विकास की दौड़ में देश आगे पर कुपोषण अब भी बड़ी समस्या

Captureकिसी भी समाज की खुशहाली का अनुमान उसके बच्चों और माताओं को देख कर लगाया जा सकता है। पर जिस समाज में हर साल तीन लाख बच्चे एक दिन भी जिंदा नहीं रह पाते और करीब सवा लाख माताएं हर साल प्रसव के दौरान मर जाती हैं, उस समाज की दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। जब देश में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कोई कमी नहीं है, तब ऐसा होना शर्मनाक ही नहीं एक घृणित अपराध है। कुपोषण के मामले में भारत दक्षिण एशिया का अग्रणी देश बन गया है।
भारत की बढ़ती जनसंख्या में बच्चे कुपोषण के कारण मर जाते हैं। यहां के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जहां कुपोषण एक तरह से जीवन का हिस्सा बन गया है। इस क्षेत्र के बच्चे या अन्य क्षेत्रों के कुपोषित बच्चे अगर बच भी जाते हैं, तो उपयुक्त पोषण न मिल पाने के कारण उनके शरीर और दिमाग को काफी हानि पहुंच चुकी होती है। 5 वर्ष से कम उम्र के लगभग 4 करोड़ 40 लाख बच्चों का विकास कुपोषण के कारण अवरूद्ध हो जाता है। वे पढ़ाई नहीं कर पाते और जल्दी ही जीविकोपार्जन में लग जाते हैं।
भारत सरकार की एजेंसी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के ताजा आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 93.4 लाख बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं। स्वास्थ्य राज्य मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते ने अप्रैल माह में राज्यसभा में अपने लिखित जवाब में बताया था कि देशभर के 25 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों में कुल मिलाकर 966 पोषण पुनर्वास केंद्र हैं। उन्होंने साल 2015-16 में 93.4 लाख कुपोषित बच्चों में से 10 प्रतिशत को चिकित्सा सम्बंधी जटिलताओं के वजह से पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती की जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने राज्यसभा में यह भी बताया था कि 2015-16 में लगभग 1,72,902 बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराया गया था। उनमें से 92,760 को सफलतापूर्वक बचाया गया था। फग्गन सिंह ने बताया कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत पोषण पुनर्वास केंद्र की स्थापना सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं में की गई है, ताकि गंभीर रूप से कुपोषण से ग्रस्त और चिकित्सीय जटिलताओं वाले बच्चों के इलाज और प्रबंधन के लिए उन्हें भर्ती कराया जा सके। बच्चों को परिभाषित प्रवेश मानदंडों के अनुसार भर्ती कराया जाता है और चिकित्सा और पोषण चिकित्सीय देखभाल की भी सुविधा दी जाती है। आंकड़ों के संदर्भ में वे कहते हैं गंभीर कुपोषण से ग्रस्त बच्चों के रोग प्रबंधन के लिए सेवाएं और देखभाल प्रदान की जाती हैं। जिसमें बच्चे की 24 घंटे की देखभाल और निगरानी, चिकित्सा सम्बंधी जटिलताओं का उपचार, चिकित्सीय भोजन, भावनात्मक देखभाल प्रदान करना, परिवार का सामाजिक आकलन कर जरूरी योगदानों को उन तक पहुंचाना शामिल है।
एक रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के 2015-16 आंकड़ों में कहा गया है कि बिहार में छह से 23 महीने के 10 में से 9 बच्चों को पर्याप्त मात्रा में पोषण नहीं मिल पाता है। केन्द्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की देख-रेख में हुए सर्वे में पता चला है कि बिहार में सिर्फ 7.5 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार और पोषण मिल पाता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के आंकड़ों पर आधारित गैर सरकारी संगठन ‘चाइल्ड राइट एंड यू क्राय’ के अध्ययन में पता चला है कि उत्तर प्रदेश में भी 10 में से 9 बच्चों को पर्याप्त आहार और पोषण नहीं मिलता। राज्य में महज 5.3 प्रतिशत बच्चों को ही पर्याप्त आहार और पोषण मिल पाता है। यह आंकड़ा पूरे देश में सबसे कम है। अध्ययन में यह बात भी सामने आई है कि उत्तर प्रदेश में जन्म के पहले घंटे में चार में से तीन बच्चों को मां का दूध नहीं मिल पाता। राज्य में जन्म लेने वाले छह से 59 महीनों के दो तिहाई बच्चे एनीमिया के शिकार होते हैं।
यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुपोषण के कारण पांच साल से कम उम्र के करीब दस लाख बच्चों की हर साल मौत हो जाती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कुपोषण को चिकित्सीय आपातकाल करार दिया जाए क्योंकि ये आंकड़े अति कुपोषण के लिए आपातकालीन सीमा से ऊपर हैं। कुपोषण की समस्या हल करने के लिए नीति बनाने और उसके क्रियान्वयन के लिए पर्याप्त बजट की आवश्यकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुपोषण के शिकार बच्चों की संख्या भारत में दक्षिण एशिया के देशों से बहुत ज्यादा है। भारत में अनुसूचित जनजाति 28 फीसदी, अनुसूचित जाति 21 फीसदी, अन्य पिछड़ा वर्ग 20 फीसदी और ग्रामीण समुदायों 21 फीसदी में कुपोषण के सर्वाधिक मामले पाए जाते हैं। राजस्थान के बारां और मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक नए अध्ययन से पता चला है कि देश के गरीब इलाकों में बच्चे ऐसी मौतों का शिकार होते हैं, जिन्हें रोका जा सकता है। यह रिपोर्ट कुपोषण की स्थिति पर रोशनी डालती है। इसमें उन स्थितियों का विश्लेषण किया गया है, जिन्हें रोका जा सकता है, पर इसके कारण भारत में नवजात शिशुओं और बच्चों की मौत होती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे की तीसरी रिपोर्ट के अनुसार चालीस प्रतिशत बच्चे ग्रोथ की समस्या के शिकार हैं, साठ फीसद बच्चों का वजन कम है। इस समस्या के समाधान के लिए युद्ध स्तर पर रणनीति बनाना जरूरी है।

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