मिलावटखोरों पर कब कसेगा शिकंजा

सवाल यह है कि तमाम कानूनों और सजा व जुर्माने के प्रावधान के बावजूद मिलावट का कारोबार क्यों फल-फूल रहा है? क्या यह उन विभागों की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाता जिन पर इसको नियंत्रित करने की जिम्मेदारी है? क्या आम आदमी को शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने के उत्तरदायित्व से सरकार मुंह मोड़ सकती है?

sanjay sharma editor5पिछले दिनों राजधानी में कई क्विंटल सिंथेटिक खोवा बरामद किया गया। तीन लोग गिरफ्तार भी किए गए। यह बाजार में मिलावटी वस्तुओं के बिक्री की एक बानगी है। मिलावटी और नकली खाद्य पदार्थों का धंधा देश भर में फल-फूल रहा है। त्यौहारों पर इसमें तेजी आ जाती है। इसकी मुख्य वजह मांग और आपूर्ति में असंतुलन को माना जा सकता है। दीपावली के मौके पर खोवा, दूध और मिठाइयों की मांग बढ़ जाती है जबकि उत्पादन कम होता है। ऐसी स्थिति में मिलावटखोर नकली खोवा, इससे बनी मिठाइयां और दूध खुलेआम बाजार में खपाते हैं। नकली खोवे की मिठाइयां लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाती है और यदि इसका लंबे समय तक उपयोग किया जाए तो व्यक्ति गंभीर बीमारियों से ग्रसित हो जाता है। कई बार ये रोग जानलेवा साबित होते हंै। सवाल यह है कि तमाम कानूनों और सजा व जुर्माने के प्रावधान के बावजूद मिलावट का कारोबार क्यों फल-फूल रहा है? क्या यह उन विभागों की कार्यशैली पर सवाल नहीं उठाता जिन पर इसको नियंत्रित करने की जिम्मेदारी है? क्या आम आदमी को शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराने के उत्तरदायित्व से सरकार मुंह मोड़ सकती है? दरअसल, मिलावट का यह धंधा न केवल खाद्य पदार्थों बल्कि दवाओं तक को अपनी चपेट में ले चुका है। कई जीवन रक्षक दवाएं तक नकली निकल रही हैं। एंटीबायोटिक और सिरप में मिलावट की जा रही है। यह तब है जब मिलावट पर नियंत्रण लगाने के लिए सरकार ने पूरा अमला हर जिले में लगा रखा है। खाद्य नियंत्रण विभाग को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई है। लेकिन विभाग केवल त्योहारों के मौके पर कुछ खाद्य पदार्थों के सैंपल लेने तक ही सीमित है। इसमें भी उसकी नजर दूध और इससे बने सामानों तक सीमित रहती है। खाद्य तेल, मसाले, दाल और सब्जियों की शायद ही कभी जांच की जाती है। पेय पदार्थों की जांच से भी विभाग कतराता रहता है। विभाग की इसी निष्क्रियता का फायदा मिलावटखोर उठाते हैं। अधिकांश राजधानी के आस-पास के ग्रामीण इलाकों में मिलावटखोर अपना अड्डïा बनाते हैं। वे विभिन्न किस्म के मिलावटी पेय पदार्थ और खाद्य तेल, सिंथेटिक खोवा, दूध और मिठाइयां यहां खपाते हैं। यह तब है जब सरकार अक्सर मिलावटखोरों पर शिकंजा कसने का फरमान जारी करती रहती है। कुल मिलाकर यदि सरकार वाकई मिलावटखोरों पर शिकंजा कसना चाहती है तो उसे न केवल नई रणनीति बनानी होगी बल्कि उसे अमली जामा पहनाने के लिए विभाग के अफसरों को जवाबदेह बनाना होगा। साथ ही लापरवाह अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी सुनिश्चित करनी होगी अन्यथा जनता मिलावट के जहर को गले के नीचे उतारती रहेगी।

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