शिक्षा का अधिकार कानून निजी स्कूल और सरकार

अहम सवाल यह है कि आखिर निजी स्कूल गरीब बच्चों को कानून के मुताबिक दाखिला क्यों नहीं देना चाहते हैं? क्या सरकार का इन पर कोई दबाव नहीं है और वे मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं? क्या शिक्षा का कानून अधिकार महज कागजी शेर बन कर रह गया है? क्या शिक्षा विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं है?

sajnaysharmaनिजी स्कूलों के संचालक शिक्षा का अधिकार कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं। वे सरकार द्वारा निर्धारित की गई समय सीमा के मुताबिक गरीब बच्चों को दाखिला नहीं दे रहे हैं। शिक्षा विभाग भी निजी स्कूलों से कानून का पालन कराने में नाकाम साबित हो रहा है। वहीं आर्थिक रूप से निर्बल अभिभावक अपने बच्चों का दाखिला इन स्कूलों में नहीं हो पाने से निराश हैं। अहम सवाल यह है कि आखिर निजी स्कूल गरीब बच्चों को कानून के मुताबिक दाखिला क्यों नहीं देना चाहते हैं? क्या सरकार का इन पर कोई दबाव नहीं है और वे मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं? क्या शिक्षा का कानून अधिकार महज कागजी शेर बन कर रह गया है? क्या शिक्षा विभाग इसके लिए जिम्मेदार नहीं है?
आर्थिक रूप से निर्बल बच्चों को निजी स्कूलों में पढ़ाने के लिए सरकार ने 2009 में शिक्षा का अधिकार कानून बनाया था। इस कानून में इन स्कूलों में 25 फीसदी गरीब बच्चों के दाखिले का प्रावधान किया गया है। यही नहीं इस शर्त को पूरा करने के आधार पर तमाम स्कूलों को मान्यता भी दी गई थी। बावजूद यह कानून आज तक जमीन पर नहीं उतर सका है। अधिकांश निजी स्कूलों के संचालक गरीब बच्चों को अपने यहां दाखिला देने से कतरा रहे हैं। उनकी दलील है कि इस मामले में सरकार की गाइड-लाइन स्पष्ट नहीं है। स्कूल में दाखिले के बाद ड्रेस और बस के किराए पर आने वाले खर्च की भरपाई की कोई व्यवस्था नहीं की गई है। हकीकत यह है कि निजी स्कूल किसी भी प्रकार अपनी मोटी कमाई में कमी नहीं करना चाहते हैं। ये अभिभावकों से गुणवत्ता युक्त शिक्षा के नाम पर मोटी फीस और विभिन्न मदों में धन उगाही करते हैं। यदि अभिभावक ऐसा नहीं करते हैं तो उनके बच्चों को अंतत: स्कूल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। कमाई में कमी न हो इसलिए वे गरीब बच्चों को अपने यहां दाखिला नहीं देना चाहते हैं। वहीं इस कानून को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी शिक्षा विभाग को दी गई है, लेकिन वह भी इस मामले में महज खानापूर्ति कर रहा है। वह निजी स्कूलों पर किसी प्रकार की सख्ती करता नहीं दिख रहा है। यही वजह है कि शिक्षा विभाग द्वारा बुलाई गई बैठक तक में निजी स्कूल के संचालन नहीं पहुंचते हैं। यदि सरकार वाकई गरीब बच्चों को इन स्कूलों में दाखिला दिलाना चाहती है तो उसे इन निजी स्कूलों के प्रबंधन से सख्ती से निपटना पड़ेगा वरना यह कानून भी कागज का टुकड़ा बनकर रह जाएगा।

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