सत्ता में आते ही बदले भारतीय जनता पार्टी के सुर

सदन में हंगामे को देखकर सत्ता पक्ष अब विपक्ष को यह नसीहत दे रहा है कि विपक्ष का रवैया संसदीय व्यवस्था के लिए घातक है। यानि कल तक जब भाजपा खुद सदन में हंगामा करती थी, तब तक ठीक था, लेकिन सत्ता में आते ही अब उसके सुर बदल गए है। भाजपा, विपक्ष पर इल्जाम लगा रही है कि वह सदन नहीं चलने दे रहा। इससे देश को करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है। जबकि पहले यही काम वह करती थी।

 जाहिद खान
संसद के मानसून सत्र को कई दिन बीत गये, लेकिन यह पूरा सत्र हंगामे की भेंट चढ़ गया। संसद के दोनों सदनों में ललित मोदी मामला और व्यापमं घोटाले के छाए रहने की वजह से सरकार व विपक्ष के बीच लगातार गतिरोध बना रहा। इससे कार्रवाई बार-बार बाधित हुई और बिना किसी महत्वपूर्ण कामकाज के बैठकें स्थगित होती रहीं। कांग्रेस और वाम दलों समेत समूचा विपक्ष इस मांग पर अड़ा हुआ है कि पहले ललित मोदी, व्यापमं घोटाले आदि के आरोपी मंत्री-मुख्यमंत्री इस्तीफा दें फिर सदन में चर्चा हो। वहीं सरकार भी विपक्ष की मांग के आगे झुकने को बिल्कुल तैयार नहीं। पूरे देश के सामने इतना सब कुछ सामने आ गया, फिर भी सरकार बेशर्मी से यह कह रही है कि उसका कोई भी मंत्री गुनहगार नहीं है और वह अपने पद से इस्तीफा नहीं देगा। विपक्ष के हमलों से बचने के लिए सरकार ने अब यह रास्ता निकाला है कि वह भी संसद में हंगामे पर उतारू हो गई है। यहां तक कि भाजपा सदस्यों ने हाल ही में संसद भवन परिसर में महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास धरना भी दिया। देश के संसदीय इतिहास में यह पहला मौका है, जब सत्तारूढ़ पार्टी ही संसद में धरने पर बैठ गई हो। आखिर सत्ताधारी दल किससे मांग कर रहा है और उसकी क्या मांग है? सरकार, संसद के प्रति जवाबदेह है और उसे अपनी बात सदन में रखनी चाहिए। न कि अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराकर भागना चाहिए।
सदन में हंगामे को देखकर सत्ता पक्ष अब विपक्ष को यह नसीहत दे रहा है कि विपक्ष का रवैया संसदीय व्यवस्था के लिए घातक है। यानि कल तक जब भाजपा खुद सदन में हंगामा करती थी, तो तब तक ठीक था, लेकिन सत्ता में आते ही अब उसके सुर बदल गए है। भाजपा, विपक्ष पर इल्जाम लगा रही है कि वह सदन नहीं चलने दे रहा। इससे देश को करोड़ों रुपए का नुकसान हो रहा है। जबकि पहले यही काम वह करती थी। सारा देश जानता है कि 2जी स्पेक्ट्रम, कॉमनवेल्थ खेल, लोकपाल बिल, महंगाई, तेलंगाना, खुदरा में विदेशी निवेश जैसे मुद्दों पर भाजपा ने संसद का काम किस तरह से बाधित किया था और कई सत्र बिना किसी कामकाज के समाप्त हो गए थे। अब यही कहानी सत्ता में आने के बाद उसके साथ दोहराई जा रही है। यह सत्र ही नहीं, बल्कि पिछले संसद सत्र का भी काफी समय भूमि अधिग्रहण विधेयक और धर्मांतरण के मुद्दे पर हंगामे की भेंट चढ़ गया था। हंगामे के चलते कई अहम् विधेयक मंजूरी की बाट जोहते रह गए। इस सत्र का भी हाल वही है, बस मुद्दे बदल गए हैं।
संसद में इस हंगामे और गतिरोध की वजह कोई और नहीं खुद सरकार है। सरकार का कहना है कि वह विपक्ष के साथ विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के लिए राजी है, पर संसद को सुचारु रूप से चलाने को लेकर उसमें गंभीरता का अभाव साफ नकार आता है। मोदी सरकार के अडिय़लपन और जिद की ही वजह से संसद सुचारु रूप से नहीं चल पा रही है। संसद शुरु होने से पहले ही सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि किसी भी मंत्री या मुख्यमंत्री को पद छोडऩे को नहीं कहा जाएगा। जबकि कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष इस बात पर अड़ा हुआ है कि जब तक दागी मंत्रियों का इस्तीफा नहीं लिया जाता, वह संसद नहीं चलने देगा। विपक्ष की यह मांग जायज भी है। व्यापमं घोटाला लंबे समय से चर्चा में है। इस मामले की जांच में मध्यप्रदेश सरकार का गैरजिम्मेदाराना रवैया किसी से छिपा नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय के दबाव के बाद ही वह इस मामले की सीबीआई जांच को तैयार हुई। इस मामले से जुड़े चालीस से ऊपर गवाहों और आरोपियों की संदिग्ध मौत ने पूरे देश को सकते में डाल दिया है। लेकिन भाजपा अब भी इस मामले पर पर्दा डालने की कोशिशों में लगी हुई है। वहीं ललित मोदी मदद मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ साफ-साफ सबूत होने के बाद भी सरकार को नहीं लगता कि कहीं कुछ गलत हुआ है।

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