रक्षाबंधन का पर्व, स्त्री अस्मिता और सवाल

सवाल यह है कि क्या इस त्योहार के वास्तविक संदेश को समाज समझ पाया है? क्या हमारा समाज बहनों की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहा है? क्या बालिका भू्रण हत्या रूक गई हैं? क्या समाज में महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार में कोई कमी आई है? क्या दहेज की कुप्रथा समाप्त हो सकी है? क्या महिलाओं के उत्पीडऩ पर लगाम लग सकी है?

sajnaysharmaदेशभर में रक्षाबंधन का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है। भाई-बहन के अटूट प्यार के प्रतीक इस त्योहार के कई रंग हैं। इसमें कई संदेश छिपे हुए हैं। बहनें इस मौके पर अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं और उसके लंबी उम्र की दुआ मांगती हैं। भाई भी बहनों को गिफ्ट और उसकी सुरक्षा का बचन देते हैं। प्राचीन और मध्यकाल में परिवार के अन्य लोगों को भी राखियां बांधी जाती थीं। सवाल यह है कि क्या इस त्योहार के वास्तविक संदेश को भारतीय समाज समझ पाया है? क्या हमारा समाज बहनों की सुरक्षा सुनिश्चित कर पा रहा है? क्या बालिका भू्रण हत्याएं रूक गई हैं? क्या समाज में महिलाओं के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार में कमी आई है? क्या दहेज की कुप्रथा समाप्त हो सकी है? क्या महिलाओं के उत्पीडऩ पर लगाम लग सकी है?
रक्षाबंधन का त्योहार रिश्तों की अहमियत को ही महत्व नहीं देता बल्कि स्त्री के प्रति सम्मान का भाव रखना भी सीखता है। स्त्री और पुरुष समाज के दो पहिए हैं। इसके असंतुलित होने से समाज का पूरा विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसके बावजूद आज तक भारत में स्त्रियों की दशा में बहुत सुधार नहीं आ सका है। भारतीय समाज आज भी पुरुषप्रधान मानसिकता से संचालित हो रहा है। यही वजह है कि महिलाओं के प्रति अपराधों का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा है। तमाम सुरक्षा दावे खोखले साबित हो रहे हैं। आज स्त्री देर रात अकेले बाजार में जाने से डरती है। वह सुरक्षित नहीं है। कन्याओं को गर्भ में मारने की प्रथा अभी भी मौजूद है। तमाम कानूनों के बावजूद दहेज की कुप्रथा चल रही है। हालत यह है कि प्रतिवर्ष भारत में सैकड़ों महिलाएं दहेज की भेंंट चढ़ रही हैं। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि समाज में आज भी बेटे और बेटी में भेदभाव हो रहा है। यह दीगर है कि कुछ महिलाएं इन सबके बावजूद ऊंचे पदों पर पहुंच चुकी हैं। शहरों में वे कामकाज कर आर्थिक रूप से मजबूत भी हो रही हैं। लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्थितियां बहुत खराब हैं। वे दिन-रात मेहनत करती हैं लेकिन समाज में उसकी कोई अहमियत नहीं है। घर से लेकर बाहर तक महिलाओं का उत्पीडऩ हो रहा है। ऐसे में रक्षाबंधन का यह त्योहार हमें यही संदेश देता है कि समाज के सर्वांगीण विकास के लिए महिला शक्ति को आगे बढ़ाने की जरूरत है। जब तक समाज में स्त्री-पुरुष में भेद किया जाता रहेगा, समाज का विकास नहीं हो सकेगा। स्त्री सशक्तिकरण ही देश को आगे ले जाएगा।

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