बढ़ती आत्महत्याएं, समाज और सरकार की भूमिका

सवाल यह है कि छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति में लगातार इजाफा क्यों हो रहा है? वे कौन सी वजहें है जिसके कारण छात्र अपनी जान देने पर आमादा हैं? क्या जटिल होते सामाजिक संबंध और आर्थिक गतिविधियां इसके लिए जिम्मेदार हैं? क्या अति महत्वाकांक्षा और सफलता के मानदंडों ने छात्रों के जीवन में तनाव का जहर घोल दिया है? क्या सरकार को इस पर लगाम लगाने की जरूरत नहीं है?

sajnaysharmaराजधानी में एक छात्रा ने गोमती नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। वह बीकॉम प्रथम वर्ष में पढ़ रही थी। उसका नाम अंकिता बताया जा रहा है। हालांकि अभी यह नहीं साफ हो सका है कि उसने आत्महत्या क्यों की। पुलिस मामले की जांच-पड़ताल कर रही है। यह घटना छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृति की बानगी भर है। सवाल यह है कि छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति में लगातार इजाफा क्यों हो रहा है? वे कौन सी वजहें है जिसके कारण छात्र अपनी जान देने पर आमादा हैं? क्या जटिल होते सामाजिक संबंध और आर्थिक गतिविधियां इसके लिए जिम्मेदार हैं? क्या अति महत्वाकांक्षा और सफलता के मानदंडों ने छात्रों के जीवन में तनाव का जहर घोल दिया है? क्या सरकार को इस पर लगाम लगाने की जरूरत नहीं है?
छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के वर्ष 2015 के आंकड़ों के मुताबिक देश में हर घंटे एक छात्र आत्महत्या कर रहा है। उस वर्ष 8,934 छात्रों ने आत्महत्या की थी। इसमें छात्रों द्वारा आत्महत्या के प्रयास के आंकड़े शामिल नहीं हैं। इन आंकड़ों में तेजी से इजाफा हो रहा है। छात्रों द्वारा आत्महत्या की कई वजहें हैं। आधुनिक भागदौड़ की जिंदगी में छात्र परिवार से कट गए हैं। परिवारों में संवादहीनता पैदा हो गई है। छात्र अपनी पढ़ाई, कॅरियर और प्रेम संबंधों को लेकर तनाव में आ जाते हैं। इनमें असफल होने पर वे अवसादग्रस्त हो जाते हैं। ऐसे समय उन्हें न तो परिवार न ही समाज का सहारा मिल पाता है और वे आत्मघाती कदम उठा लेते हैं। जटिल आर्थिक विकास भी तनाव को जन्म दे रहा है। सब कुछ जल्द पाने की चाहत और अतिमहत्वाकांक्षा भी छात्रों को अवसादग्रस्त कर रही है। लक्ष्य नहीं पाने के कारण वे आत्मघाती कदम उठाने से भी नहीं हिचकते हैं। नशे की प्रवृत्ति भी आत्महत्या की एक बड़ी वजह है। छात्रों के बीच बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए न केवल समाज बल्कि सरकार को भी आगे आना होगा। अभिभावकों को चाहिए कि वह बच्चों से संवाद बनाए रखे और कॅरियर को लेकर उन पर अनुचित दबाव न डाले। वहीं सरकार को चाहिए कि वह समय-समय पर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य परीक्षण की व्यवस्था करे ताकि होनहारों को आत्महत्या करने से रोका जा सके। यदि इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लगाया गया तो यह देश के लिए घातक सिद्ध होगा।

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