यूपी में संगठित अपराध और सरकार की चिंता

अहम सवाल यह है कि क्राइम कंट्रोल के लिए पहले से बने तमाम कानून क्या अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए काफी नहीं है? क्या यूपीकोका पास कर देने भर से कानून व्यवस्था सुधर जाएगी? क्या पुलिस में व्याप्त भ्रष्टïाचार को खत्म किए बिना अपराधों में कमी लाई जा सकती है? क्या बढ़ते अपराधों के लिए सामाजिक और आर्थिक कारण उत्तरदायी नहीं है?

sajnaysharmaउत्तर प्रदेश में संगठित अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ता जा रहा है। आए दिन बलात्कार, हत्या, अपहरण और फिरौती की घटनाएं हो रही हैं। वहीं पुलिस इस पर नियंत्रण लगाने में नाकाम साबित हो रही है। इन अपराधों से निपटने के लिए अब प्रदेश सरकार महाराष्टï्र और गुजरात की तर्ज पर यूपीकोका (उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट )लाने की तैयारी कर रही है। संगठित अपराधों को लेकर सरकार की चिंता अपनी जगह वाजिब है। बावजूद इसके तमाम सवाल अपनी जगह कायम है। अहम सवाल यह है कि क्राइम कंट्रोल के लिए पहले से बने तमाम कानून क्या अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए काफी नहीं है? क्या यूपीकोका पास कर देने भर से कानून व्यवस्था सुधर जाएगी? क्या पुलिस में व्याप्त भ्रष्टïाचार को खत्म किए बिना अपराधों में कमी लाई जा सकती है? क्या बढ़ते अपराधों के लिए सामाजिक और आर्थिक कारण उत्तरदायी नहीं है? क्या भारी भरकम जुर्माना और कड़ी सजा का प्रावधान अपराध को कम सकते हैं?
दरअसल, प्रदेश में अपराधी और संगठित अपराध की जड़ें जम चुकी हैं। यहां जबरन वसूली, अपहरण, हत्या, हत्या की कोशिश जैसे जघन्य वारदातें थम नहीं रही हैं। महिला अपराधों का ग्राफ भी बढ़ गया है। ये अपराध व्यक्ति और व्यक्ति समूह द्वारा अंजाम दिए जा रहे हैं। हैरत यह कि अधिकांश मामलों में अपराधी पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहता है। वहीं प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था पर विपक्ष भी लगातार सरकार को घेर रहा है। ऐसे में सरकार के सामने ऐसे अपराधियों पर नियंत्रण लगाना चुनौती से कम नहीं है। हकीकत यह है कि इन अपराधों की बढ़ोत्तरी के पीछे पुलिस की सुस्ती और खुफिया तंत्र की लापरवाही अधिक जिम्मेदार है। पुलिस महकमे में भ्रष्टïाचार का बोलबाला है। कई मामलों में खुद पुलिस अपराधियों को संरक्षण देती नजर आती है। कई मामलों में पुलिस थाने मेें एफआईआर तक दर्ज नहीं की जाती है। अपराधी इस सबका फायदा उठाते हैं। अब जब अपराधी ही पुलिस की गिरफ्त से बाहर रहेंगे तो कानून भला क्या कर सकता है। यदि कोई अपराधी पकड़ भी लिया जाता है तो उसे सजा दिलाना कठिन होता है। सबूतों के साथ छेड़छाड़ और गवाहों को धमकाया जाता है। साफ है सरकार को चाहिए कि वह पहले अपराधियों को पकडऩे की रणनीति बनाए और पुलिस तंत्र को सक्रिय करें। बिना इसके चाहे जितने भी नए कानून बना दिए जाए अपराध कम नहीं होंगे। साथ ही विकास को गति देने की भी जरूरत है ताकि बेरोजगारों को अपराधी समूह बरगला कर अपराध के दलदल में न फंसा सकें।

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