सरकारी अस्पतालों में दम तोड़ती संवेदनशीलता

सवाल यह है कि आखिर धरती के भगवान माने जाने वाले चिकित्सक इतने संवेदनहीन क्यों होते जा रहे हैं? क्या मरीजों के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं बनती है? क्या वे चिकित्सा क्षेत्र में आने के पहले सेवा करने की सौगंध भूल गए हैं? आखिर सरकार इन घटनाओं पर केवल जांच बिठाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कब तक करती रहेगी?

sajnaysharmaराजधानी में एक और गर्भवती महिला चिकित्सकों की संवेदनहीनता का शिकार हो गई। समय पर इलाज न मिलने के कारण उसने अस्पताल में दम तोड़ दिया। परिजन उसे गंभीर हालत में इलाज के लिए सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचे थे। पहले चिकित्सकों ने बेड न खाली होने का बहाना बनाकर उसे लौटा दिया लेकिन जब वह दोबारा अस्पताल पहुंची तो दो घंटे बिना जांच और इलाज के बिठाए रखा और बाद में महिला के परिजनों को उसके मौत की सूचना दी। मामले की उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए गए हैं। यह घटना बस बानगी भर है। यहां के सरकारी अस्पतालों में गर्भवती और प्रसूताओं के इलाज में लापरवाही की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। सवाल यह है कि आखिर धरती के भगवान माने जाने वाले चिकित्सक इतने संवेदनहीन क्यों होते जा रहे हैं? क्या मरीजों के प्रति उनकी कोई जवाबदेही नहीं बनती है? क्या वे चिकित्सा क्षेत्र में आने के पहले सेवा करने की सौगंध भूल गए हैं? आखिर सरकार इन घटनाओं पर केवल जांच बिठाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कब तक करती रहेगी? क्या ऐसे चिकित्सकों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जरूरत नहीं है? हकीकत यह है कि देश के अधिकांश सरकारी अस्पतालों का यही हाल है। पहले तो इन अस्पतालों में चिकित्सक समय पर उपलब्ध नहीं होते हैं। यदि आ गए तो मरीजों को देखते कम उनको चलता करने की जुगत में लग जाते हैं। मरीज के साथ वे 

रेफर-रेफर का खेल खेलते हैं। अधिकांश अस्पतालों में दवा और जांच के उपकरणों का अभाव है। भौतिकवाद ने चिकित्सकों के व्यक्तित्व को भी प्रभावित किया है। कई चिकित्सक तो मोटे कमीशन के चक्कर में इन अस्पतालों में बैठकर बाहरी कंपनी की दवाएं लिखने में व्यस्त रहते हैं। किसी की जान जाए उनकी बला से। चिकित्सकों की इस संवेदनहीनता का खामियाजा जनता भुगतती है। सरकारी अस्पतालों में अधिकांश गरीब और निम्न मध्यमवर्ग के लोग इलाज के लिए आते हैं। उनके पास इतना पैसा नहीं होता कि वे निजी अस्पतालों में महंगी चिकित्सा करा सकें। ऐसे में यदि चिकित्सक मरीजों के साथ ऐसी संवेदनहीनता से पेश आएंगे तो आम आदमी अपना इलाज कहां और कैसे करा पाएगा। ऐसा नहीं है कि सभी चिकित्सक ऐसा करते हैं। लेकिन ऐसे संवेदनहीन चिकित्सकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। जाहिर है यदि सरकार आम आदमी को सस्ती और अच्छी चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना चाहती है तो उसे ऐसे चिकित्सकों पर न केवल नजर रखनी होगी बल्कि ऐसे संवेदनहीन कृत्यों पर कठोर कार्रवाई भी करनी होगी।

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