चरमराती स्वास्थ्य सेवाएं और आम आदमी

सवाल यह है कि तमाम कवायदों के बावजूद स्वास्थ्य केंद्र और सरकारी अस्पतालों के हालात क्यों नहीं सुधर रहे हैं ? चिकित्सक मरीजों के इलाज में लापरवाही क्यों बरत रहे हैं? क्या स्वास्थ्य कर्मियों पर सरकार के आदेशों का कोई असर नहीं पड़ रहा है? क्या जिस समय पूरे प्रदेश में डेंगू और स्वाइन फ्लू का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा हो, वहां इस प्रकार की लापरवाही को बर्दाश्त किया जा सकता है?

sajnaysharmaराजधानी लखनऊ के तेलीबाग स्थित नगरीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र निरीक्षण के दौरान बंद मिला। इस दौरान यहां न चिकित्सक, न नर्स और न ही अन्य स्टाफ मिला। इलाज के लिए आए मरीज इधर-उधर भटकते रहे। सीएमओ ने इस मामले में संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दिया है। बावजूद यह स्थिति पूरे प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की पोल खोलने के लिए काफी है। सवाल यह है कि तमाम कवायदों के बावजूद स्वास्थ्य केंद्र और सरकारी अस्पतालों के हालात क्यों नहीं सुधर रहे हैं ? चिकित्सक मरीजों के इलाज में लापरवाही क्यों बरत रहे हैं? क्या स्वास्थ्य कर्मियों पर सरकार के आदेशों का कोई असर नहीं पड़ रहा है? क्या जिस समय पूरे प्रदेश में डेंगू और स्वाइन फ्लू का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा हो, वहां इस प्रकार की लापरवाही को बर्दाश्त किया जा सकता है?
प्रदेश में हर माह अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं दुरुस्त होने का नाम नहीं ले रही हैं। यह स्थिति तब है जब खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने और आम आदमी को राहत देने के कड़े निर्देश दे रखे हैं। निर्देशों के बावजूद अस्पतालों और केंद्रों पर चिकित्सक और कर्मचारी समय से नहीं पहुंचते हैं। अस्पतालों में आए मरीज दवा और इलाज के लिए भटकते रहते हैं। पर्चा बनवाने के लिए मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। मरीजों को दवा नहीं है, कहकर टरका दिया जाता है। स्वास्थ्य केंद्रों की हालत तो और भी बदतर है। ग्रामीण क्षेत्रों के अधिकांश स्वास्थ्य केंद्र कुछ घंटों के लिए खुलते हैं और चिकित्सक कभी-कभी दिखाई पड़ते हैं। कई जनकल्याणकारी स्वास्थ्य योजनाएं भी लापरवाही की भेंट चढ़ रही हैं। जननी सुरक्षा योजना से लेकर टीकाकरण तक में घोर लापरवाही बरती जा रही है। तमाम सुविधाओं के बावजूद गंभीर मरीजों को दूसरे अस्पतालों में रेफर करने के खेल भी चिकित्सक खूब खेलते हैं। इसके कारण मरीजों की हालत खराब हो जाती है और वे निजी अस्पतालों में इलाज कराने के लिए मजबूर होते हैं। सबसे खराब स्थिति गरीब मरीजों की होती है जो निजी अस्पतालों में महंगा इलाज नहीं करा सकते हैं,लेकिन चिकित्सकों को इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। सरकार को चाहिए कि यदि वह आम आदमी तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना चाहती है तो उसे इन अस्पतालों की सतत निगरानी और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करनी होगी। अन्यथा आम आदमी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाने का सरकार का सपना कभी पूरा नहीं हो सकेगा।

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