वकील, नेताओं के हश्र

वकील वर्ग में यह गुमान रहता है कि उन्होंने आजादी की लड़ाई में सबसे बड़ा योगदान किया है। नेतृत्व उनके ही वर्ग का रहा है। आजादी के दौर के सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मोहम्मद अली जिन्ना, सरदार वल्लभ भाई पटेल, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और न जाने कितने इसी वर्ग से रहे हैं। गांधीजी ने अलबत्ता चुभती बात कही थी कि आजादी की लड़ाई या बाद में भी उन्हीं वकीलों का योगदान रेखांकन योग्य होगा जो व्यवसाय छोडक़र देश और समाज की सेवा में खुद को झोंक देंगे।
गांधी, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल सहित जिन्ना का भी यही स्थिति रही। अंगरेज से बौद्धिक लड़ाई करने में देश में उच्च शिक्षा के अभाव के कारण कुलीन परिवारों के युवकों ने मुख्यत: इंग्लैंड जाकर पढ़ाई की थी। वे अंगरेजी सल्तनत से लडऩे की कूटनीतिक बुद्धि विदेशी शिक्षा के जरिए विकसित करते रहे। इस कारण वकील वर्ग को अंगरेजों को परास्त करने का ऐतिहासिक श्रेय मिला। आजादी के बाद सत्ता चलाना व्यावहारिक बुद्धि का काम हुआ। लिहाजा वकील धीरे-धीरे छंटते गए। उनकी जगह कुलीन लॉबी, उद्योगपति, सेवानिवृत्त नौकरशाह, डॉक्टर और फिल्म अभिनेता भी शामिल होकर वकीलों को उनकी भूमिका से बेदखल करते गए।
दोष कृष्ण मेनन को दिया जाता है कि उनकी सलाह के कारण प्रधानमंत्री नेहरू ने देश की चीन नीति में ढिलाई बरती। चीन ने फायदा उठाकर 1962 में भारत पर हमला किया। आज भी हजारों वर्ग किलोमीटर भूमि चीन के कब्जे में है। सिद्धार्थ शंकर रे और सेवानिवृत्त न्यायाधीश रहे कानून मंत्री हरिराम गोखले को दोष दिया जाता है कि उनकी भी सलाह के कारण इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा। वह इंदिरा की राजनीतिक समझ का कलंक हो गया। अन्यथा बांग्लादेश बनवाने के कारण इंदिरा गांधी के मुकाबले किसी भारतीय नेता का यश नहीं था। उनके और राजीव गांधी के दरबार में हंसराज भारद्वाज जैसे दोयम दर्जे के वकील का सिक्का खूब चला।
बेहतर वकीलों को पछाडक़र वे देश के कानून मंत्री बनाए गए। उन पर यह आरोप था कि वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से पिछले दरवाजे से जाकर भी मिल सकते थे। कभी लालबहादुर शास्त्री की काबीना में अशोक कुमार सेन जैसे काबिल कानून मंत्री रहे। उनकी टक्कर के वकील सुप्रीम कोर्ट में गिने चुने थे। आपात काल का विरोध करती जनता पार्टी की मुख्य आवाज इलाहाबाद के वकील शांति भूषण बने। सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलीलों से वे सीढ़ी चढक़र जनता राज में कानून मंत्री बने। इसके पहले शाही थैली और राजकीय चिन्हों को कानून के जरिए इंदिरा गांधी ने छीन लिया था। उन्होंने संपत्ति का अधिकार भी छीन लिया था।
उसका सुप्रीम कोर्ट में विरोध टाटा परिवार के निकट रहे मुंबई के वकील एनए पालखीवाला ने पुरजोर तरीके से किया। वे महीनों तक देश के अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर छाए रहे। ये वकील राजनीति में बहुत कुछ हासिल नहीं कर सके। इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ न्यायाधीशों के मुकाबले जस्टिस अजित नाथ रे को देश का मुख्य न्यायाधिपति बना दिया। उसकी पुरजोर पैरवी संसद में कानून मंत्री नहीं कर सके। विपक्ष का तर्कपूर्ण मुकाबला किया इस्पात मंत्री मोहनकुमार मंगलम ने जो एक निष्णात वकील थे। इस सिलसिले में कानून मंत्री रहे पूर्व जस्टिस पी. शिवशंकर का नाम भी उछलता रहा।
प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में कई वकील रहे होंगे। उन्होंने शाहबानो के प्रसिद्ध मुकदमे में गलत सलाह देकर कठमुल्ला ताकतों के सामने घुटने टेकने जैसा बना दिया। उनको राम जन्मभूमि स्थल का ताला खुलवाए जाने की गलत सलाह भी दी गई। अकेले आरिफ मोहम्मद खान जैसे मध्य क्रम के वकील सांसद थे जिन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से प्रगतिशील मुस्लिम महिलाओं का साथ दिया। इन्हीं दिनों वित्त और गृह मंत्री रहे वकील चिदंबरम की तूती बोलती रही। चिदंबरम आत्ममुग्ध व्यक्ति हैं। इस दोष के कारण दूसरों की कम सुनते रहे।
प्रधानमंत्री नरसिंह राव के समय कानून मंत्रालय की भूमिका गौण हुई। उस सरकार को चलाने का सारा श्रेय महानायक बनाए गए वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के खाते में आया। नरसिंह राव के कार्यकाल में खुलेआम बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। देश का कानून न्याय करने के बदले पनाह मांगता रहा। भाजपा के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सामने मुश्किल यही है कि उन्हें देश के श्रेष्ठतम वकीलों का सहयोग नहीं मिल रहा है। अरुण जेटली, रविशंकर प्रसाद और एटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी वगैरह देश के बहुत बड़े वकीलों फली नरीमन, अशोक देसाई, राजीव धवन, कपिल सिब्बल, के.एस. पाराशरन, अभिषेक मनु सिंघवी, पी.पी. राव, सोली सोराबजी वगैरह के समाने टिकने में कठिनाई महसूस करते हैं।
उत्तराखंड और अरुणाचल विधानसभाओं के मामलों में केन्द्र सरकार को गलत सलाह दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार की जबरदस्त खिंचाई की। केन्द्र सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के कॉलेजियम को रुखसत करने वाला अधिनियम भी नरीमन और रामजेठमलानी की खुली चुनौती का मुकाबला नहीं कर सका।
यक्ष प्रश्न है कि क्या वजह है कि वकील अपने ज्ञान और तर्क से आत्मसम्मोहित होने से जनाभिमुखी नेता नहीं बन पाते। देश के साधारण लोग मुअक्किल नहीं संविधान के निर्माता हैं। अरुण जेटली को वित्त मंत्री बनाकर नरेन्द्र मोदी ने खतरा ही उठाया है। सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लोगों की सलाह से आत्महत्या करने में सहूलियत होती है। अश्विनी कुमार की वजह से मनमोहन सिंह की सरकार पर पलीता तो लगा था। कई बड़े वकील राजनीतिक लगाव के कारण यहां वहां चोंच मारते जाते थे। जापान जाना होता तो चीन पहुंच जाते इस तरह वे दरअसल कहीं नहीं पहुंचते। रामजेठमलानी अकेले अपवाद हैं । वे हर पार्टी की मदद से बारी-बारी से लोकसभा या राज्यसभा पहुंच जाते हैं। वे जिस पार्टी का नमक खाते हैं उसको कभी नहीं बजाते। कभी कभी लगता है कि क्या समझकर कांग्रेस पार्टी ने के.टी.एस. तुलसी को राज्यसभा में पहुंचा दिया। आजादी के बाद के वकील यदि वकालत छोडक़र देशसेवा में लग जाएं तो गांधी की कसौटी के अनुसार उन्हें कसे जाने का इतिहास को अवसर मिले।

Pin It