रिवर फ्रंट परियोजना से गोमती का पुनर्जन्म रिवर फ्रंट परियोजना से गोमती का पुनर्जन्म

captureलंबे अर्से से उद्धार की राह देख रही गोमती नदी के दिन अब बदल रहे हैं। प्रदूषण, जल स्तर की कमी सहित अनेक समस्याओं से जूझ रही इस नदी का अस्तित्व ही संकट में आ गया था, जिसे दूर करने के लिए लम्बे समय से अनेक संगठन सहित पर्यावरण विज्ञानी लगातार मुहिम चला रहे थे। ऐसे में सूबे के मुखिया अखिलेश यादव द्वारा ‘गोमती रिवरफ्रंट डेवलपमेंट परियोजना’ के उद्घाटन को गोमती के पुनर्जन्म के रूप में देखा जा सकता है। इस परियोजना के अंतर्गत गोमती के दोनों तटों पर डायफ्राम वाल बनाकर सौन्दर्यीकरण सहित साइकिल, तांगा ट्रैक, वाटर स्पोर्ट्स और क्रीड़ास्थल के विकास की योजना को अल्प समय में ही साकार कर देना प्रशंसनीय है। 

इसके पूर्व पिछले साल फरवरी में यूपी सरकार ने इस दिशा में कार्य करना शुरू कर दिया था, जिसके अंतर्गत गोमती नदी की सफाई के लिए लखनऊ में कुडिय़ाघाट पर 120 मीटर लंबा और 22 मीटर चौड़ा अस्थाई बैराज बनाकर पानी रोका गया था। देश में ऐसा पहली बार हुआ। जब नदी की धारा को रोककर उसकी सफाई का काम किया गया। इससे गोमती की सफाई के साथ उसमें पानी की कमी का भी संकट दूर हो जाने की संभावना है। इसके लिए गोमती से शारदा व घाघरा नदी को जोड़े जाने की योजना है, जिससे उसमें हर समय पर्याप्त पानी बना रहे। गोमती नदी का उद्गम स्थल पीलीभीत में माधो टांडा में अवस्थित है, जहां पर इसका डिस्चार्ज 1. 50 लाख हजार क्यूसेक है। इस परियोजना के शुरू हो जाने से गोमती-घाघरा-शारदा एवं गंगा नदी को लिंक किया जाएगा, जिससे गोमती नदी में पर्याप्त जल स्तर बना रहे। इसके साथ ही पर्याप्त जल स्तर बनाये रखने के लिए शारदा नहर प्रणाली के दो स्केपों के माध्यम से भी पानी लाने का कार्य किया जाना है।

पीलीभीत के गोमद ताल (फुलहर झील) से निकलकर गाजीपुर के समीप कैथी में गंगा से मिलने तक गोमती करीब नौ सौ किलोमीटर का सफर तय करती है। यह अकेली ऐसी नदी है, जिसका उद्गम और संगम उत्तर प्रदेश में ही होता है। इस दौरान गोमती शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, सीतापुर, हरदोई, बाराबंकी, सुल्तानपुर, जौनपुर समेत एक दर्जन जिलों से होकर गुजरती है। बहुत कम लोगों को पता होगा कि उत्तर प्रदेश का राज्यचिन्ह मछली इसी गोमती से निकले एक मछली के प्रकरण से जुड़ा है। इसके बाद भी इस नदी की खूब उपेक्षा हुई।

प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के आधार विचार पुरुष डॉ. लोहिया नदियों के संरक्षण के बड़े हिमायती थे। वह स्वयं गोमती नदी सहित अन्य नदियों की साफ-सफाई के लिए बेहद फिक्रमंद रहे। लोहिया ने करीब 50 वर्ष पहले ही नदियों की सफाई की मांग रखी थी। उनका कथन था कि यदि मैं राजनीति न करता और स्कूल में अध्यापक होता, तो नदियों के इतिहास को समझने का प्रयास करता। राम की अयोध्या सरयू के किनारे, कुरु, पांचाल, मौर्य और गुप्त गंगा के किनारे, मुगल और शौरसेनी नगर और राजधानियां यमुना के किनारे रहीं हंै। उन्होंने कहा था कि सभी सहायक नदियों को साफ करने के बाद ही गंगा की सफाई हो सकती है। तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि केंद्र सरकार गोमती नदी की सफाई करा दे तो गंगा नदी भी साफ हो जाएगी। नदियों से जुड़ी समस्या के निदान के लिए उन्होंने कहा था, क्या हिंदुस्तान की नदियों को साफ रखने और करने का आंदोलन उठाया जाए? अगर यह काम किया जाए तो दौलत के मामले में भी फायदा पहुंचाया जा सकता है। मैं चाहता हूं कि इस काम में, न केवल सोशलिस्ट पार्टी के बल्कि और लोग भी आएं, सभाएं करें, जुलूस निकालें, सम्मेलन करें और सरकार से कहें कि नदियों के पानी को भ्रष्ट करना बंद करो, फिर सरकार को नोटिस दें कि 3-6 महीने के भीतर वह नदियों का गंदा पानी खेतों में बहाए, इसके लिए खास खेत बनाए, और वह अगर यह न करें तो मौजूदा नालियों को तोडऩा पड़ेगा, इससे हिंसा नहीं होती।
नदियां पुरातन काल से ही मानव जीवन के सभी पहलुओं के साथ गहरे तक अंतर्संबंधित हैं। तकनीकी विकास के पहले और बाद में भी विश्व के अधिकांश भागों में रहने वाले लोगों के जीवन में नदियों के महत्व को आसानी से समझा जा सकता है। हाल ही में गहराए कृषि संकट से निपटने में नदियों और उनसे जुड़ी सहायक नदियों का महत्व किसानों की दृष्टि से बेहद अहम् हो जाता है। राहत की बात है कि वर्तमान अखिलेश सरकार ने सिंचाई और जलसंसाधनों का किसानों के लिए प्रयोग की दिशा में आसान राह बनाने में मदद किया। सरयू नहर परियोजना का बेहतर विकास करके छह हजार हेक्टेयर सिंचन क्षमता में वृद्धि, बाण सागर परियोजना का सुधार करके पूर्व से पचास हजार हेक्टेयर सिंचन क्षमता वृद्धि, गंडक नदी के इतिहास में पहली बार सम्पूर्ण नहर प्रणाली की सफाई कर चार हजार क्यूसेक अतिरिक्त पानी की व्यवस्था सहित आजमगढ़ में 961 किमी. लम्बाई के नहरों का पुनरूद्धार जैसी पहल गांव-किसान से लेकर आम जन के जीवन को प्रभावित करने वाली है।

यूपी की राजधानी की बीस लाख आबादी अपने पेयजल के लिए गोमती के पानी पर ही निर्भर है। इसी वजह से गर्मियों में इसके जलस्तर में कमी से लखनऊ में पीने के पानी का संकट गहरा जाता है। इस गंभीरता को दृष्टिगत रखते हुए युवा मुख्यमंत्री द्वारा गोमती की समस्या को समग्रता में समझते हुए उसके निदान के लिए किया जाने वाला यह प्रयास गंभीर और बेहद जरूरी भी है। साथ ही इसके माध्यम से राष्ट्रीय नदी गंगा को लेकर चल रहे सफाई अभियान को भी बड़ी मदद मिलने के रूप में देखा जा सकता है। पानी के सर्वव्यापी संकट और उसके बाजारीकरण के दौर में जल के प्राकृतिक संसाधनों का समुचित देखभाल करना सरकारों का नैतिक कर्तव्य है। साथ ही अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ जल और नदी के महत्व को देखते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने कई फैसलों में नदी विषयक समस्याओं के निदान में सरकारों को त्वरित और ठोस कार्य करने के लिए आदेशित, निर्देशित किया है। देश के नागरिकों को भी संविधान के भाग 4 में मूल कर्तव्य के अंतर्गत 51 क में (छ) के तहत नदी, झील सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन की बात कही गयी है। इसके पालन करने से ही जल संकट से जुड़े मसलों का समय रहते समाधान निकाला जा सकता है,जिसमें सरकारें सहयोगी भूमिका निभाते हुए नदियों को लेकर कारगर नीतियां बनाकर सकारात्मक असर पैदा कर सकती है।

प्रदेश की सत्ताधारी समाजवादी पार्टी के आधार विचार पुरुष डॉ. लोहिया नदियों के संरक्षण के बड़े हिमायती थे। वह स्वयं गोमती नदी सहित अन्य नदियों की साफ-सफाई के लिए बेहद फिक्रमंद रहे। लोहिया ने करीब 50 वर्ष पहले ही नदियों की सफाई की मांग रखी थी। उनका कथन था कि यदि मैं राजनीति न करता और स्कूल में अध्यापक होता, तो नदियों के इतिहास को समझने का प्रयास करता। राम की अयोध्या सरयू के किनारे, कुरु, पांचाल, मौर्य और गुप्त गंगा के किनारे, मुगल और शौरसेनी नगर और राजधानियां यमुना के किनारे रहीं है। उन्होंने कहा था कि सभी सहायक नदियों को साफ करने के बाद ही गंगा की सफाई हो सकती है।

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