आदत का क्या करें साहब जी

लोगों की सेहत का जिम्मा उठा रहे बड़े साहब का रौब-दाब भी काम नहीं आ रहा है। औचक निरीक्षण की टेबलेट, वेतन काटने का इंजेक्शन और डांट का सिरप पिलाने के बाद भी मातहतों की सेहत में सुधार होता नहीं दिख रहा है। साहब सोच रहे है किस कुघड़ी में इस कुर्सी पर बैठा था। कहीं दूसरी जगह होता तो मौज मार रहा होता। स्वाइन फ्लू और डेंगू ही परेशान करने के लिए काफी थे। यहां तो मातहत तक गंभीर बीमारी से कम नहीं है। लाख कहो लेकिन करेंगे अपने मन की। इनको कौन समझाए अरे भाई ऊपर से दबाव है जरा सहयोग कर दो। लेकिन नहीं ये करेंगे अपनी मर्जी की। नियम-कायदों की परवाह ही नहीं। न मरीजों की चिंता है। बस सुबह से शाम तक मटरगश्ती करने में रहते हैं। अस्पताल को घर बना लिया है जब चाहे आते हैं। लेकिन हाय रे किस्मत साहब की व्यथा कोई समझने को राजी नहीं। अब साहब जी को कौन समझाए यह आदत आज की नहीं है जी।

मैडम की माया पर डाका

हाथी वाली मैडम आजकल कमल वालों से परेशान हैं। देश की सबसे बड़ी पंचायत की कुर्सी भी उन्होंने छोड़ दी लेकिन फिर भी कमल वाले मान नहीं रहे और मैडम की माया यानि वोट बैंक पर डाका डालने पर लगे हैं। जैसे-तैसे मैडम ने इन्हें इकट्ठा किया और इसी वोट के बूते एक बार नहीं बल्कि कई बार सूबे की सत्ता हथियाई, लेकिन अब कमल दल वाले इसमें सेंध लगा रहे हैं। मैडम परेशान हैं, आखिर वह अपने मन की बात किससे कहें। चारा वाले नेताजी से कुछ उम्मीद बंधी थी कि आगे की नैया वे पार लगा देंगे लेकिन वहां साइकिल वालों ने बात बिगाड़ दी।

अपने ही बुने जाल में फंसे दाढ़ी वाले वजीर

उधर टीपी नगर मेट्रो स्टेशन पर देश के गृहमंत्री और सूबे के वजीरेआला और कैबिनेट के तमाम मंत्री मेट्रो को झंडी दिखा रहे थे, इधर दाढ़ी वाले एक काबीना मंत्री जाम में फंस गए और वे मेट्रो को झंडी दिखाने वाले कार्यक्रम में ही नहीं पहुंच सके। मंत्री जी की गाड़ी रास्ते में जाम में फंसी रही। अब मंत्री जी किसी से यह भी नहीं कह सकते क्योंकि राजधानी के रास्तों में हो रहे अतिक्रमण को हटवाने की जिम्मेदारी भी इन्हीं के पास है। अगर अतिक्रमण न होता तो इतना जाम न लगता और मंत्री जी भी झंड़ी दिखाने वाले कार्यक्रम के गवाह बन ही जाते।
मेट्रो को लेकर जमकर धत्त तेरी की हो रही है। कमल और साइकिल वाले बांहे चढ़ाएं एक दूसरे पर पिल पड़े हैं। कमल दल वाला कह रहा है मेरी मेट्रो है। साइकिल वाला पूछ रहा है तेरी कैसे हुई। इसका काम शुरू कराने से लेकर उद्घाटन करने तक का काम हमने किया है। जनता की गाढ़ी कमाई का सदुपयोग किया जी। सीने पर पत्थर रखकर करोड़ों खर्च कर दिए। आप तो न तीन में हंै न तेरह में हंै। अचानक अब कहां से टपक पड़े भाई। कमल दल वाला भी कहां चुप रहता। लगा खखारने। पूरी भीड़ जुटा ली। साइकिल वाले को समझाने लगा। बड़े आए हो मेट्रो वाले। यह मेरी मेट्रो है क्योंकि इसे हरी झंडी दिखाकर हमने रवाना किया है जनाब। आप तो काम बीच में ही छोडक़र चलते बने थे। अब आपही बताइए जनता जी किसकी मेट्रो है। जनता क्या बताए। वह तो मेट्रो का सफर करते हुए झगड़े का आनंद ले रही है जी।

साहब के चक्कर में घनचक्कर हुए

राजधानी के विकास का जिम्मा संभालने वाले विभाग के छोटे साहब के रंग-ढंग से इन दिनों मातहतों की हवा गुम है। बेचारे समझ नहीं पा रहे हंै, साहब की आंख में कैसे धूल झोंके। क्या करे, कहां जाए। एक दिन हो तो गच्चा दे दें, यहां तो रोज आमना-सामना होना है जी। काम में मन नहीं लगता और साहब है कि हर मिनट का हिसाब मांगने बैठ जाते हैं। काम न करने की आदत आज की तो लगी नहीं है जो तुरंत छोड़ दें। पुरानी आदत है जाते-जाते जाएगी। किसी ने पहले इस तरह हिसाब मांगा होता तो हम भी चुस्त-दुरूस्त रहते। लेकिन साहब मातहतों की चिंता से बेखबर हर समय रगड़े रहते हैं। यह किया, वह किया। यह क्यों किया। ऐसे सवालों सेे कई मातहत इस कदर परेशान हैं कि उनकी पैंतरा देने वाली बुद्धि भी घास चरने चली गई है। बहानों का बल्ब फ्यूज हो चुका है। एक को तो ऐसा झटका लगा है कि बेचारे को भूलने की बीमारी हो गई है। लेकिन पता यह चला है कि इस मातहत ने भूलने की बीमारी का एकदम नया पैंतरा आजमाया है। शायद साहब गच्चा खा जाए।

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