यूपी में 27 साल के वनवास को खत्म करने की कांग्रेस की कोशिशें नहीं चढ़ रहीं परवान

  • राहुल की खाट पंचायत व संदेश यात्राएं भी नहीं जगा पा रहीं जोश
  • शीला दीक्षित भी नहीं बटोर सकीं सुर्खियां, पीके भी साबित हो रहे बेअसर

सुनील शर्मा
captureलखनऊ। प्रदेश की सत्ता में 27 साल से वनवास झेल रही कांग्रेस की इसे तोडऩे की कोशिशें परवान नहीं चढ़ पा रहीं हैं। उपाध्यक्ष राहुल गांधी की खाट पंचायतों और संदेश यात्राओं के नतीजे भी कांग्रेसजनों में उत्साह पैदा करने में नाकाफी साबित हुए हैं। पीके भी अभी तक कोई कमाल नहीं दिखा पाए हैं। चार महीने तक उत्तर प्रदेश को मथने की कोशिश भी उम्मीदों को पर लगाने में असफल नजर आ रही है। इससे पार्टी को एहसास हो गया है कि वनवास के टूटने के आसार नहीं हैं। इसके बाद से पार्टी के रणनीतिकारों ने प्रदेश में महागठबंधन की संभावनाओं पर निगाहें गड़ा दी हंै। आए दिन आने वाले वरिष्ठï नेताओं के बयान से यही लगता रहा है कि पार्टी महागठबंधन का हिस्सा बनने को बेकरार है।
देश की राजनीति में कभी एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस उत्तर प्रदेश में पिछले 27 साल से सत्ता से बाहर है। 1990 के बाद से प्रदेश ने कांग्रेस को निराश ही किया। अपने इस वनवास को खत्म करने के लिए पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी एड़ी चोटी का जोर लगाए हुए हैं। ‘सत्ताइस साल प्रदेश बेहाल’ का नारा देते हुए निकली संदेश यात्रा व खाट पंचायतों के माध्यम से वे इसे तोडऩे की कोशिश में भी जुटे, लेकिन इसके नतीजे अपेक्षा के अनुरूप नहीं आए हैं। इससे पार्टी में उत्साह कम हुआ है। ब्राह्मïण मतदाताओं को अपनी तरफ खींचने के लिए दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को ब्राह्मïण चेहरे के रूप में पेश करते हुए मुख्यमंत्री के उम्मीदवार के रूप में उतारा। महीनों से दौड़ भाग कर रहे राहुल गांधी को यहां भी निराशा ही हाथ लगी। प्रदेश में शीला सुर्खियां बटोरने में नाकामयाब रहीं। वे ज्यादातर विपक्ष के निशाने पर रही हैं। प्रदेश में नेतृत्व परिवर्तन के बाद प्रदेश अध्यक्ष की बागडोर संभाल रहे राज बब्बर की कार्यशैली को लेकर भी कांग्रेस में होने वाली चर्चा उत्साहप्रद नहीं हैं। निजी बातचीत में वरिष्ठï कांग्रेसी अब यह मानते हैं कि पार्टी राहुल गांधी व ग्लैमर के भरोसे सत्ता में वापस नहीं आ सकती। प्रदेश की जमीनी राजनीति की समझ रखने वालों के मुताबिक कांग्रेस का प्रदेश में अब यह हाल हो गया है कि अपना राजनीतिक वजूद बचाए रखने के लिए उसे अब गठबंधन रूपी बैसाखी की तलाश है। बिहार के बाद अब उत्तर प्रदेश में भी न चाहते हुए विरोधी दलों के साथ महागठबंधन में शामिल होना सियासी मजबूरी बन गर्ई है। बीते दिनों महागठबंधन में सीएम चेहरे के रूप में अखिलेश की पैरवी कर राहुल गांधी ने भी कुछ ऐसा ही इशारा किया है। हालांकि पूर्ववर्ती सप्रंग सरकार में सहयोगी रहने के दौरान सपा व कांग्रेस के संबंधों में कड़वाहट ही भरी रही। सपा के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन का अनुभव कभी भी अच्छा नहीं रहा है। राहुल की कोशिशों को झटका

राहुल की कोशिशों को झटका

प्रदेश में कांग्रेस को खड़ा करने की कोशिशों को पार्टी के ही आठ विधायकों ने झटका दिया है। 28 में से आठ विधायकों ने पार्टी से नाता तोडक़र कांग्रेस के विपरीत हवा चलने का संदेश दिया है। पार्टी को सबसे बड़ा झटका खुद राहुल गांधी के निर्वाचन क्षेत्र अमेठी ने दिया। तिलोई के वर्तमान विधायक मो. मुस्लिम ने कांगे्रस को छोडक़र अब बसपा से नाता जोड़ लिया है। विधायकों के पार्टी छोडऩे से यह संदेश गया कि अब राहुल के अपने ही गढ़ में कांग्रसियों को उनके भरोसे जीत की उम्मीद नहीं है। पीके व उनकी टीम की कार्यशैली ने भी कांगे्रसजनों को नाराज करने का काम किया है। इससे कांग्रेस नेताओं व कार्यकर्ताओं में उत्साह बढऩे की बजाय घट रहा है।

प्रियंका का भी जादू शायद चले

प्रदेश की राजनीति में प्रियंका गांधी को उतारने की मांग काफी दिनों से चली आ रही है, जोकि प्रदेश में मिली नाकामियों से पैदा हुई निराशा से बाहर निकलने की ओर एक कदम है। कांग्रेसियों का वह धड़ा जिसके लिए नेहरू गांधी परिवार ही पार्टी का आदि और अंत है, उसके लिए प्रियंका गांधी आखिरी उम्मीद हैं। यह धड़ा अब प्रियंका को भी आजमा लेना चाहता है। हालांकि अब इसे लेकर पार्टी के अंदरखाने में उत्साह नहीं रह गया है। उन्हें आशंका है कि कांगे्रस की बदहाल स्थिति में प्रियंका भी कोई जादू शायद ही चल पाएं। सिर्फ चुनाव के दौरान ही दिखने के कारण विपक्ष व क्षेत्रीय लोगों के आरोपों से प्रियंका की लोकप्रियता में आई गिरावट को इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है।

Pin It