संवेदनहीनता, चिकित्सा सेवाएं और चिकित्सक

“सवाल यह है कि मरीजों के प्रति चिकित्सक इतने संवेदनहीन क्यों हो रहे हैं? क्या पढ़ाई के दौरान मरीजों की सेवा की कसम खाने वाले चिकित्सक सौंगध को भूल गए है या भूलते जा रहे हैं? क्या अस्पतालों में लगातार बढ़ रहे काम के बोझ और डॉक्टरों की कमी ने मरीजों के प्रति उन्हें उदासीन बना दिया है या भौतिकवादी सोच में उनका सेवा का भाव कहीं तिरोहित हो चुका है?’

sanjay sharma editor5राजधानी के एक नामचीन अस्पताल में डेंगू से पीडि़त एक मरीज ने इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया। चिकित्सक ने बीमारी से पीडि़त मरीज को देखने तक की जहमत नहीं उठाई। यह पहला वाकया नहीं है। अधिकांश सरकारी अस्पतालों का यही हाल है। यहां कई बार गंभीर मरीजों तक को लौटा दिया जाता है। चिकित्सक रेफर-रेफर का खेल खेल रहे हैं। यह हाल तब है जब सरकार ने हर डेंगू के मरीज को भर्ती करने और तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के बाकायदा निर्देश जारी किए हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि मरीजों के प्रति चिकित्सक इतने संवेदनहीन क्यों हो रहे हैं? क्या पढ़ाई के दौरान मरीजों की सेवा की कसम खाने वाले चिकित्सक सौंगध को भूल गए हैं या भूलते जा रहे हैं? क्या अस्पतालों में लगातार बढ़ रहे काम के बोझ और डॉक्टरों की कमी ने मरीजों के प्रति उन्हें उदासीन बना दिया है या भौतिकवादी सोच में उनका सेवा का भाव कहीं तिरोहित हो चुका है? दरअसल, राजधानी में इस बार डेंगू ने कहर बरपा दिया है। इस रोग की चपेट में आकर अब तक कम से कम दो सौ लोगों की मौत हो चुकी है। इसमें कई लोगों की मौतें सही और समय पर इलाज न मिल पाने के कारण हुई। हैरत यह कि डेंगू से मरने वालों की संख्या को खुद चिकित्सा विभाग ने छिपाने की कोशिश की। कल तक विभाग के पास इससे हुई मौतों के रिकॉर्ड तक नहीं थे। मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद विभाग चेता और उसने मौतों की संख्या बताई। हालांकि ये आंकड़े भी सही नहीं है क्योंकि इसमें डेंगू से मरने वाले सभी लोगों की संख्या नहीं है। आखिरकार हाईकोर्ट को सख्ती बरती पड़ी। कोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए सरकार को आदेश दिया है कि जो अफसर लोगों की जान की हिफाजत नहीं कर सकें हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। जाहिर है सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले चिकित्सकों की संवेदनहीनता बढ़ती जा रही है। वैसे इसके लिए सरकारी व्यवस्था भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। कई अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्साकर्मी नहीं है। गिने-चुने चिकित्सकों के भरोसे अस्पताल चल रहे हैं। उन पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। कई अस्पतालों में तो विशेषज्ञ चिकित्सक तक नहीं है। यही वजह है कि सरकारी चिकित्सा सेवाओं से लोगों का विश्वास उठता जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि निजी अस्पतालों की महंगी चिकित्सा का बोझ उठाने में असमर्थ गरीब कहां जाएं? सरकार को चाहिए कि वह अस्पतालों में समुचित चिकित्साकर्मियों की तैनाती करें और ऐसे चिकित्सकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना सुनिश्चित करे जो मरीज के प्रति संवेदनहीन रवैया अपनाते हैं, वरना इलाज के अभाव में गरीब दम तोड़ते रहेंगे।

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