वेट एंड वाच मोड पर बसपा

  • सपा में चल रहे घमासान को भुनाने के लिए अंदरखाने बन रही रणनीति
  • सत्तारूढ़ दल के परंपरागत वोट बैंक पर निगाह, सभा में प्रकट की मंशा

सुनील शर्मा
captureलखनऊ। सबसे बड़े राजनीतिक परिवार वाली समाजवादी पार्टी में मचे घमासान पर बसपा सुप्र्रीमो ने भले ही मौन साध रखा है, लेकिन इसका फायदा उठाने के लिए वे मौके की तलाश में हैं। उन्हें बसपा में अन्य बिरादरी के वोटों को अपनी ओर करने का मौका मिलता दिख रहा है। बसपा ने अब सपा के मुस्लिम वोटरों पर अपना ध्यान केंद्रित कर दिया है। फिलहाल बसपा वेट एंड वॉच मोड पर है। इसके इतर मौजूदा राजनीतिक परिदृश्यों से लाभ हासिल करने की रणनीति पर काम करना भी शुरू कर दिया है। मुस्लिमों को अपने पाले में लाने के लिए बसपा ने सौ से अधिक मुस्लिम प्रत्याशी घोषित कर दिए हैं। पार्टी के कद्दावर मुस्लिम नेताओं को मैदान में उतार कर सपा के कमजोर होने के बयान दिलवाए जा रहे हैं। भाजपा के सत्ता में आने का हौव्वा खड़ा कर मुसलमानों को बसपा की तरफ आकर्षित करने का भी प्रयास किया जा रहा है।
2007 के स्वर्णिम काल के बाद बसपा का ग्राफ निरंतर गिरता रहा। 2012 के विधान सभा चुनाव में यह साफ दिखा। 2014 के लोक सभा चुनाव में पार्टी ने सबसे खराब प्रदर्शन किया। इस चुनाव में बसपा का सूपड़ा ही साफ हो गया। पार्टी को हार ही नहीं मिली बल्कि उसके वोटों का प्रतिशत भी गिरा। यही नहीं 2012 के विधानसभा चुनाव में नंबर दो पर आने के बाद भी बसपा ने विपक्ष की भूमिका ठीक से नहीं निभाई। अब भाजपा का दामन थाम चुके स्वामी प्रकाश मौर्य को तब मायावती ने नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी थी। लेकिन उन्होंने कभी भी ईमानदारी से विपक्ष की भूमिका नहीं निभाई। बाद में उन्होने बसपा को ठेंगा दिखाते हुए भगवा ओढ़ लिया। इसके बाद तो बसपा को छोडऩे का सिलसिला ही चला पड़ा। स्वामी के बाद आरके चौधरी, व्रजेश पाठक समेत अन्य कई प्रमुख नेताओं ने मायावती का साथ छोड़ दिया। इससे एकबारगी बसपा के हाशिए पर जाने का अहसास होने लगा। दयाशंकर सिंह प्रकरण ने एक बार जरूर बसपा को संजीवनी देने की कोशिश की, लेकिन पार्टी के कुछ बड़बोले नेताओं के अत्यधिक जोश के चलते यह मौका भी पार्टी के हाथ से निकल गया। बसपा मुखिया को बैकफुट पर ही नहीं आना पड़ा था बल्कि आगे आकर बचाव में बयान भी जारी करना पड़ा। इसके बाद कार्यकर्ताओं में जोश भरने की मकसद से नौ अक्टूबर को आयोजित श्रद्धांजलि सभा में भगदड़ से दो कार्यकर्ताओं की मौत ने पार्टी की किरकिरी करा दी। लिहाजा मायावती अब फंूक फंूककर कदम उठा रहीं हैं। इधर सपा में मची अंतर्कलह ने बसपा को विधानसभा चुनाव से पूर्व मजबूत होने का मौका दिया है। जिससे भुनाने के लिए बसपा ने गोटियां बिछानी शुरू कर दी है। बसपा सुप्रीमो घटनाक्रम पर बयान देने से बचते हुए सपा के परंपरागत वोट बैंक को अपने पाले में लाने की रणनीति पर काम कर रही है। सौ से अधिक मुसलमान प्रत्याशी घोषित कर इसकी शुरुआत कर दी है। मुस्लिमों को बसपा के पाले में लाने के लिए मायावती ने अपने विश्वसनीय सिपहसालारों को मैदान में उतार दिया है। बीते दिनों बसपा के नेता प्रतिपक्ष विधान परिषद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने एक होने पर देश की हुकूमत मुसलमानों के कदमों में होने का बयान देकर इसकी पुष्टिï भी कर दी है।

इन मुस्लिम बाहुल्य जिलों पर टिकीं बसपा की निगाहें

प्रदेश के ऐसे कई जनपद हैं जोकि मुस्लिम बाहुल्य माने जाते हैं। इसमें प्रमुख रूप से मुरादाबाद, आजमगढ़, रामपुर, बिजनौर, बरेली, रामपुर, इलाहाबाद, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, ज्योतिबाफुले नगर आदि जिले शामिल हैं। इन जिलों में मुस्लिमों की आबादी 25 से 35 फीसदी तक है। जहां पर अभी तक सपा का ही परचम लहराता रहा है। इस बार परिस्थितियां बदली हुई हैं। सपा में मची कलह को लेकर सबसे अधिक चिंतित मुस्लिम समुदाय है। इसका फायदा उठाने की मंशा से बसपा ने इन जनपदों पर अपनी निगाहें टिका दी हैं। मुसलमानों को अपने पाले में लाने की जिम्मेदारी बसपा प्रमुख ने वरिष्ठï नेता नसीमद्दीन सिद्दीकी व उनके युवा पुत्र अफजल सिद्दीकी को सौंपी गर्ई है। अफजल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्र्टी का जनाधार बढ़ाने में जुटे हैं।

सबसे अधिक मुस्लिम विधायक सपा के

2012 में हुए विधान सभा चुनाव में प्रदेश की कुल 69 सीटों पर मुस्लिम प्रत्याशियों ने जीत हासिल की थी। इसमें सबसे अधिक सपा के उम्मीदवार थे। समाजवादी पार्टी के सबसे अधिक 43 प्रत्याशी जीते थे। दूसरे नंबर पर बसपा रही। इसके कुल 16 मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की। कांग्रेस से चार मुस्लिम प्रत्याशी विजयी रहे थे। प्रदेश में उस वक्त सबसे अधिक धमाकेदार इंट्री पीस पार्टी की हुई थी, जिसके तीन मुस्लिम प्रत्याशियों ने अप्रत्याशित जीत हासिल कर राजनीति में हलचल मचा दी थी। चुनाव के पूर्व जन्मी पीस पार्टी को मुस्लिमों की प्रतिनिधि पार्टी के रूप में पेश करने की कोशिश की गई लेकिन उस प्रयासका सोच के अनुरूप लाभ नहीं मिला। इसके बाद कौमी एकता दल के दो विधायक चुने गए थे। इत्तेहाद ए मिल्लत काउंसिल के भी एक प्रत्याशी ने जीत हासिल की थी।

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