सुप्रीम कोर्ट ही समाप्त कर सकता है ‘क्रिकेट बोर्ड की नौटंकी’

भारतीय क्रिकेट पैसा बनाने का एक बहुत ही शक्तिशाली तंत्र है और बीसीसीआई का इस साम्राज्य पर एकछत्र राज बहुत ही पहले समाप्त हो गया था। बेशक विराट कोहली और उनके साथियों द्वारा वर्तमान में खेला जा रहा क्रिकेट अभी भी विशेष दिनों पर दिव्यता का आभास देता है तो भी इस खेल का संचालन करने वाले पुरुषों की मंडली (आप यकीन करिए कि वे सभी के सभी पुरुष ही हैं) एक तरह से सत्ता के दुरुपयोग का पर्याय बन चुके हैं। अब जबकि भारतीय क्रिकेट को सुधारने का कानूनी युद्ध सुप्रीम कोर्ट के गलियारों में अपनी अंतिम चीत्कार की ओर बढ़ रहा है तो क्रिकेट पर हावी रही मित्र मंडली अपना अंतिम दांव खेल रही है।
हैरानी की बात है कि बीसीसीआई ने अब ‘क्रिकेट के लिए लड़ाई लडऩे’ के अपने नैतिक दावे का भी परित्याग कर दिया है। अपनी बेलगाम शक्ति के बचे-खुचे खंडहरों को संभाले रखने के लिए क्रिकेट के कारोबार के कर्णधारों ने बहुत मजबूती से खुद को एकजुट कर लिया है। वास्तव में यह उनकी हताशा है। 4 जनवरी को जब जस्टिस आरएम लोढा कमेटी ने बहुत ही कम समय में 159 पृष्ठ की रिपोर्ट तैयार करके प्रस्तुत की तो ऐसा दिखाई दे रहा था कि सुधारों की आंधी में क्रिकेट बोर्ड के परखच्चे उड़ जाएंगे। जब यह स्पष्ट हो गया कि लोढा कमेटी की सिफारिशें स्वत: ही क्रिकेट जगत के शरद पवार, एन श्रीनिवासन, एमपी पांडव तथा निरंजन शाह जैसे अनेक दिग्गजों का करियर चौपट कर देंगी तो हर ओर से अपने बचाव के लिए उन्होंने जुगाड़ फिट करना शुरू कर दिया-यानी कि लोढा कमेटी के विरुद्ध एक तरह से जवाबी हल्ला बोल दिया।
बीसीसीआई ने सीधे-सीधे कह दिया कि लोढा कमेटी भारत में क्रिकेट कारोबार के संचालन को अपने हाथों में लेने का प्रयास कर रही है, जैसा कि इसके तेजतर्रार वकील कपिल सिब्बल ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया था। बीसीसीआई बनाम बिहार क्रिकेट संघ की समीक्षा याचिका में बीसीसीआई ने यहां तक दलील दे दी कि अदालत का लोढा कमेटी द्वारा सुझाए गए सुधार लागू करने का आदेश कानून के विरुद्ध है और अदालत जरूरत से अधिक उत्साह दिखा रही है। 18 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड की समीक्षा याचिका को रद्ïद करके इसके दावों के परखच्चे उड़ा दिए।
अदालत के अति उत्साह के मामले में बीसीसीआई के पास बेशक पुख्ता कारण हों लेकिन अंततोगत्वा अदालत का आदेश ही कानून को परिभाषित करता है। फिर भी बीसीसीआई बहुत ढीठताई से अदालत का विरोध करने पर डटा हुआ है और कह रहा है कि वह अदालत के आदेश का आंशिक रूप में ही अनुपालन कर सकता है और वह भी उन बातों पर जो इसके सदस्यों के लिए हितकर हों। यह एक अजीब दलील है कि यदि सदस्य अदालत के फैसले को अपने हित में न मानते हों तो कोई भी कारर्पोरेट संस्थान अदालती फैसले मानने से ही इंकार कर दे तो क्या इसे अदालत की सीधी-सीधी अवमानना नहीं माना जाएगा?
उल्लेखनीय है कि बीसीसीआई तमिलनाडु सोसाइटी एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत है और ऐसे व्यवहार कर रहा है जैसे अदालती आदेश का अनुपालन इसकी मर्जी का मामला हो। इसी पर तैश में आए भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस तीर्थ सिंह ठाकुर ने चुटकी ली आप लोग ऐसा सुझाव दे रहे हैं ‘हम रजिस्ट्रार ऑफ सोसाइटी के आगे उत्तरदायी हैं। हम कानून की नजरों में बेशक अपराधी हों, तो भी सुधरेंगे नहीं। आप हमें सुधरने के लिए न कहें।’
बीसीसीआई ने बहुत आसानी से इस तथ्य की अनदेखी कर दी है कि विदर्भ, त्रिपुरा एवं राजस्थान क्रिकेट संघों जैसे कुछ संगठनों ने एक तरफा तौर पर लोढा कमेटी की सभी सिफारिशों को मान लिया है।
क्रिकेट इतिहासकार बोरिया मजूमदार ने दलील दी है कि अनेक राज्यों के क्रिकेट संघों के सदस्यों ने प्राइवेट बातचीत में बताया है कि उनके हाथ बंधे हुए थे क्योंकि उन्हें डर था कि यदि उन्होंने लोढा कमेटी का समर्थन किया तो बीसीसीआई उन्हें अलग-थलग कर करके रख देगा। ऐसी स्थिति में बोर्ड का यह दावा तो बिल्कुल ही उपहासजनक है कि इन संघों ने ही बोर्ड के नेतृत्व को मजबूर किया था। कारण बहुत सरल था। यदि सुधार लागू होते हैं तो बीसीसीआई के दिग्गजों का बिल्कुल सफाया हो जाएगा। आखिर कुछ व्यक्तियों के लिए एक संस्थान की कुर्बानी क्यों दी जाए?
दूसरी बात बीसीसीआई ने यह की कि विशेष जनरल मीटिंग से ऐन कुछ ही दिन पूर्व राज्य क्रिकेट संघों को 400 करोड़ रुपए की भारी-भरकम राशि का आबंटन करके इसमें सरेआम सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की धज्जियां उड़ाईं। तीसरा तथ्य यह कि बीसीसीआई अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने इस बात से इंकार किया है कि उन्होंने आईसीसी अध्यक्ष देव रिचर्ड्सन को यह कहा था कि वह यह बयान दे कि लोढा कमेटी का गठन सरकार के सीधे दखल के तुल्य है।
इन सभी दलीलों को एक साथ भी रखकर देखा जाए तो यह सशक्त संकेत मिलता है कि क्रिकेट बोर्ड सुधार प्रक्रिया से बचने के लिए जोरदार प्रयास जारी रखे हुए है। यह ऐसे संगठन के रूप में काम नहीं कर रहा जो अपनी गलतियों को सुधारना नैतिक कत्र्तव्य समझता हो। अब इस नौटंकी को केवल सुप्रीम कोर्ट ही समाप्त कर सकता है।

Pin It