सरताज अजीज का अमृतसर आना

यह लगभग तय हो गया कि पाक प्रधानमंत्री के विदेश नीति सलाहकार सरताज अजीज छठवें हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन के वास्ते अमृतसर आयेंगे। पाक विदेश मंत्रालय की ओर से संकेत है कि माहौल सकारात्मक रहा, तो सरताज अजीज एक दिन से अधिक भी रुक सकते हैं। 

माहौल बनाने के लिए पाक उच्चायुक्त अब्दुल बासित ने प्रयास आरंभ कर दिये हैं। सरताज अजीज का ऐसे समय भारत आना तय हुआ है, जब कश्मीर में एक के बाद एक आतंकी हमले हो रहे हैं। नोटबंदी में उलझी जनता के पास अभी समय नहीं है कि मोदी सरकार से पूछे कि अजीज को अमृतसरी नान खिलाने के लिए आप क्यों बेताब हैं और पाकिस्तान को अलग-थलग करने की मुहिम का क्या हुआ?
1 नवंबर, 2011 को इस्तांबुल में हार्ट ऑफ एशिया की बुनियाद 14 देशों ने रखी थी। इनमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान, अजरबैजान, चीन, भारत, ईरान, कजाकस्तान, किर्गिस्तान, रूस, सऊदी अरब, ताजिकिस्तान, तुर्की, तुर्कमेनिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल थे। इन देशों ने आपदा प्रबंधन, आतंकवाद को रोकने, नशीले पदार्थों पर प्रतिबंध, व्यापार-निवेश को बढ़ाने, क्षेत्रीय अधोसंरचना विकसित करने और शिक्षा का विस्तार जैसे छह प्राथमिकता वाले क्षेत्रों को चुना था।
यह समीक्षा का विषय है कि जिन उद्देश्यों के लिए हार्ट ऑफ एशिया सम्मेलन की बुनियाद रखी गयी, उस दिशा में सदस्य देश कितना आगे बढ़ पाये। 2013 में कजाकस्तान की राजधानी अलमाटी में हार्ट ऑफ एशिया की बैठक हुई थी। लेकिन, ऐसी बैठकों की जमीनी हकीकत तापी परियोजना के हश्र को देखने के बाद समझ में आती है। तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-इंडिया (तापी) परियोजना के वास्ते 1995 में हस्ताक्षर किया गया था।
1800 किमी गैस पाइपलाइन पर 10 अरब डॉलर खर्च होना है। इससे पाकिस्तान को रोजाना 1.3 अरब घनफीट गैस मिलती और इतनी ही गैस भारत को मिलनी है। अफगानिस्तान को 0.5 क्यूबिक फीट गैस मिलेगी। इसके बदले भारत को 200 से 250 मिलियन डॉलर ट्रांजिट फीस पाकिस्तान को देनी होगी, और पाकिस्तान यही राशि अफगानिस्तान के हवाले कर देगा। यानी पाकिस्तान को एक तरह से ट्रांजिट फीस नहीं देनी होगी।
फिर भी भारत तापी के लिए तैयार बैठा है। पाकिस्तान का लक्ष्य तापी के जरिये 2019 में गैस प्राप्त कर लेना है। तापी पाइपलाइन अफगानिस्तान के हेरात, हेलमंड, कंधार और पाकिस्तान के क्वेटा, मुल्तान से गुजरते हुए भारत के फजिल्का में पहुंचेगी। तापी की सफलता पर आतंकवाद का ग्रहण लगने का अंदेशा हमेशा बना रहता है।
5 से 9 दिसंबर, 2015 को इस्लामाबाद में हार्ट ऑफ एशिया का पांचवां सम्मेलन हुआ, जिसमें विदेशमंत्री सुषमा स्वराज गयी थीं। तब सिर्फ आतंकवाद व भ्रष्टाचार पर चर्चा हुई। अलकायदा और ‘दाइश’ को रूस, उजबेकिस्तान, मध्यपूर्व और पाक-अफगान सीमा पर बढऩे से कैसे रोका जाये, यह चिंता अफगान राष्टï्रपति गनी ने व्यक्त की थी।
तालिबान के आतंक पर यदि कुछ नहीं कहा गया, तो इसके पीछे चल रही शांति प्रक्रिया थी। गनी ने इतना अवश्य कहा कि तालिबान से कैसे डील करना है, इसे समझने की जरूरत है। अफगान नेतृत्व ने तालिबान को डील किया भी है, जिसके नतीजे अब दिखने लगे हैं। तालिबान ने तापी, कासा विद्युत ट्रांसमिशन, आयनक कॉपर माइंस, हाइवे, रेलवे की सुरक्षा के लिए हामी भरी है और क्षेत्रीय कमांडरों को आदेश दिया है कि वे उसका पालन करें।
पाकिस्तान को इससे भी कष्ट है कि बिना उसकी मदद के अफगानिस्तान तालिबान को भरोसे में ले रहा है। इस समय पाक-अफगान की पटरी नहीं बैठ रही है। अफगान शरणार्थियों के साथ पाक सैनिक व खुफिया के लोगों की बदसुलूकी मानवाधिकार हनन के दायरे में आने लगी है। दो हफ्तों में हजार से ज्यादा अफगान शरणार्थियों को पाक ने कैद किया है।
अफगान मीडिया ने यह भी खबरें प्रसारित की हैं कि पाकिस्तान धीरे-धीरे आइसिस के आतंकियों को सीमा पर जमा कर रहा है। उसकी वजह तालिबान से उसका भरोसा उठना और उनसे हिसाब बराबर करने के लिए एक नया ग्रुप खड़ा करना है। यह ऑपरेशन जर्ब-ए-अज्ब की सफलता के बाद की कहानी है। 15 जून, 2014 से 3 अप्रैल, 2016 तक चले इस ऑपरेशन में दस हजार से अधिक लोग मारे गये थे। उनमें से कुछ तहरीके तालिबान पाकिस्तान, लश्करे झंगवी, हक्कानी नेटवर्क, जुंदल्ला, अल कायदा जैसे संगठनों के अतिवादी थे।
फाटा, उत्तरी वजीरिस्तान, कराची, बलूचिस्तान पर जिस तरह से आइसिस का नया ग्रुप खड़ा किया जा रहा है, उसे पाकिस्तान कब कश्मीर की ओर मोड़ दे, कहना मुश्किल है। सवाल है कि पाक की कोई जिम्मेवारी हार्ट ऑफ एशिया के मंच पर बनती है या नहीं? इस्लामाबाद सम्मेलन में तो यह संकल्प लिया गया था कि एशिया को आतंक और भ्रष्टाचार मुक्त करने में पाक अहम भूमिका अदा करेगा। लेकिन यह शोशेबाजी ही साबित हुई!

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