सर्वे की पारदर्शिता पर सवाल

नीरज कुमार दुबे

नोटबंदी पर प्रधानमंत्री ने देश की राय जानने के लिए नरेन्द्र मोदी मोबाइल एप पर जो सर्वेक्षण कराया उस पर मात्र 24 घंटे के भीतर ही पांच लाख से ज्यादा लोगों ने अपनी राय दे दी। सर्वेक्षण के परिणाम के अनुसार 93 प्रतिशत से अधिक लोगों ने विमुद्रीकरण का समर्थन किया है। विपक्ष के धरनों और प्रदर्शनों से दबाव महसूस कर रही केंद्र सरकार को इस सर्वेक्षण के परिणामों ने उत्साह प्रदान किया है और प्रधानमंत्री इस परिणाम पर खुशी जताते हुए कह रहे हैं कि इससे लोगों का मूड पता चलता है। दूसरी ओर विपक्ष इस सर्वे के परिणामों को प्रायोजित बताते हुए खारिज कर रहा है। जबकि सरकार का कहना है कि भारत में नीति या राजनीतिक मुद्दों पर कोई जनमत सर्वेक्षण नहीं किया गया, इस लिहाज से यह सर्वेक्षण ऐतिहासिक है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने जब सर्वेक्षण के नतीजों की घोषणा की तो प्रत्येक मंत्री गदगद था। लेकिन सरकार को इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि सर्वेक्षण पर जो सवाल उठाये जा रहे हैं, उसमें कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि इसमें कोई पारदर्शिता नहीं है। नरेन्द्र मोदी मोबाइल एप डाउनलोड कर जिन लोगों ने सरकार की ओर से पूछे गये सवालों के जवाब दिये वह डाटा सरकारी सर्वर पर ही मौजूद है। 93 प्रतिशत भारतीयों ने विमुद्रीकरण का समर्थन किया है या नहीं यह आम लोगों और विपक्ष को दर्शाने की कोई व्यवस्था होनी चाहिए थी। सरकार को यदि इस प्रकार का कोई जनमत संग्रह कराना था तो वह कोई और रास्ता भी निकाल सकती थी। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करना ही था तो मोबाइल एप ही क्यों चुना गया? देश में अधिकतर लोगों के पास मोबाइल फोन भले हैं लेकिन स्मार्टफोन कितने प्रतिशत भारतीयों के पास हैं? क्या सभी भारतीयों के फोन में इंटरनेट है? क्या किसी जगह के दस लोगों की राय को पूरे शहर की राय मान लेना चाहिए? मोबाइल एप डाउनलोड करने वाले और सवालों के उत्तर देने वाले कितने प्रतिशत लोग भारत से थे और कितने प्रतिशत लोग विदेशों से थे? इस बात की क्या गारंटी है कि 93 प्रतिशत समर्थन व्यक्त करने वाले लोग भाजपा समर्थक नहीं थे? दस करोड़ भारतीयों की सदस्यता का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टी के लिए पांच लाख लोगों से राय व्यक्त करवाना क्या मुश्किल काम है?
सन 2010 में गुजरात में नगर निगम चुनावों में एक बार ऑनलाइन मतदान का प्रयोग किया गया था। उसी तरह का कोई प्रयोग उक्त मुद्दे पर जनमत संग्रह के लिए किया जा सकता था। भाजपा के लोग अक्सर ऑनलाइन मतदान का पक्ष लेते रहते हैं ऐसे में शुरुआत इसी सर्वेक्षण से कर देनी चाहिए थी। इसमें अपने मतदाता पहचान पत्र अथवा आधार नंबर के साथ अपनी पहचान सत्यापित कर मतदाता ही नहीं बच्चे भी विमुद्रीकरण पर अपनी राय दे सकते थे। मोबाइल एप के नतीजों को वास्तविक नहीं कहा जा सकता। आजकल संपन्न लोगों ही नहीं बल्कि मध्य वर्ग के लोगों के पास भी दो मोबाइल फोन प्रति व्यक्ति देखे जा सकते हैं। प्रति परिवार यह संख्या आठ-दस भी हो सकती है। ऐसे में सर्वे के नतीजों को आसानी से किसी भी पक्ष में मोड़ा जा सकता है। 93 प्रतिशत का आंकड़ा ही अपने आप में यह दर्शाने के लिए काफी है कि भाजपा समर्थकों ने जी भर कर मतदान
किया है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि अधिकतर भारतीय विमुद्रीकरण के फैसले से खुश हैं लेकिन जिस तरह से मोबाइल एप के सर्वेक्षण परिणाम सामने आये हैं और उसमें कहा गया है कि ज्यादातर लोग परेशानी महसूस नहीं कर रहे उसको देखते हुए कुछ सवाल उठने लाजिमी हैं जैसे- अधिकतर लोग यदि परेशानी नहीं महसूस कर रहे तो गांवों और छोटे शहरों में वह 90 प्रतिशत लोग कौन हैं जो कई-कई दिनों से बैंकों की लाइनों में लग रहे हैं और नकदी नहीं मिलने से परेशान हैं? अधिकतर लोग परेशान नहीं हैं तो वह लोग कौन हैं जिनकी बैंकों की लाइन में मृत्यु हो जा रही है या नकदी नहीं मिलने से परेशान होकर आत्महत्या कर ले रहे हैं? शादी वाले घरों में वह 93 प्रतिशत लोग कौन हैं जो ढाई लाख रुपये की निकासी के लिए तरह-तरह की शर्तें लग जाने से परेशान हैं? यह सही है कि सरकार ने जनता के लिए राहत के उपायों की कई घोषणाएं की हैं और इस संबंध में कदम भी उठाये गये हैं लेकिन कुल मिलाकर जो स्थिति है उसको देखते हुए यही कहा जा सकता है कि बिना पर्याप्त तैयारी के सरकार ने बहुत बड़ा कदम उठा लिया।
जहां तक सर्वेक्षण की बात है तो इस पर अब विपक्ष ही नहीं भाजपा से भी विरोध के स्वर उठने शुरू हो गये हैं। फिलहाल मोर्चा संभाला है पार्टी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने जिन्होंने ट्वीट कर कहा है कि ऐसे सर्वेक्षणों से जनता को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। कांग्रेस ने भी कहा है कि नोटबंदी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आधिकारिक ऐप के जरिए कराये गये सर्वेक्षण में ‘मनगढं़त सवाल थे और अंधभक्तों ने पहले से तय जवाब’ दिए।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि नोटबंदी का प्रधानमंत्री का फैसला साहसिक है और यह कालाधन पर करारी चोट के साथ ही देश की अर्थव्यवस्था के लिए भविष्य में लाभकारी भी सिद्ध होगा। लेकिन अपने फैसले पर हो रही आलोचनाओं का स्वर दबाने के लिए किसी भी सरकार को ऐसे कार्य करने से बचना चाहिए जिससे उसकी कार्यशैली और ईमानदारी पर सवाल उठें। लोकतंत्र में सरकार की ओर से पारदर्शिता बरतना बहुत जरूरी है। सरकार के पास सदन में आंकड़े भले बने रहें लेकिन जनता का विश्वास खोना महंगा पड़ता है, इस बात को समझा जाना चाहिए।

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