मीडिया कवरेज प्रतिबंध और आजादी

क्या चैनल पर प्रतिबंध लगाने के ताजा फैसले को उचित कहा जा सकता? क्या प्रतिबंध के हथियार का इस्तेमाल कर सरकार मीडिया को अपने इशारे पर नचाना चाहती है या फिर वह तानाशाही पर उतारू हो गई है? क्या मीडिया को अब हर बात प्रकाशित और प्रसारित करने के लिए सरकार से पूछना पड़ेगा?

sanjay sharma editor5पठानकोट पर हुए आतंकी हमले की कवरेज को लेकर केंद्र की मोदी सरकार ने समाचार चैनल एनडीटीवी इंडिया पर एक दिन का प्रतिबंध लगा दिया है। सरकार के इस फैसले की चौतरफा निंदा हो रही है। पत्रकार, बुद्धजीवी, एडिटर्स गिल्ड के पदाधिकारी और राजनेता इसका खुलकर विरोध कर रहे हैं। साथ ही इन लोगों ने सरकार से अपना निर्णय तत्काल वापस लेने की मांग की है। सरकार का तर्क है कि चैनल द्वारा पठानकोट हमले की संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक करने पर यह कदम उठाया गया है। वहीं, एनडीटीवी इंडिया का कहना है कि उसने वही सामग्री सार्वजनिक की, जिसे अधिकांश चैनलों व अखबारों में प्रसारित और प्रकाशित किया गया था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या चैनल पर प्रतिबंध लगाने के ताजा फैसले को उचित कहा जा सकता? क्या प्रतिबंध के हथियार का इस्तेमाल कर सरकार मीडिया को अपने इशारे पर नचाना चाहती है या फिर वह तानाशाही पर उतारू हो गई है? क्या मीडिया को अब हर बात प्रकाशित और प्रसारित करने के लिए सरकार से पूछना पड़ेगा? क्या सरकार मानकर चल रही है कि मीडिया संस्थानों में बैठे लोगों को अपनी जिम्मेदारी का अहसास नहीं है या फिर सरकार उन चैनलों और अखबारों पर शिकंजा कसना चाहती है जो उसका भोंपू बनने को तैयार नहीं हैं? क्या सरकार विचार अभिव्यक्ति का गला घोंटने की तैयारी कर रही है और देश में इमरजेंसी जैसे हालात पैदा करना चाहती है? दरअसल, मोदी सरकार के ताजा निर्णय से साफ है कि वह मीडिया की स्वस्थ आलोचना को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। उसके निशाने पर ऐसे कई चैनल और अखबार हैं, जो सरकार की नीतियों की तथ्यात्मक और तार्किक ढंग से आलोचना करते रहते हंै। सच यह है कि मीडिया संस्थानों की अपनी स्वायत्ता होती है। यह लोकतंत्र का चौथा खंभा है और इसकी स्वायत्ता से खिलवाड़ करने का अधिकार किसी को नहीं है। यदि सरकार इसको खंडित करने की कोशिश करती है तो यह न केवल उसके लिए बल्कि सभ्य समाज के लिए भी घातक होगी। मीडिया पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करना न केवल विचार अभिव्यक्ति का गला घोंटने जैसा है बल्कि यह संविधान के मूल अधिकारों का उल्लंघन भी है। ऐसे में क्या मान ले कि मोदी सरकार संविधान द्वारा प्रदत्त उन मूल अधिकारों को समाप्त करना चाहती है, जिसके दम पर भारतीय समाज हमेशा मुखर रहा है। वह गलत को डंके की चोट पर गलत और सही को सही कहता रहा है। सरकार के फैसले से विपक्ष भी खफा है। सरकार को समझना चाहिए कि लोकतांत्रिक सरकार की सफलता में एक स्वस्थ और सजग मीडिया की भूमिका बेहद अहम होती है। कई बार मीडिया ने सरकार पर दबाव बनाकर जनहित के कई काम तक कराए हैं। ऐसे में मीडिया पर शिकंजा कसने या अपने इशारे पर नचाने की कोशिश कभी भी घातक हो सकती है।

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