनी छवि पर आंच नहीं आने दी है। जनता में मोदी की छवि तीन साल बाद भी बेहतर काम करने, फटाफट फैसले लेने और देश में बदलाव लानेवाले नेता की बनी हुई है।
भाजपा के लिए यह छवि चुनाव जिताऊ है, इसलिए अत्यंत जरूरी है। साल 2019 तक इसे अक्षुण्ण बनाये रखना है। केंद्र सरकार की धुली-पुछी छवि नयी इसीलिए गढ़ी गयी है। महिला को रक्षा मंत्री बनाने का चमत्कारिक एवं खुशनुमा फैसला इसमें चार-चांद लगाता है। आज मोदी राजनीति के सबसे चतुर खिलाड़ी हैं।

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