‘सरकारी स्कूलों की खस्ता हालत’ देश के केवल 37 प्रतिशत स्कूलों में ही बिजली

captureहम बार-बार लिखते रहे हैं कि लोगों को स्वच्छ पानी, बिजली, स्वास्थ्य सुविधाएं एवं कम खर्च पर स्तरीय शिक्षा उपलब्ध करवाना केन्द्र एवं राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है परन्तु केंद्र और राज्य सरकारें दोनों ही यह जिम्मेदारी निभाने में बुरी तरह विफल रही हैं।
सरकारी अस्पतालों की भांति सरकारी स्कूलों की दशा भी अत्यंत खराब है और वहां स्वच्छ पानी, शौचालयों और लगातार बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। अनेक स्कूलों में तो बच्चों के बैठने के लिए टाट, ब्लैकबोर्ड व अध्यापकों के लिए कुर्सियां और मेज तक नहीं हैं। स्कूलों में अध्यापकों व अन्य स्टाफ की भी भारी कमी है। अनेक स्कूलों की इमारतें इस कदर जर्जर हालत में हैं कि वहां किसी भी समय कोई बड़ी दुर्घटना हो सकती है। दिल्ली में शाहबाद डेरी स्थित लड़कियों के सीनियर सैकेंडरी स्कूल में 2015 में बिजली का करंट लगने से 3 छात्राएं घायल भी हो चुकी हैं। मध्य प्रदेश के नीमच जिले के मुहकमपुरा गांव में एक सरकारी स्कूल इस्तेमाल के लिए बंद किए जा चुके शौचालय में चलाया जा रहा है। मात्र एक अध्यापक द्वारा संचालित यह स्कूल 2012 में एक किराए के मकान में शुरू किया गया था और जब वह कमरा भी खाली करवा लिया गया तो उसके बाद से इस स्कूल की कक्षाएं एक पेड़ के नीचे लगाई जा रही हैं और वर्षा होने पर यहां पढऩे वाले 34 बच्चे एक परित्यक्त शौचालय में पढऩे के लिए बिठा दिए जाते हैं। हाल में भारत के कंट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (कैग) ने हरियाणा के सरकारी स्कूलों के बारे में यह रहस्योद्घाटन किया था कि वहां 788 प्राइमरी स्कूलों व 269 अपर प्राइमरी स्कूलों को 1-1 अध्यापक द्वारा ही चलाया जा रहा है। हरियाणा के चंद हाई स्कूलों में विद्यार्थियों द्वारा अध्यापकों की कमी को लेकर प्रदर्शन तक किए जा चुके हैं। अभी गत दिनों ही रेवाड़ी जिले के गोठड़ा तप्पा गांव के स्कूल की छात्राओं ने अध्यापकों की कमी को लेकर प्रदर्शन किया था।
उल्लेखनीय है कि देश में अनेक राज्यों के सरकारी स्कूलों में स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी बिजली नहीं पहुंची है और आज भी उन स्कूलों में पढऩे वाले बच्चे गर्मी के मौसम में भारी परेशानी झेल रहे हैं। इसी सिलसिले में 3 अगस्त को राज्यसभा में मानव संसाधन राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने बताया कि इस समय तक देश में 62.81 प्रतिशत स्कूलों में ही बिजली पहुंची है तथा मार्च 2017 तक देश के 37 प्रतिशत से अधिक सरकारी स्कूल बिजली के कनेक्शनों से वंचित थे। इस सूची में झारखंड सबसे निचले पायदान पर है जहां सिर्फ 19 प्रतिशत स्कूलों में ही अब तक बिजली पहुंची है। इसके बाद असम (25 प्रतिशत), मेघालय (28.54), मध्य प्रदेश (28.80), त्रिपुरा (29.77), ओडिशा (33.03), बिहार (37.78) तथा मणिपुर (39.27 प्रतिशत) का स्थान है। यही नहीं पंजाब सहित कुछ राज्यों के शिक्षा विभागों के पास पैसे न होने के कारण चंद स्कूलों के प्रबंधकों द्वारा छात्रों को बिजली का बिल भरने के लिए विवश करने के भी समाचार हैं।
कई स्थानों पर बिजली के बिल मिड-डे मील के फंड में से देने या फिर ‘कुंडी’ लगा कर अवैध तरीके से काम चलाने का रहस्योद्घाटन भी हुआ है। कुछ स्कूलों में अध्यापकों ने अपनी जेब से भी बिजली के बिल भरे हैं। भारतीय शिक्षा तंत्र में बुनियादी सुविधाओं के मामले में लगभग समूचे देश में यही स्थिति है। अत:सहज ही कल्पना की जा सकती है कि जब बच्चों को बुनियादी शिक्षा ही सही ढंग से प्राप्त नहीं होगी तो आगे चल कर किस प्रकार अच्छी तरह अपना जीवनयापन करेंगे। भारतीय स्कूलों की ऐसी दुर्दशा के दृष्टिगत समस्या का त्वरित निवारण करते हुए भारतीय स्कूलों को अनिवार्य बुनियादी सुविधाओं से लैस करने की आवश्यकता है। जब स्कूलों में ही अंधकार रहेगा तो वहां पढऩे वाले छात्रों को ज्ञान का प्रकाश कैसे मिल सकता है!

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