मोदी जी हम तो अपने खातों का हिसाब देने को तैयार हैं, आप अपनी और बाकी पार्टियों के खातों का हिसाब कब देंगे?

करोड़ों रुपये रखती हैं राजनीतिकपार्टियां, नहीं देता कोई हिसाब

11राजनीतिक पार्टियों के पास करोड़ों का काला धन जमा है। कोई एक दूसरे पर कितने भी आरोप-प्रत्यारोप लगाये मगर आप को छोडक़र कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने खातों का हिसाब देने को राजी नहीं है। 20 हजार रुपये से ऊपर चंदे का हिसाब देना पड़ता है। इसलिए अरबों का चंदा 20 हजार से कम रसीद काटकर दिखाया जाता है। गांवों में किसान और मजदूर बैंकों में लाइन लगाकर नोट बदलने को परेशान हो रहे हैं, जिससे वे अपना और अपने बच्चों का पेट पाल सकें। देश में नोटबंदी के चलते 75 से अधिक लोग अपना दम तोड़ चुके हैं। देश के आम आदमी के खातों को आयकर विभाग तलाशने में जुटा है और कहीं से 50 हजार रुपये भी आ गये तो उसका हिसाब मांगा जा रहा है। मगर राजनीतिक दलों के हजारों करोड़ का हिसाब कोई नहीं मांग रहा है। अभी भी हर पार्टी की रैली में करोड़ों रुपये फूंके जा रहे हैं। कोई पार्टी नहीं बता रही है कि करोड़ों का यह पेमेंट आखिर चेक से हो रहा है या नगदी से। अलबत्ता बेटी की शादी को परेशान बाप से कहा जा रहा है कि वह टेंट वाले, फूल वाले और हलवाई का भुगतान चेक से करे। बड़ा सवाल यह है कि क्या देश का गरीब और आम आदमी ही हर बात का जवाब दे और नेता किसी बात का नहीं।

पैसे का स्रोत न बताना पड़े इसलिए दिखाती हैं बीस हजार से कम का चंदा

संजय शर्मा
लखनऊ। गोरखपुर के रास्ते में पड़े ढाबे पर बात करते-करते 72 वर्षीय राम किशन रो पड़े। चार दिन बाद बेटी की शादी है और हलवाई ने बिना नगद पैसे लिए खाना बनाने को मना कर दिया। तीन दिन से बैंक जा रहे हैं मगर बैंक में पैसा नहीं है। उनका सवाल जायज है कि उनके पास खून-पसीने की मेहनत का बीस हजार रुपया आखिर काला धन कैसे हो गया। पूरे देश में हर राम किशन की यही हालत है। देश का आम आदमी अपनी छोटी पूंजी को लेकर परेशान है और उसे 50 हजार रुपये जमा कराने पर भी आयकर विभाग सवालों के घेरे में खड़ा कर रहा है। मगर देश की लगभग हर पार्टी हजारों करोड़ की ब्लैक मनी से अपना साम्राज्य खड़ा कर रही है। देश में कई बार यह आवाज उठाई गई कि राजनीतिक पार्टियां भी सूचना के अधिकार के दायरे में लाई जायें और वे अपने धन का स्रोत बतायें। मगर काला धन रखने के मामले में सभी ये नेता एक-दूसरे का पूरा ख्याल रखते हैं। लिहाजा हमारे और आपके ऊपर तो बंदिशों का पहाड़ खड़ा किया जा रहा है मगर ये राजनेता और ये पार्टियां ब्लैक मनी से दिन रात फल-फूल रही हैं।
पिछला लोकसभा चुनाव देश का सबसे महंगा लोकसभा चुनाव था। दर्जनों चार्टर प्लेन और सैकड़ों हेलीकॉप्टर तथा टीवी और अखबारों में दिन-रात आते विज्ञापनों ने साबित कर दिया था कि कॉरपोरेट हाउस किस तरह देश के चुनावों को प्रभावित करने की कोशिशों में जुटे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 20 हजार करोड़ से ज्यादा चुनाव में खर्च किया जबकि कांग्रेस ने 5 हजार करोड़ से ज्यादा चुनाव में खर्च किया। दोनों राष्टï्रीय पार्टियों ने चुनाव आयोग को दिये खर्च के ब्यौरों में धनराशि एक हजार करोड़ से काफी कम दिखाई है। जाहिर है ये बाकी पैसा उद्योगपति खर्च करते हैं और बदले में सरकार बनने पर इसकी दोगुनी वसूली करना चाहते हैं।
आम आदमी यही सोच-सोचकर परेशान है कि वह अपने पैसे को कैसे बैंक से निकाल सके। सरकार रोज धमकी भरे स्वर में उसको चेतावनी जारी कर रही है। मगर कांग्रेस हो या भाजपा, सपा हो या बसपा, कोई भी अपने खाते को सार्वजनिक करने को तैयार नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण यही है कि सभी पार्टियां बड़ी संख्या में ब्लैक मनी जमा करती हैं और उससे अपनी ताकत खड़ी करती हैं।
गोमतीनगर में रह रहे प्रभात झा का कहना है कि हमारे खून-पसीने के पैसे बैंक में जमा कराये जायेंगे और फिर कोई विजय माल्या या ललित मोदी हमारे पैसे लेकर रफू-चक्कर हो जायेगा। वे गुस्से से कहते हैं कि नेताओं के मगरमच्छ जैसे आंसुओं पर जाकर अपनी मूर्खता का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए और अपने-अपने स्तर से हर पार्टी के नेताओं को कहना चाहिए कि अगर हमारा हिसाब मागना है तो पहले अपना हिसाब दो। जाहिर है ऐसी बातें राजनेताओं को भांती नहीं हैं।
मजे की बात ये है कि चंदा लेने वाली पार्टियां इस बात से कोई मतलब नहीं रखतीं कि उन्हें चंदा देने वाला कौन व्यक्ति है और उसका काम क्या है। बीफ खाने पर पूरे देश में हंगामा मचाने वाली भाजपा को बीफ एक्सपोर्ट कंपनियों से चंदा लेने में कोई समस्या नहीं है। चुनाव आयोग की वेबसाइट पर बीजेपी को चंदा देेने वाली कई बीफ कंपनियों की लिस्ट शामिल है।
राष्टï्रीय राजनीतिक दलों में वित्तीय वर्ष (2014-15) में भाजपा को 437 करोड़ का चंदा मिला है और इस चंदे में उससे पहले के वित्तीय वर्ष के मुकाबले 150 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इसमें सबसे ज्यादा चंदा भाजपा को मिला है। ये धनराशि चार राष्टï्रीय दलों, कांग्रेस, राकांपा, भाकपा और माकपा को मिले चंदे से दोगुने से भी ज्यादा है। मजे की बात ये है कि राष्टï्रीय दल बसपा की सुप्रीमो मायावती पर टिकट लेकर भारी धनराशि लेने के कितने भी आरोप लगें मगर उन्होंने कहा है कि उसको पिछले वित्तीय वर्ष में कोई चंदा नहीं मिला है।
चंदा देने में वीर सत्या इलैक्टोरल ट्रस्ट सबसे आगे है। इस ट्रस्ट ने भाजपा, कांग्रेस और राकांपा को साल भर में 132 करोड़ का चंदा दिया। जनरल इलैक्टोरल ट्रस्ट ने 2013-14 में किसी दल कोई चंदा नहीं दिया मगर इसके अगले वर्ष 117.30 करोड़ रुपये भाजपा और कांग्रेस को दे दिये। इसमें भाजपा को 63.20 करोड़ और कांग्रेस को 54.10 करोड़ रुपये दिये। कांग्रेस ने 38 प्रतिशत चंदा इसी ट्रस्ट से लिया मगर पार्टी ने एक बार भी ट्रस्ट के पैन नम्बर की जानकारी नहीं ली। वहीं भाजपा ने सिर्फ एक बार 20 लाख रुपये की रकम के सामने इस ट्रस्ट के पैन नम्बर का जिक्र किया। उत्तर प्रदेश में चुनाव से पहले रथयात्राएं और रैलियां शुरू हो गई हैं। हर रैली में करोड़ों खर्च हो रहे हैं मगर खातों में सिर्फ कुछ लाख दिखाये जा रहे हैं। जाहिर है ये सारा पैसा काला धन है। ऐसे समय में देश का आम आदमी नोटबंदी से दम तोड़ रहा हो तब उसके पैसे पर नेताओं की ये अय्याशी नहीं तो और क्या है।

गांव के किसान का खाता देखा जा रहा है, नेता अपनी पार्टी का खाता दिखाने को तैयार नहीं

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