राजनीतिक यात्राओं पर ‘नोटबंदी’ का ग्रहण

  • पार्टियां दिग्गज नेताओं के एड़ी चोटी का जोर लगाने के बावजूद नहीं बटोर पा रहीं सुर्खियां
  • नोट बंद होने की खबरों से प्रभावित हो रहे पार्टियों में प्रचार-प्रसार के लिए चल रहे अभियान

 सुनील शर्मा

captureलखनऊ। नोटबंदी कालाधन रखने वालों पर गाज गिराने के साथ राजनीतिक पार्टियों के मंसूबों पर भी पानी फेर रही है। विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे सियासी दलों के विभिन्न अभियानों व कार्यक्रमों पर नोटबंदी का ग्रहण लग गया है। दिग्गज नेताओं के एड़ी चोटी का जोर लगाने के बावजूद ये यात्राएं व अभियान सुर्खियां नहीं बटोर पा रहीं हैं। नोटबंदी का आदेश और क्रियान्वयन होने के बाद चुनावी यात्राओं और अभियानों की खबरें गुम सी गई हैं। लाख प्रयासों के बावजूद जनता के बीच पहुंचकर समर्थन हासिल करने का उद्देश्य सफल होता नहीं दिख रहा है। इससे राजनीतिक पार्टियों के रणनीतिकारों के माथे पर चिन्ता की लकीरें खिंच गई हैं। जो रैली पर लाखों रुपये खर्च होने के बाद भी जनता के बीच लोकप्रिय न हो पाने की खीझ स्पष्ट कर रहा है।
उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनाव के मद्देनजर सभी राजनीतिक दल विभिन्न रैलियों और कार्यक्रमों के माध्यम से खुद को मजबूत करने का प्रयास कर रहे हैं। सपा रथयात्रा निकाल रही है, बीजेपी परिवर्तन यात्रा निकाल रही है। बसपा भाईचारा सम्मेलन आयोजित कर रही है। इन यात्राओं और सम्मेलनों का मकसद अपने वोट बैंक में इजाफा करना है। लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आठ नवंबर को पांच सौ के पुराने व हजार रुपये के नोट बंद करने की घोषणा ने सबकी मंशा पर पानी फेर दिया। जनता राजनीतिक पार्टियों की यात्राओं और सम्मेलनों को भूलकर नोट जमा करने, पुराने नोट बदलवाने और बैंकों से नोट निकालने में जुट गई है। इस फैसले को सप्ताह भर का समय बीत चुका है लेकिन सोशल मीडिया पर चर्चाओं का दौर अभी भी जारी है। टेलीविजन चैनल और अखबारों में नोटबंदी और जनता को होने वाली समस्या को महत्व दिया जा रहा है। इस वजह से राजनीतिक पार्टियों की जन समर्थन हासिल करने की सारी योजनाएं फीकी पड़ गई हैं। गली नुक्कड़ हो या चौराहे सभी जगहों पर केवल नोटबंदी की ही चर्चा हो रही है।

बसपा का भाईचारा भी हुआ गुम

बसपा सोशल इंजीनिरिंग फार्मूले के माध्यम से 2007 के स्वर्णिम काल को दोहराने का ख्वाब संजोए हुए है। दलित ब्राह्मïण मुस्लिम गठजोड़ से प्रदेश की सत्ता हासिल करने की कोशिश में जुटी है। प्रदेश भर में भाईचारा सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है, जिसकी कमान खुद पार्टी के महासचिव सतीश चंद्र मिश्र ने संभाली है। वह ब्राह्मïणों को लुभाने के लिए आयोजित सम्मेलनों में शिरकत कर रहे हैं। उन्होंने कुल 65 भाईचारा सम्मेलन आयोजित करने की योजना बनाई है। अब तक दर्जन भर से अधिक सम्मेलन हो चुके हैं। वहीं मुस्लिमों को लुभाने के लिए महासचिव व नेता विपक्ष विधान परिषद नसीमुद्दीन सिद्दीकी व उनके पुत्र को लगाया गया है। जोकि प्रदेश के कई जिलों में दलित मुस्लिम भाईचारा सम्मेलनों को संबोधित कर रहे हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती भी आए दिन बयान जारी कर रही हैं। जोकि नोटबंदी को लेकर चली चर्चाओं की आंधी में तिनके की तरह उड़ गई हैं।
अधिकांश राजनीतिक दलों के कार्यक्रम हुए बेकार
राहुल गांधी की संदेश यात्रा व खाट सभा से सुर्खियों में आई कांगे्रस को पहले तो महागठबंधन की सुगबुगाहटों ने बैकफुट कर दिया। इसके बाद रही सही कसर नोटबंदी की खबर ने पूरी कर दी। पार्टी ने जोर शोर से कार्यकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें प्रदेश से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित, प्रदेश प्रभारी गुलाम नवी आजाद, प्रदेश अध्यक्ष राजबब्बर समेत अन्य दिग्गज नेताओं ने भी भाग लिया। लेकिन पार्टी अभी तक सुर्खियां बटोरने में नाकाम रही। इतना ही नहीं शीला दीक्षित के अनुभव के भी कार्यकर्ताओं में जोश नहीं जाग रहा है। इसी तरह राष्टीय लोकदल, आम आदमी पार्टी समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों के कार्यक्रम भी नोटबंदी की चर्चाओं और जनसमस्याओं के बीच गुमन हो गये हैं। इसलिए अब सभी दलों ने कुछ दिनों के लिए राजनीतिक कार्यक्रम और
आयोजन करने से तौबा कर ली है। इक्का-दुक्का कार्यक्रम ही होंगे।

भाजपा की यात्रा पर दिखा सबसे अधिक असर

भाजपा की तरफ से प्रदेश के चारों कोनों से परिवर्तन यात्राएं निकाली गई हैं। इन यात्राओं को सफल बनाने की जिम्मेदारी पाार्टी के महत्वपूर्ण नेताओं को दी गई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने परिवर्तन यात्रा को खुद हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। इसके साथ ही जगह-जगह आयोजित सम्मेलनों में भी शिरकत कर रहे हैं। सोमवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गाजीपुर में आयोजित सम्मेलन में हिस्सा लिया था। इसके अलावा केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, मनोज सिन्हा, जनरल वीके सिंह, थावर चंद्र गहलोत, डॉ. महेंद्र नाथ पांडेय समेत एक दर्जन से अधिक केंद्रीय नेता परिवर्तन यात्रा की कमान संभाल रहे हैं। वहीं यूपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्य, फायर ब्रांड नेता विनय कटियार समेत दर्जनों सांसद भी हिस्सा ले रहें हैं। पार्टी ने बीच-बीच में प्रधानमंत्री की जनसभा, युवा, पिछड़ा वर्ग सम्मेलन, परिवर्तन पंचायत आयोजित करने का भी निर्णय लिया है। सूबे में 75 हाइटेक रथयात्रा के अलावा 2000 बाइक सवार भी प्रचार प्रसार में निकले हैं, जिसे राष्टï्रीय अध्यक्ष अमित शाह ले रवाना किया। लेकिन ये सभी कार्यक्रम नोटबंदी के चलते अपेक्षा के अनुरूप सुर्खियां बटोरने में असफल साबित हुए हैं।

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