स्मार्टफोन उद्योग की आपाधापी

चीनी फोन कंपनी श्याओमी ने हाल में ही अपना नया फेबलेट स्मार्टफोन बाजार में उतारा है। श्याओमी हाल में संपन्न त्यौहार के दौरान हुई बिक्री में भारत में 10 लाख फोन बेच कर चर्चा में रही है। साल के पहले पांच महीनों में भी वह 15 लाख से अधिक फोन बेच चुकी थी और इस नये उत्पाद के साथ उसके फिर चर्चा के केंद्र में आने की पूरी संभावना है।
अपने इस नये उत्पाद में घुमावदार पर्दा लाकर कंपनी स्मार्टफोन बनाने वाली कंपनियों के साथ प्रतिद्वंद्विता में नये मोड़ पर आ खड़ी हुई है। कुछ समय पहले तक यह तकनीक बड़े टेलीविजन सेटों में प्रयोग में लायी जाती रही है और इसमें अग्रणी मानी जानेवाली कोरियाई कंपनियां सैमसंग और एलजी इसे अपने स्मार्टफोन में भी आजमा चुकी हैं।
श्याओमी के ताजा उत्पाद ने बाजार में जगह बनाने की कोशिश तब की है, जब सैमसंग को अपने एक ताजातरीन फेबलेट की बैटरी की खराबी के कारण बाजार के एक हिस्से से हटना पड़ा है और सैमसंग अब तक उसके कारणों का पता लगाने में व्यस्त है।
स्मार्टफोन उद्योग की भारी प्रतियोगिता के बीच शायद सैमसंग को एक उत्पाद के एक अवयव की तकनीकी जांच के लिए जरूरी समय न मिला हो, पर श्याओमी को सैमसंग के अपने फेबलेट से नुकसान उठाने के बाद उसे बाजार से वापस लेने के बीच नया उत्पाद जारी करने तक खासी मोहलत मिली होगी। श्याओमी और विशेष कर चीन के अनेक फोन निर्माताओं को एप्पल और सैमसंग जैसी कंपनियों के बाजार में स्थापित हो जाने के बाद स्मार्टफोन उद्योग में आने के जो फायदे रहे हैं, उनमें से एक बाजार की प्रवृत्ति के मद्देनजर ग्राहक की बदलती मांग को समझना और उसके अनुरूप बेहद कम समय में लक्षित ग्राहक वर्ग तक नया उत्पादन पहुंचाना रहा है।
चीनी फोन कंपनियां अन्य फोन कंपनियों की तुलना में ऐसा करने में सक्षम थीं और हैं, क्योंकि उन्हें चीन की अर्थव्यवस्था के बड़े पैमाने और उसमें मौजूद गुंजाइश का लाभ हासिल था और है। तीन दशकों में चीन में विनिर्माण क्षेत्र में आये बदलाव के इस परिणाम को सूचना प्रौद्योगिकी में ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर की पहल ने दोगुना कर दिया और एंड्रॉयड पर नये उद्यमियों ने (भारत में भी) अपने व्यवसाय की नींव रखनी शुरू की। एंड्रॉयड पर आधारित उद्यमिता के चलते भी स्मार्टफोन भारत, चीन और अन्य अनेक देशों में आम मजदूर तक पहुंचने की हद तक लोकप्रिय हुआ और अब कमोबेश रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है।
एंड्रॉयड का मुक्त प्रयोग और चीनी विनिर्माण की व्यापकता और पैमाना ही था कि स्मार्टफोन किफायत में सबकी जेब में आ सका, पर इसके चलते नये देशी उद्यमियों ने बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के साथ पहले से स्थापित कंपनियों, विशेष कर बहुराष्ट्रीय निगमों को, चुनौती देनी शुरू कर दी और फिर देश के बाहर भी बाजार खोजने शुरू किये। माइक्रोमैक्स भी इस परिघटना के चलते माइक्रोमैक्स बना। इन नये उद्यमियों को सोशल मीडिया और इ-कॉमर्स ने इधर मार्केटिंग और वितरण के नये साधन दिये, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों की लोकप्रियता प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से बढ़ी।
श्याओमी और माइक्रोमैक्स के बाजार में लगभग एक समय आने के बावजूद श्याओमी ने ग्राहक को किफायत के साथ अपनी जरूरत पूरी करने वाले उत्पाद देकर और उनमें लगातार बदलाव लाकर अपने घरेलू बाजार में पहले ह्वावेइ और लेनोवो जैसे चीन के ही बड़े उद्योग समूहों को चुनौती दी और फिर सैमसंग और एप्पल जैसे स्थापित बहुराष्टï्रीय निगमों के सामने आ खड़ी हुई। इसी वर्ष की शुरुआत में आये श्याओमी के फेबलेट के बाजार में आने के कुछ समय बाद एप्पल को एक नया किफायती उत्पाद बाजार में लाना पड़ा था और इसके कुछ समय बाद ही अमेरिकी कंपनी ने भारत में अपने व्यवसाय के विस्तार की बात करनी शुरू की थी।
श्याओमी की सफलता के परिणाम में चीन में उसके बड़े प्रतियोगियों को यदि अपनी रणनीति में बदलाव लाने पड़े हैं, तो कुछ ने नये उत्पादों के साथ बाजार में आने की पहल की है। श्याओमी इधर गैरपारंपरिक विपणन तकनीकों के साथ पारंपरिक विपणन को भी अपना चुकी है। अपने नवीनतम उत्पाद के प्रचार के लिए उसने हांगकांग की एक सेलेब्रिटी को चुना। इसके पीछे कंपनी की और तेजी से नये ग्राहकों-बाजारों तक पहुंचने की योजना हो सकती है।
सैमसंग को हाल में जारी अपने नये फेबलेट की खराबी के चलते छवि के साथ जैसी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी है, (इधर एप्पल के नये उत्पाद के भी इस तरह के संकट में फंसने की आशंकाओं की छिटपुट खबरें हैं, उसे देखते हुए उसने अपने नये उत्पाद को तय समय से कुछ विलंब से बाजार में उतारने का फैसला किया है। यह सब स्मार्टफोन जैसी मामूली जिंस बनाने वालों के बीच चल रही तगड़ी आपाधापी की ओर इशारा करता है। भारतीय उद्यम इस सब से अपनी उद्यमिता के लिए अवसर के उपयोग का सबक ले ही सकते हैं।

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