सैनिक, सरकार और सियासत

सवाल यह है कि वे कौन सी वजहें हैं जिसके कारण देश की दिलो-जान से हिफाजत करने वाले पूर्व सैनिक को आत्मघाती कदम उठाने पर विवश होना पड़ा? क्या जवानों और शहीदों का गुणगान करने वाली मोदी सरकार को पूर्व सैनिकों की कतई चिंता नहीं? सवाल यह भी है कि क्या धरना-प्रदर्शन के जरिए अपनी बात रखने वाले पूर्व सैनिकों की मांग पर सरकार को गौर नहीं करना चाहिए?

sanjay sharma editor5जिस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन-भारत बॉर्डर पर सेना के जवानों के साथ दीवाली मना रहे थे, उस समय वन रैंक वन पेंशन योजना से असहमत कुछ पूर्व सैनिक दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना दे रहे थे। इसमें से एक पूर्व सैनिक राम किशन ग्रेवाल ने दीवाली के दूसरे दिन जहर खाकर खुदकुशी कर ली। राम किशन सूबेदार पद से रिटायर्ड थे। वे हरियाणा के भिवानी के निवासी थे। सुुसाइड नोट में राम किशन ने लिखा, मैं अपने देश, अपनी मातृ भूमि और देश के वीर जवानों के लिए अपने प्राणों को न्योछावर कर रहा हूं। पूर्व सैनिक की खुदकुशी अपने पीछे कई सवाल छोड़ गई है। सवाल यह है कि वे कौन सी वजहें हैं जिसके कारण देश की दिलो-जान से हिफाजत करने वाले पूर्व सैनिक को आत्मघाती कदम उठाने पर विवश होना पड़ा? क्या जवानों और शहीदों का गुणगान करने वाली मोदी सरकार को पूर्व सैनिकों की कतई चिंता नहीं? सवाल यह भी है कि क्या धरना-प्रदर्शन के जरिए अपनी बात रखने वाले पूर्व सैनिकों की मांग पर सरकार को गौर नहीं करना चाहिए? सवाल और भी है। हकीकत यह है कि सरकार सेना के जवानों की हौसला अफजाई तो करती है लेकिन जब उनके हितों की बात आती है तो वह तमाम मजबूरियां गिनाकर उससे किनारा कर लेती है। पूर्व सैनिकों की स्थिति और भी खराब है। अपनी ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करने के लिए उनके पास धरना-प्रदर्शन के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। लेकिन यदि यह प्रदर्शन लंबे समय तक चलता है तो उनमें निराशा उत्पन्न हो जाती है और यह निराशा कई बार नुकसानदेह हो जाती है। दरअसल, पूर्व सैनिक राम किशन अपने कुछ साथियों के साथ जंतर-मंतर पर धरना दे रहा था और रक्षा मंत्री से मिलने की कोशिश कर रहा था। सरकार चाहती तो उन्हें बुलाकर बातचीत कर सकती थी तब शायद ऐसी स्थिति नहीं आती। दूसरी ओर विपक्ष ने पूर्व सैनिक की खुदकुशी पर भी सियासत शुरू कर दी है। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया मृत पूर्व सैनिक के परिजनों से मिलने पहुंचे। उन्हें मृतक के परिजनों से मिलने से रोक दिया गया तो उन्होंने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए इसे अलोकतांत्रित करार दिया है। विपक्ष का आरोप अपनी जगह सही हो सकता है लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब ये पूर्व सैनिक अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे तो उन्होंने उनके साथ खड़े होने की जहमत क्यों नहीं उठाई। यदि वे उनकी मांग के साथ खड़े होते तो सरकार पर दबाव बनता और बातचीत भी हो सकती थी।

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