मुस्लिम वोट बैंक पर टिकीं राजनीतिक दलों की निगाहें

  • मुुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश में भाई-चारा सम्मेलन कर रही बसपा
  • सपा पिछले चुनाव में साथ देने वाले मुस्लिमों को सहेजने में जुटी
  • भाजपा की निगाह सपा और बसपा से नाराज वोटरों पर
  • प्रदेश की 142 विधानसभा सीटों पर निर्णायक की भूमिका में हैं मुस्लिम मतदाता

सुनील शर्मा
captureलखनऊ। यूपी में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मुस्लिम वोटरों को अपने पक्ष में लाने के लिए सभी राजनीतिक दल बेकरार हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती सपा में आन्तरिक कलह का हवाला देकर पिछले चुनाव में सपा का साथ देने वाले मुस्लिमों को अपने साथ मिलाने की कोशिश में जुटी हैं। समाजवादी पार्टी अखिलेश यादव को विकासवादी नेता के रूप में प्रजेंट करने और पार्टी में सब कुछ ठीक होने का हवाला देकर अपने वोटरों को सहेजने में जुटी है, जबकि भारतीय जनता पार्टी की नजर सपा और बसपा से नाराज होने वाले मुस्लिम और अन्य पिछड़े एवं अल्पसंख्यक जातियों से ताल्लुक रखने वाले वोटरों पर है। यदि आने वाले चुनाव में भाजपा को मुस्लिमों और अन्य पिछड़ी जातियों का सपोर्ट मिल जाता है, तो वह बहुमत के करीब पहुंच सकती है। इसलिए सभी राजनीतिक दल मुस्लिम वोटरों पर डोरे डालने में जुट गए हैं।
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मुसलमानों की आबादी 19.26 प्रतिशत है। प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में से करीब 140 सीट पर मुस्लिम आबादी 10 से 20 फीसदी के बीच है। करीब 74 सीटों पर मुसलमान वोटर 30 फीसदी या उससे भी ज्यादा हैं, जबकि 69 से अधिक सीटों पर मुस्लिम वोटर्स की संख्या 20 से 30 प्रतिशत के बीच है। ऐसे में यदि 140 सीटों पर कोई भी राजनीतिक दल मुस्लिम वोटर्स का समर्थन हासिल करने में कामयाब हो जाता है, तो यूपी में उस राजनीतिक दल की सरकार बनना लगभग तय हो जायेगी। ये अलग बात है कि बहुमत हासिल करने के लिए किसी न किसी राजनीतिक दल के साथ गठबंधन करना ही पड़ेगा। प्रदेश की राजनीति में खुद को धर्मनिरपेक्ष बताने वाली पार्टियां एक-दूसरे पर बढ़त लेने के लिए मुस्लिम मतदाताओं पर काफी हद तक निर्भर रहती हैं। प्रदेश के चुनावी गुणा-भाग में मुस्लिम मतदाताओं की खासी अहमियत है। आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दल सियासी समीकरणों की सूरत बदलने का माद्दा रखने वाले इस वोट बैंक को एक बार फिर अपने पाले में लाने की कोशिश में जुट गए हैं।
प्रदेश में 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी विध्वंस की घटना के बाद मुसलमान वोटर समाजवादी पार्टी की तरफ झुक गए थे। तब से अब तक हमेशा ही सपा को सबसे ज्यादा मुस्लिम वोट मिलते रहे हैं। समाजवादी पार्टी को अब भी सबसे ज्यादा मुस्लिम वोट मिल रहे हैं, लेकिन हर चुनाव में पार्टी को मिलने वाले वोटों के प्रतिशत में कमी आंकी जा रही है। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में सपा की अभूतपूर्व जीत के लिए मुस्लिम मतदाताओं का उसके पक्ष में सामूहिक मतदान मुख्य कारण माना गया था। लेकिन हाल ही में ‘समाजवादी परिवार’ में मचे घमासान के कारण मुस्लिम मतदाताओं का इस पार्टी से मोहभंग के संकेत मिल रहे हैं। हालांकि प्रदेश का मुस्लिम मतदाता किस राजनीतिक दल को सपोर्ट करेगा, इस पर अभी भी अनिश्चितता की स्थिति बनी हुई है। लेकिन राजनीतिक दलों ने मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ मिलाने की योजना तैयार करने के साथ ही उनको लागू करने का काम भी शुरू कर दिया है।

माया ने मांगा मुस्लिमों का साथ

कलह के कारण सपा के कमजोर होने का हवाला देते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती सत्ता में आने के लिए मुसलमानों का साथ मांग रही हैं। इसके लिए उनकी बेकरारी हाल के दिनों में उनके द्वारा दिए गए बयानों से स्पष्टï झलकती है। मुसलमानों को अपने पाले में लाने के लिए मायावती अधिक सक्रिय हैं। हाल ही में मायावती द्वारा ‘तीन तलाक’ और भोपाल में सिमी के आठ आतंकियों की मुठभेड़ में मौत जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बेधडक़ बयान दिया जाना भी मुसलमानों को लुभाने की पुरजोर कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। साथ ही भाजपा को मुसलमान विरोधी करार देने में भी मायावती कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहीं हैं। इसी वजह से अपने बयान में बसपा शासनकाल में मुसलमानों के हित में किए गए कार्यों का हवाला देने से कभी नहीं चूकती हैं।

भाजपा के रणनीतिकार भी सक्रिय

अब तक प्रदेश के मुस्लिम मतदाता भाजपा को सत्ता में आने से रोक पाने में सक्षम पार्टी को ही अपना एकमुश्त वोट करते रहे हैं। आमतौर पर भाजपा को नापंसद करने वाले मुसलमानों की पहली पसंद सपा मानी जाती है। सपा में हुई कलह के बाद इनके बिखरने की संभावना जताई जा रही है। इन्हें लुभाने के लिए कांग्रेस ने प्रदेश प्रभारी के रूप में मुस्लिम चेहरे के रूप में गुलाम नबी आजाद को आगे किया है। वहीं बसपा ने महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दीकी व उनके पुत्र को मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने के लिए लगाया है। 2014 के लोकसभा चुनाव में मुसलमानों के बीच हुए बिखराव का सबसे अधिक फायदा भाजपा को मिला था। इसलिए मुसलमानों का झुकाव किस तरफ होगा इस पर भाजपा के रणनीतिकारों की भी निगाह लगी हुई है।

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