चीन-भारत तनाव और बिम्सटेक बैठक के निहितार्थ

असली सवाल यह है कि क्या बिम्सटेक की बैठक से आने वाले दिनों में नेपाल समेत अन्य देशों से भारत के दोस्ताना संबंध और मजबूत होंगे? क्या यह बैठक चीन को कोई संदेश दे सकेगी? क्या एशिया में शांति बनाए रखने में बिम्सटेक के सदस्य देश अहम भूमिका निभा सकेंगे? क्या आपसी विवादों का हल शांतिपूर्ण ढंग से निकालने के लिए सदस्य देश आने वाले दिनों में कुछ पहल कर सकेंगे?

sajnaysharmaडोकलाम को लेकर भारत-चीन तनाव के बीच नेपाल की राजधानी काठमांडू में बिम्सटेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टरल टेक्निकल एंड इकोनॉमिक कॉरपोरेशन)की मंत्रिस्तरीय बैठक हुई। इस बैठक से इतर भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज ने भूटान के विदेशमंत्री दामचो दोरजी से इस मुद्दे पर चर्चा की। दोरजी ने डोकलाम विवाद के शांतिपूर्ण तरीके से सुलझने की उम्मीद जताई है। असली सवाल यह है कि क्या बिम्सटेक की बैठक से आने वाले दिनों में नेपाल समेत अन्य देशों से भारत के दोस्ताना संबंध और मजबूत होंगे? क्या यह बैठक चीन को कोई संदेश दे सकेगी? क्या एशिया में शांति बनाए रखने में बिम्सटेक के सदस्य देश अहम भूमिका निभा सकेंगे? क्या आपसी विवादों का हल शांतिपूर्ण ढंग से निकालने के लिए सदस्य देश आने वाले दिनों में कुछ पहल कर सकेंगे?
बिम्सटेक की स्थापना आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए की गई है। यह इसकी 15वीं बैठक है। बिम्सटेक में भारत के अलावा बांग्लादेश, भूटान, म्यांमार, नेपाल, श्रीलंका और थाईलैंड जैसे देश शामिल हैं। अधिकांश देशों की सीमाएं चीन से मिलती हैं। अधिकांश सदस्य देशों से भारत के संबंध काफी अच्छे हैं। हालांकि नेपाल व श्रीलंका में चीन अपनी पैठ बढ़ाने में लगा है ताकि भारत को घेरा जा सके। नेपाल का एक वर्ग चीन से संबंधों को बढ़ाने पर जोर देता रहा है। यहां के माओवादी चीन का समर्थन करते हैं। माओवादियों के जरिए चीन नेपाल में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है। नेपाली सरकार की चीन के साथ सहानुभूति भी यदा-कदा दिखाई देती है। यही वजह है कि भारत नेपाल समेत बिम्सटेक के अन्य सदस्य देशों से अपने संबंधों को मजबूती देने में जुटा है। नेपाल से भारत के न केवल राजनीतिक बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध हैं। नेपाल की तराई में मधेसी समाज भारतीय मूल का है और नेपाल की राजनीति में अच्छाखासा दखल रखता है। वह भारत के मूल्य पर चीन से संबंधों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। चीन की कूटनीति का जवाब देने के लिए ही विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने न केवल नेपाल की राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी और प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा से भी मुलाकात की बल्कि आधारभूत ढांचे, ऊर्जा और संपर्क बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की। भारत की कूटनीति है कि वह इन देशों के साथ अपने संबंध मजबूत कर चीन को चारों ओर से घेर सके। जाहिर है इसका कूटनीति में दूर तक असर दिखेगा। इसका असर चीन-भारत तनाव पर भी पड़ेगा।

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