मैं जिंदगी को नहीं छोडऩा चाहती: गीताश्री

आप उनसे मिलेंगे तो उनके मुरीद हुए बिना नहीं रह सकेंगे। दिखने में कडक़ और गंभीर लेकिन जब आप उनको सुनेंगे तो उनकी वाकपटुता और बीच-बीच में उनके हास्य-व्यंग्य से आपका प्रभावित होना तय है। पत्रकारिता, साहित्य लेखन, घर-परिवार और सामाजिक दायित्यों का निर्वहन एक साथ करना आसान नहीं है, लेकिन पिछले दो दशक से वह सारी जिम्मेदारियों का बखूबी निर्वहन कर रही हैं। पत्रकारिता को अपना जुनून मानती हैं, तो कविता को अपना प्यार। स्त्री विमर्श का तमगा लगा तो सहर्ष स्वीकार कर लिया, जबकि लेखनी की ऐसी कोई विधा नहीं है जिस पर उनकी पकड़ न हो। स्त्री विमर्श के तमगे पर कहती है-‘ये सोची-समझी पुरुष सत्ता की साजिश है। स्त्री जो भी लिखे उसे स्त्री विमर्श करार दिया जाता है। इस पर हम क्या कर सकते हैं, जिसको जो समझना हो समझे।’ जी हां, हम बात कर रहे हैं पत्रकार व साहित्यकार गीताश्री की। 4पीएम की स्थानीय संपादक प्रीति सिंह ने गीताश्री से उनकी निजी जिंदगी से लेकर पत्रकारिता और साहित्य लेखन के बारे में ढेर सारी बातें की। पेश है बातचीत के प्रमुख अंश-

61क्तपत्रकारिता और साहित्य लेखन, दोनों आप साथ-साथ कर रही हैं। दोनों में दिल के करीब किसको पाती हैं?
देखिए, साहित्य के चक्कर में पत्रकारिता छूट-सी गई है। मेरे लिए पत्रकारिता पैशन है तो साहित्य पनाहगाह। जब कुछ नहीं होता है तो साहित्य होता है। मगर बात करूं रूचि की तो पत्रकारिता में ज्यादा है। दरअसल पत्रकारिता की दुनिया अपेक्षाकृत साहित्य की तुलना में ज्यादा खुली और उदार है। पत्रकारिता में आप किसी के पक्ष में खुल कर खड़े हो जाते हैं, लेकिन साहित्य में ऐसा नहीं है। साहित्य में यथार्थ और आदर्श के तालमेल में आप उलझ जाते हैं। साहित्य में आप प्रतिरोध की लड़ाई लड़ते हैं। पत्रकारिता में आप फैक्ट की बात करते हैं। लेकिन साहित्य फैक्ट से थोड़ा दूर होता है। इमेजिनेशन ज्यादा होता है।

क्त पत्रकारिता और घर परिवार की जिम्मेदारियों के बीच अपने लेखन के लिए समय कैसे चुराती हैं?

यह मल्टीटास्किंग का जमाना है। मेरी जैसी बहुत सी औरतें हैं जो नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ लेखन भी कर रही हैं। दरअसल लिखना आपकी आतंरिक जरूरत है। आतंरिक जरूरत को पूरी करने के लिए आप बाहरी जरूरतों को पूरा करने के बीच में से थोड़ा सा समय अपने लिए चुराते हैं। सच बताऊं तो स्त्री के पास सब काम के लिए समय है, बस लेखन के लिए नहीं है। सोचिए, ऐलिस मुनरो को साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार मिला। जबकि उनके पास इतना समय नहीं होता था कि वह उपन्यास लिख सकंे। इसलिए वह छोटी-छोटी कहानियां लिखती थीं। किचन में काम करने के दौरान उनको कोई कहानी सूझ गई तो वहीं लिख लेती थीं। उन्होंने कभी कल्पना नहीं की थी कि उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलेगा। एलिस मुनरो को देखती हूं तो मुझे बहुत ढांढस मिलता है। वो हाउस वाइफ थी, जिसके पास लिखने के लिए वक्त नहीं होता था लेकिन अपनी जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने लिखा तो हम क्यों नहीं कर सकते। हमें भी अपने दायित्यों को पूरा करते हुए ही लिखना है। पश्चिमी विचारक वर्जिनिया वुल्फ कहती हैं कि वही स्त्री लिख सकती है जिसके पास खूब पैसा और खूब एकांत होगा। लेकिन आप देखिए, जिस स्त्री के पास खूब पैसा है उसके पास एकांत नहीं है और जिसके पास खूब एकांत है उसके पास प्रतिभा नहीं है। वह लिख नहीं सकती। बहुत सारा अंतर्विरोध है। इन विरोधाभासों के बीच एक स्त्री अपने लिए थोड़ा सा समय चुराकर लिख लेती है। लेकिन जिस तरह से रचनात्मकता आनी चाहिए स्त्रियों की, नहीं आ रही, इसलिए नौकरी, बच्चा, घर-परिवार उसके बाद लेखन।

क्तआखिर ऐसा माहौल क्यों है, क्या खास वजह है इसके लिए?

चुकी हम औरतें लेखन को प्राथमिकता में नहीं रखती हंै। मेरी खुद की फिलॉसफी है। हमें अपने जीवन में तीन काम करना है, बच्चा बड़ा करना है, खूब जीना है और तब जाकर लिखना है। अगर मुझे कोई कहे एक कहानी लिख कर दो और कोई ये कहे कि पार्टी करनी है तो मैं पहले पार्टी करूंगी, उसके बाद लिखूंगी। मैं जिंदगी को छोडऩा नहीं चाहती। मन में एक डर रहता है कि लिखने के चक्कर में कहीं जिदंगी हाथ से न निकल जाए। उसी तरह लिखने के चक्कर में कहीं अपने न छूट जाएं क्योंकि हमें सब चाहिए। घर की कीमत पर लेखन नहीं चाहिए।

क्तपत्रकारिता, साहित्य लेखन के साथ-साथ घर परिवार व सामाजिक जिम्मेदारियां निभाना आसान नहीं। आप कैसे सामंजस्य बिठाती हैं?
यह किसी के लिए आसान नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि परिवार का थोड़ा भी सहयोग मिल जाता है तो स्त्रियां सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन आसानी से कर लेती हैं। मेरे साथ भी ऐसा ही है। मेरे पति अजीत अंजुम का पूरा सहयोग है। शायद इसीलिए सब आसानी से कर ले रही हूं।

क्तकहानी, कविता और लेख आपकी प्रमुख विधाएं हैं । इसमें कौन ज्यादा पसंद है?

कहानी लिखने में मजा आता है लेकिन प्रेम मैं कविता से करती हूं। मैं खराब कहानी पढ़ सकती हूं, लेकिन खराब कविता मुझे बर्दाश्त नहीं। मैं अपने को कविता की जानकार मानती हूं, क्योंकि एमए में कविता मेरा विषय था। मैं कहानी लिखती हूं, लेकिन मैं कहानी को अभी तक उस तरह नहीं समझ पायी हूं जिस तरह से कविता को समझती हूं। अब आप मेरे कविता प्रेम को इस तरह भी समझ सकती हैं कि मेरी प्रत्येक कहानी में आपको कविता मिलेगी। मेरी कहानी का किरदार कविता है । जब मैं बहुत उदास होती हूं तो कविता के पास जाती हूं। कविता से प्रेम के सवाल पर मेरा भी वही जवाब है जो हरिवंश राय बच्चन जी का है। उनसे किसी ने पूछा था कि आपके लिए कविता क्या है? तो उन्होंने कहा था ‘कविता वह है जो आपके दुख को आधा और सुख को दूना कर दे।’

क्तआप पर अक्सर ये आरोप लगाया जाता है कि आप पुरुष विरोधी हैं?

देखिए, मैं पुरुषों की विरोधी नहीं बल्कि पुरुषवादी मानसिकता की विरोधी हूं। हजारों मंच से मैं इस बात को कह चुकी हूं कि हमारी लड़ाई उस मानसिकता के साथ है जो औरत पर अपना मालिकाना हक समझते हैं। ‘तुम्हीं से मोहब्बत, तुम्ही से लड़ाई,’ फिर हम तुमको दुश्मन कैसे मान सकते हैं। क्योंकि होना, सोना दुश्मन के साथ नहीं, साथी के साथ होता है।
क्तछत्तीसगढ़ की आदिवासी लड़कियों की तस्करी पर शानदार रिपोर्टिंग के लिए आपको रामनाथ गोयनका पुरस्कार मिला? उसी घटना को आपने किताब की शक्ल दी। सच्ची

घटना को किताब की शक्ल में ढ़ालने का अनुभव कैसा रहा?

किसी की पीड़ा को महसूस करना और उसे अपनी लेखनी में उड़ेलना आसान नहीं। रिपोर्टिंग के दौरान ही आदिवासी लड़कियों की दुर्दशा देखकर मैं द्रवित हो उठी थी, लेकिन किताब लिखने में मुझे उससे ज्यादा पीड़ा हुई। खैर मैंने लिखा और लोगों ने मेरी किताब ‘सपनों की मंडी’ को सराहा भी बहुत। इस किताब को बहुत पुरस्कार मिले।
क्तआपने बहुत सारी किताबें लिखी हैं। आपके दिल के करीब कौन सी किताब है?
वैसे तो अपनी हर रचना प्रिय होती है। लेकिन मेरी रचना ‘सपनों की मंडी’ मेरे दिल के काफी करीब है।

क्तआपके मन में महिला मुद्दे पर लिखने का ख्याल कहां से आया ?

पत्रकारिता के दौरान महिला बीट मिली थी। महिला बीट कवर करने के दौरान विभिन्न पहलुओं से रूबरू हुई। दरअसल खुद का भी सामंती परिवेश रहा है। इसलिए महिलाओं की बेबसी बेहतर तरीके से समझ पायी। महिलाओं की समस्याएं देखकर मैं द्रवित हो जाती थी। महिलाओं की समस्याओं पर लिखने लगी तो मुझे लगा कि वूमेन इशू पर मैं बेहतर तरीके से लिख सकती हूं। एक स्त्री, दूसरी स्त्री की पीड़ा बेहतर तरीके से समझ सकती है। बस ऐसे ही शुरुआत हुई। अब तो मेरा उद्देश्य ही वूमेन इम्पावरमेंट है।

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