सालाना पांच लाख लोग फेफड़े की बीमारी से गंवाते हैं जान

  • देश में तीन करोड़ लोग सीओपीडी से हैं पीडि़त

वीरेंद्र पांडेय
captureलखनऊ। भारत में लगभग तीन करोड़ लोग क्रॉनिक आब्सट्रक्टिव पल्मोनरी (सी.ओ.पी.डी.) डिजीज से पीडि़त हैं। चिकित्सकों की मानें तो यह फेफ ड़े की एक प्रमुख बीमारी है, जिसे आम भाषा में क्रॉनिक ब्रांकाइटिस भी कहते हैं। केजीएमयू के रेस्पाइरेट्री यानी श्वसन रोग विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत के मुताबिक इस बीमारी से हर साल 5 लाख लोग अपनी जांन गवां देते हैं। ये बीमारी धूम्रपान बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, चिलम का प्रयोग करने वालों को ज्यादा होती है।
इसके अतिरिक्त ऐसे लोग जो कि धूल, धुआं, गर्दा व वातावरण प्रदूषण के प्रभाव में रहते हैं, उनको भी इस बीमारी के होने का खतरा होता है। अब तक सीओपीडी अधिकांशत: धूम्रपान करने वालों को ही होती थी लेकिन पिछले कुछ वर्षों से धूम्रपान न करने वाले लोग भी बीमारी की चपेट में आ रहे हैं। ये समस्या विकासशील देशों में तेजी से बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि पूरी जनसंख्या के हिसाब से कम से कम एक चौथाई मरीज सीओपीडी से ग्रस्त हैं, जिन्होने कभी धूम्रपान नहीं किया है। बर्डन अॅाफ अॅाब्सट्रक्टिव लंग डिसीज नाम के एक अध्ययन में भी धूम्रपान नहीं करने वालों में सीओपीडी की ऊंची व्यापकता की जानकारी दी गई है।

सबसे ज्यादा महिलाओं की मौत: डॉ. सूर्यकांत

प्रो. सूर्यकान्त की मानें तो भारत के शहरी क्षेत्रों में 32 प्रतिशत घरों में अब भी जैव ईंधन वाले चूल्हे का उपयोग होता है, 22 प्रतिशत लोग लकड़ी का उपयोग करते हैं, केवल 8 प्रतिशत केरोसीन और बाकी लिक्विड पेट्रोलियम गैस या नैचुरल गैस जैसे साफ सुधरे ईंधन का उपयोग करते हैैं। विकासशील देशों में सीओपीडी से होने वाली करीब 50 प्रतिशत मौतें घरेलू ईंधन के धुएं के कारण होती हैं, जिसमें से 75 प्रतिशत महिलाएं होती हैं। बायोमास ईंधन जैसे लकड़ी पशुओं का गोबर, फ सल के अवशेष धूम्रपान करने जितना ही जोखिम पैदा करते हैं। लोगों को इन सबसे बचने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।
चिकित्सकों के मुताबिक सी.ओ.पी.डी. एक बड़ा व्यवसायगत जोखिम भी है। नेशनल हेल्थ एंड न्यूट्रीशन एक्जामिनेशन सर्वे ने एक सर्वे किया और पाया कि परिवहन संबन्धी व्यवसायों, मशीन अॅापरेटर्स, केस्ट्रक्शन ट्रेडर्स स्टाक और मेटेरियल का व्यापार करने वालों को रिकॉर्ड प्रोसेसिंग और डिस्ट्रीब्यूशन क्लर्क सेल्स आर वेटेजेज से जुड़े उद्योगों और व्यवसायों की सीओपीडी का अधिक जोखिम है। ऐसे में रोगी को हमेशा विशेषज्ञ चिकित्सक से सलाह लेते रहना चाहिए। काम से संबंधित सीओपीडी का एक अनुपात अनुमानत: 19.2 प्रतिशत है और कभी धूम्रपान नहीं करने वालो में 31.1 प्रतिशत है।

मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती खतरनाक: डॉ.आशुतोष

सिविल अस्पताल के चेस्टरोगविशेषज्ञ डॉ.आशुतोष दुबे बताते है कि मौजूदा समय में मच्छरों से होने वाली खतरनाक बीमारियों से बचाव के लिए मॉस्क्यूटो रिपलेन्ट क्वायल का बहुतायत से प्रयोग होता है। यह जानकर हैरानी होगी की मॅास्क्यूटो कॅाइल से 100 सिगरेट जितना धुआं निकलता है और 50 सिगरेट जितना फार्मल्डिहाइड निकलता है। हम भले ही नियमित धूम्रपान नहीं करते हों लेकिन अनचाहे ही हम अपनी सेहत से समझौता करने वाले उत्पादों का उपयोग करके संकट को निमंत्रण दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि यदि इस बीमारी में सुबह के वक्त खांसी ज्यादा आती है और इसके साथ बलगम भी निकलने लगता है, तो बीमारी की तीव्रता बढऩे के साथ ही रोगी की सांस भी फूलने लगती है। धीरे-धीरे रोगी सामान्य कार्य जैसे- नहाना, धोना, चलना-फि रना, बाथरूम जाना आदि में भी अपने को असमर्थ पाता है। इस बीमारी से पीडि़त व्यक्ति का सीना आगे की तरफ निकल आता है। रोगी फेफ ड़े के अन्दर रुकी हुई सांस को बाहर निकालने के लिए होठों को गोल कर मेहनत के साथ सांस बाहर निकालता है, जिसे पर्सलिप ब्रीदिंग कहते हैं। इसमें गले की मांसपेशियां भी उभर आती हैं और शरीर का वजन घट जाता है। पीडि़त व्यक्ति को लेटने में परेशानी होती है। इस बीमारी के साथ हृदय रोग होने का भी खतरा बढ़ जाता है।

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