संविधान निर्माण में ‘सर’ राव की भूमिका

संविधान अंगीकार होने के एक दिन पहले यानी 25 नवम्बर, 1949 को संविधान सभा को धन्यवाद देते हुए बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कहा था ‘जो श्रेय मुझे दिया जाता है वह वास्तव में मुझे नहीं मिलना चाहिए। इसके हकदार श्री बीएन राव हैं’। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने इस अवसर पर कहा ‘जिन बातों के आधार पर इस संविधान का प्रारूप तैयार किया गया उसके लिए श्री बीएन राव की प्रमुख भूमिका रही है।’ इसी सभा के प्रमुख सदस्य मुहम्मद सदाउल्लाह ने सभा में ही कहा, ‘हमें तो केवल नवजात शिशु को सजाने को कहा गया था और वह शिशु था उद्देश्य संकल्प। प्रारूप समिति के ऊपर भी ताकत थी।’ दरअसल वह इन्हीं बीएन राव की ओर इशारा कर रहे थे।

कौन थे ‘सर’ बेनेगल नरसिंह राव

भारत के वाइसराय लार्ड वावेल ने 19 सितम्बर, 1945 को संविधान बनाने की घोषणा की। 22 अक्टूबर को उन्होंने लार्ड पथिक लारेंस (भारतीय मामलों के ब्रिटेन के मंत्री) को पत्र लिखा कि सर बेनेगल नरसिंह राव (बीएन राव) को सुधार विभाग (रिफॉम्र्स) विभाग में नियुक्त करना चाहते हैं (राव 1910 में आईसीएस की परीक्षा पास की थी)। उन्हें अंग्रेजों ने 1938 में ‘सेवा’ के लिए ‘सर’ की उपाधि से नवाजा था। एक साल पहले ही कलकत्ता के हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पद से रिटायर हुए थे और जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे। कहा जाता है कि नेहरू और राव एक ही समय में कैम्ब्रिज में पढ़े थे और नेहरू राव की विद्वता और उपलब्धियों से काफी प्रभावित थे। वावेल के कहने पर राव ने नेहरू से 21 नवम्बर, 1945 को एक लम्बी वार्ता की। इसके बाद 11 जुलाई, 1946 को नेहरू, जो कांग्रेस के अध्यक्ष थे, प्रस्तावित संविधान सभा के लिए एक सात-सदस्यीय समिति बनाई और राव को संविधान सभा का सलाहकार नियुक्त किया गया। इसके दौरान राव ने वर्मा का संविधान भी तैयार किया। राव ने ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका और आयरलैंड सहित अनेक देशों के संविधान को इकट्ठा किया। 9 मार्च, 1947 को राव ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद और नेहरू को एक टिप्पणी तैयार करके भेजी। 17 मार्च, 1947 को उन्होंने प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों को एक प्रश्नावली भेजी। यही प्रश्नावली संविधान सभा के सदस्यों को भी 5 मई को भेजी। यानी सीमायें और मूल तत्व से इन सभी सदस्यों को रू-ब-रू करा दिया गया था। राव ने अक्टूबर 1947 में ही संविधान का प्रारूप तैयार करा लिया था। इसी प्रारूप पर प्रारूप समिति को विचार करना था। पुनरीक्षित प्रारूप 21 फरवरी,1948 को परिचालित किया गया। यही अंतिम प्रारूप सभी विचार-विमर्श का आधार बना। राव सभी प्रारूप संबंधित उप-समितियों की बैठकों में भाग लेते थे। कहना न होगा कि वह आदेश अंग्रेजों से ही लेते रहे और संविधान सभा मात्र आदेशों का पालन करती रही। बाबा साहेब, सदाउल्लाह, राजेंद्र प्रसाद के उपरोक्त उद्गार यही तथ्य बयान करते हैं।

बताया जाता है कि अगर संविधान सभा या तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को यह भरोसा हो जाता कि लार्ड माउंटबेटन जल्दी में हैं और जून, 1948 में भारत छोड़ देंगे तो शायद संविधान का स्वरूप कुछ और ही होता क्योंकि अंग्रेजों का दबाव व्यावहारिकरूप में खत्म हो चुका होता। हमारा संघीय ढांचा राज्यों की ओर इतना झुका न होता (जो अंग्रेजों के दबाव में किया गया)। दरअसल इस मुद्दे पर चर्चा को कुछ दिन और टाला जा सका जाता। हालांकि नेहरू और राव अपनी पूरी ताकत से अंगरेज हुकूमत को किये गए वादे को बाद तक पूरा करते रहे प्रारूप उप-समितियों पर दबाव बनाकर।

नेहरू और राव का प्रभाव पूरे संविधान पर लगातार बना रहा। संविधान नवम्बर 26, 1949 को अंगीकार किया गया था। इससे कोई 11 महीने पहले की बात है। 6 दिसम्बर, 1948 का दिन था (44 साल बाद इसी दिन विवादास्पद राम मंदिर-बाबरी मस्जिद ढांचे ढहाया गया)। संविधान सभा के उपाध्यक्ष हरेन्द्र कुमार मुखर्जी पीठासीन अधिकारी थे। मुखर्जी बंगाल से ईसाईयों के नेता के रूप में कांग्रेस से चुने गए थे। संविधान के वर्तमान अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतन्त्रता) पर बात चल रही थी। कुछ सदस्यों को धर्म निरपेक्षता की अवधारणा से और इस अनुच्छेद के प्रारूप में शामिल किये गए शब्द ‘प्रचार’ ( प्रोपगेट करने का अधिकार) से आपत्ति थी। केएम मुंसी ने, जो बम्बई से सदस्य थे, चर्चा का समापन करने के भाव में कहा ‘ सच बात कहूं तो इस चर्चा का जो भी परिणाम हो, हमें ‘सहमति’ का सम्मान करना चाहिए। अल्प-संख्यक समिति ने पिछले साल से एक साल पहले एक बड़ी उपलब्धि हासिल की जब उसने सर्वसम्मति से मतदान कर संविधान सभा की प्रारूप समिति की रिपोर्ट पर बगैर किसी नानुकुर किये हर बिन्दु पर अपनी मुहर लगा दी। इस सर्वसम्मति से बहुसंख्यक वर्ग में विश्वास और तादात्म्य का वातावरण तैयार हुआ। लिहाजा ‘प्रचार’ शब्द इस अनुच्छेद में बने रहने देना चाहिए ताकि अल्प-संख्यक समिति ने जो उपलब्धि (प्रारूप पर सहमति देकर) हासिल की थी वह नजरंदाज न रहे।’

इसके पहले चर्चा में भाग लेते हुए उड़ीसा के लोकनाथ मिश्रा ने (जो अंग्रेजी भाषण देने में उतने निपुण नहीं थे) इस शब्द और धर्म-निरपेक्षता की नेहरु से प्रभवित अवधारणा का पुरजोर विरोध करते हुए एक लिखित पेज से पढ़ते हुए कहा ‘धीरे-धीरे मुझे यह आभास होने लगा है हमारा धर्म-निरपेक्ष राज्य एक धोखा देने वाला शब्द समूह है, एक ऐसा उपकरण है जिसका इस्तेमाल कर भारत भूमि की संस्कृति को ठिकाने लगाया जा सकता है।’ अचानक नेहरू खड़े होते हैं अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिए। ‘सर, क्या लिख कर पढऩे की इजाजत यह सदन देता है?’ मुखर्जी ने कहा ‘सामान्यतौर पर मैं लिखित दस्तावेज से पढऩे की अनुमति नहीं देता लेकिन अगर कोई सदस्य यह महसूस करता कि वह विषय के साथ बगैर लिखे पढ़े न्याय नहीं कर सकता तो मैं इसकी अनुमति देता हूं। नेहरू रूके नहीं बल्कि फिर अगला प्रश्न दागा ‘क्या मैं जान सकता हूं कि विषय क्या है?’ नेहरू की नाराजगी यह थी कि मिश्रा ‘प्रचार’ शब्द से हट कर धर्म-निरपेक्षता पर बोल रहे थे। बहरहाल जब कई सदस्य इस ‘प्रचार’ शब्द को मौलिक अधिकार में शामिल करने के खिलाफ दिखे तो नेहरू ने बाबा साहेब को उन्हें अनौपचारिक रूप से समझाने में लगाया। बाबा साहेब ने इन सदस्यों को बताया कि नेहरू ने वादा किया है कि संविधान बनने के बाद वह सभी मुख्यमंत्रियों को लिखेंगे कि वे अपने-अपने राज्यों में धर्म प्रचार को लेकर कानून बनाने के लिए स्वतंत्र हैं और संसद इस सम्बन्ध में राज्यों को शक्ति प्रदान करेगी।

संविधान बनाने की प्रक्रिया के दौरान (और पहले भी) सरदार बल्लभ भाई पटेल एक ही केन्द्रीय सेवा के जरिये राज्यों पर नियंत्रण करना चाहते थे। वह एकल शासन पद्धति के घोर हिमायती थे। उनका तर्क था कि राज्यों के पृथक होने का डर हमेशा के लिए खत्म हो सकेगा अगर अफसरशाही केंद्र के अधीन होगी। मुख्यमंत्रियों ने इस विचार का पुरजोर विरोध किया और अपने-अपने राज्यों में राज्य सेवा आयोग शुरू कर दी। यह तो पाकिस्तान के विभाजन और तद्जनित उपद्रव से उपजी भावना थी कि आज भी केन्द्रीय लोक सेवा आयोग के अधिकारी राज्यों में भेजे जाते हैं।
(लेखक ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के जनरल सेके्रटरी हैं)

बताया जाता है कि अगर संविधान सभा या तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व को यह भरोसा हो जाता कि लार्ड माउंटबेटन जल्दी में हैं और जून, 1948 में भारत छोड़ देंगे तो शायद संविधान का स्वरूप कुछ और ही होता क्योंकि अंग्रेजों का दबाव व्यावहारिक रूप में खत्म हो चुका होता। हमारा संघीय ढांचा राज्यों की ओर इतना झुका न होता, जो अंग्रेजों के दबाव में किया गया।

Pin It