जन-प्रतिनिधियों का वेतन

Captureतमिलनाडु विधानसभा ने हाल ही में अपने विधायकों का वेतन दोगुना करने के पक्ष में मतदान किया। भारत ने साल 2015 में हर सांसद को हर महीने 2.7 लाख रुपये (वेतन और भत्ते मिला कर) का भुगतान किया। महाराष्ट्र विधानसभा ने 2016 में एक विधेयक पारित किया, जिससे इसके सदस्यों का वेतन बढ़ कर राष्ट्रपति के वेतन (1.5 लाख रुपये) से भी ज्यादा हो गया, जबकि दूसरी तरफ दिल्ली विधानसभा ने अपने मंत्री का वेतन 3.6 लाख रुपये महीना और एमएलए का 2.1 लाख रुपये करने का प्रस्ताव किया।
सैलरी शब्द की उत्पत्ति सैलेरियम से हुई है, जो साल्ट यानी नमक से बना है (प्लिनी द एल्डर, नेचुरल हिस्ट्री, 31वां संस्करण, 41)। प्राचीन ईरान में इसका अर्थ था- राजा की सेवा करना और उससे भरण-पोषण पाना।
जन प्रतिनिधियों को वेतन देने के पीछे भावना हमेशा उनकी भरपाई करने से जुड़ी रही है। लेकिन, कई बार यह भरपाई सीमा को लांघ जाती है। मसलन, नाईजीरिया ने साल 2013 से अपने कानून निर्माताओं को 1,89,500 डॉलर (प्रति व्यक्ति जीडीपी से 116 गुना ज्यादा) दिया, जबकि केन्या ने अपने सांसदों को 74,500 डॉलर (देश की प्रति व्यक्ति जीडीपी का 76 गुना) दिया (इकोनॉमिस्ट, 2013). लेकिन, केन्या के कानून निर्माताओं ने तो इंतेहा ही कर दी।
वर्ष 2010 में रैला ओडिंगा को देश की पार्लियामेंट द्वारा अपने वेतन में की गयी 25 फीसद की बढ़ोत्तरी के प्रस्ताव को खारिज करने पर मजबूर होना पड़ा। इस बढ़ोत्तरी से ओडिंगा पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा वेतन पानेवाले जन प्रतिनिधि बन जाते।
भारत की शुरुआत बहुत उम्मीद भरी थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली कैबिनेट बैठक में पूरी कैबिनेट ने देशके नागरिकों की तकलीफों को देखते हुए एक-राय से फैसला लिया था कि वे छह महीने तक अपना वेतन नहीं लेंगे।
ओडिशा की विश्वनाथ दास जैसी राजनीतिक शख्सियतें, जो कि रोजाना 45 रुपये लेने की हकदार थीं, यह कहते हुए कि उन्हें ज्यादा की जरूरत नहीं है, रोजाना सिर्फ 25 रुपये लेने का फैसला किया। तत्कालीन मद्रास असेंबली में वीआइ मुनईस्वामी पिल्लई ने किसानों की मुश्किलों को देखते हुए उनके समर्थन में 1949 में भत्ते में रोजाना 5 रुपये की कटौती का प्रस्ताव पारित कराया।
लेकिन, आज यह हाल है कि संसदीय प्रतिनिधियों ने बीते दो दशकों में हठ के साथ खुद की वित्तीय क्षतिपूर्ति में 1250 फीसद की बढ़ोत्तरी कर ली है- यह कदम नैतिक ईमानदारी पर सवाल खड़े करता है। आदर्श स्थिति तो यह होती कि ऐसे भत्ते देश के लिए की गयी उनकी सेवा के अनुपात में होते, लेकिन बीते दो दशकों में संसद ने देखा कि संसदीय समितियों द्वारा 50 फीसद से भी कम विधेयकों की स्क्रूटनी की गयी, जो कि संसद के असल मकसद को ही खत्म कर देता है।
धन विधेयक, जैसा कि आधार के मामले में हुआ, बिना समिति को भेजे पारित कर दिया जाता है. ऐसा करना किसी नीति से नहीं है, बल्कि राजनीति से प्रेरित है।
कई खांचों में सुधार की जरूरत है। इंटरनेशनल पार्लियामेंटरी यूनियन (आइपीयू) द्वारा साल 2013 में 96 देशों में 104 पार्लियामेंट में और 104 पार्लियामेंटरी चैंबर्स में किये गये सर्वे में पाया गया कि 54.8 फीसद मामलों में वेतन तयशुदा पैमाने-परंपरागत रूप से सिविल सेवा (फ्रांस, जापान) या मंत्रालय के वेतन से जुड़ा हुआ है। परिपक्व लोकतंत्र वाले देशों में संसदीय वेतन निर्धारित करने के लिए आमतौर पर स्वतंत्र संस्थाएं हैं- जैसे कि ऑस्ट्रेलिया में रेम्यूनरेशन ट्रिब्यूनल या फिर दक्षिण अफ्रीका में इंडिपेंडेंट कमीशन फॉर रेम्यूनरेशन फॉर पब्लिक ऑफिस बेयरर। वैश्विक आर्थिक मंदी को देखते हुए, आइपीयू की करीब 23.8 फीसद संसदों के वेतन में कमी आयी है।
यूके में हाउस ऑफ कॉमंस के एक सांसद का वेतन 74,962 पाउंड है। इसके साथ ही सांसद को अपने दफ्तर के खर्च के लिए 23,450- 26,100 पाउंड, कर्मचारी रखने के लिए 1,41,400-1,48,500 पाउंड, लंदन व अपने संसदीय क्षेत्र में रहने और संसद व संसदीय क्षेत्र में आने-जाने के लिए 20,610 पाउंड आवासीय भत्ता दिया जाता है।
सांसदों के भुगतान के लिए पेश की गयी रसीदें नियमित रूप से सार्वजनिक की जाती हैं. जून 2009 में साल 2005 से 2008 की अवधि के लाखों दस्तावेज और रसीदें जारी किये गये थे और ये आम लोगों के देखने के लिए भी उपलब्ध हैं (रिचर्ड केली, कॉमंस ब्रीफिंग पेपर्स, सीबीपी-7762, 2016)।
भारत के सांसदों को निजी क्षेत्र की तर्ज पर वेतन देने के बजाय, जनसेवकों द्वारा सार्वजनिक जीवन के लिए किये उनके त्याग के एवज में कृतज्ञतावश तर्कसंगत वेतन का भुगतान किया जाना चाहिए। सिर्फ आत्म-नियमन करना काफी नहीं है।
हमें सांसदों का वेतन तय करने के लिए एक अलग स्वतंत्र निकाय बनाने की जरूरत है। वेतन की समीक्षा का काम एक संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से संपन्न होना चाहिए। ऐसा नहीं है कि सांसदों को वेतनवृद्धि नहीं मिलनी चाहिए या उन्हें इसकी अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, लेकिन ऐसी वेतन वृद्धियां एक पारदर्शी और जिम्मेदार प्रक्रिया से तय होनी चाहिए। हालांकि, किसी को हमारी विधानसभाओं और संसद में भ्रष्टाचार की समस्या का समाधान भारी वेतनवृद्धि से हो जाने की आशा नहीं करनी चाहिए। वास्तव में भ्रष्टाचार का स्तर तत्कालीन नियम-कानूनों के दायरे में किसी शख्स की नैतिक बुनावट से तय होता है।
कार्य प्रदर्शन के आधार पर वेतन तय करने की मांग के बावजूद ‘प्रदर्शन’ की अलग-अलग व्याख्याओं को देखते हुए वेतन को प्रदर्शन से जोडऩा मुश्किल होगा। क्या संवैधानिक विधेयक पर चर्चा के बाद विधेयक के खारिज हो जाने को काम नहीं होना कहा जायेगा? संसदीय बैठकों में अनुपस्थिति एक जटिल समस्या बनी हुई, जिसका जवाब आसान नहीं है। सत्र में न्यूनतम उपस्थिति को वेतन से जोड़ कर इसका कुछ हद तक समाधान किया जा सकता है। कानून निर्माताओं के वेतन के साथ उचित भत्तों का जोडऩा और प्रासंगिक संस्थाओं में निवेश करना, हमारे संसदीय आदर्शों को कायम रखने के लिए हमेशा ही फायदेमंद रहेगा।

Pin It