मधेशी राज्य के गठन का प्रस्ताव व भारत-नेपाल संबंध

मधेशी राज्य बनने से निश्चित रूप से भारत और नेपाल के रिश्तों में आई दूरी को पाटा जा सकेगा। नेपाल सरकार ने जब से अपने संविधान को लागू किया है तभी से मधेशी समुदाय में आक्रोश है। नेपाल सरकार पर मधेशियों ने उपेक्षा का आरोप लगाया था और हिंसक प्रदर्शन किए थे।

sajnaysharmaसब कुछ ठीक-ठाक रहा तो नेपाल में मधेशियों के अलग राज्य की बहुप्रतीक्षित मांग जल्द पूरी हो जाएगी। नेपाल सरकार ने इसकी पहल कर दी है। दहल सरकार ने इसको अमलीजामा पहनाने के लिए संविधान संशोधन विधेयक संसद में पेश कर दिया है। पड़ोसी देश नेपाल के इस निर्णय को भारत और नेपाल के बीच बढ़ी खटास को कम करने की दिशा में उठाया गया एक सकारात्मक कदम माना जा रहा है। पिछले दिनों नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प दहल प्रचंड ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की थी। मधेशियों को लेकर भारत सरकार की चिंता को देखते हुए प्रचंड ने मधेशियों की मांग को पूरा करने का भरोसा प्रधानमंत्री मोदी को दिया था। मधेशी राज्य बनने से निश्चित रूप से भारत और नेपाल के रिश्तों में आई दूरी को पाटा जा सकेगा। नेपाल सरकार ने जब से अपने संविधान को लागू किया है तभी से मधेशी समुदाय में आक्रोश है। नेपाल सरकार पर मधेशियों ने उपेक्षा का आरोप लगाया था और हिंसक प्रदर्शन किए थे। यह प्रदर्शन महीनों तक चला। पूरे नेपाल में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। हिंसक घटनाओं में 50 से अधिक लोग मारे गए। हिंसा का असर सीमावर्ती क्षेत्रों पर न पड़े इसको लेकर भारत सरकार ने सुरक्षा कड़ी कर दी थी। इस पर नेपाल सरकार ने भारत सरकार पर मधेशियों को भडक़ाने का आरोप लगाया था। लिहाजा दोनों देशों में दूरियां बढऩे लगी थी। लेकिन प्रचंड के नेपाल का प्रधानमंत्री बनने के बाद इस मामले पर फिर से विचार-विमर्श किया गया। नेपाल सरकार ने मधेशियों की शंकाओं के समाधान की कोशिश शुरू की। प्रचंड ने इस मामले पर भारत सरकार के सामने अपना पक्ष रखा। हालांकि भारत ने किसी देश के आंतरिक मामले में दखल न देने की बात कहकर इस मुद्दे को हवा नहीं दी। लेकिन वह हमेशा से यह चाहता रहा है कि नेपाल मधेशियों की समस्या का समाधान करे। नेपाल सरकार द्वारा ताजा संविधान संशोधन के मसौदे में तीन अन्य मुद्दों-नागरिकता, उच्च सदन में प्रतिनिधित्व और देश के विभिन्न हिस्सों में बोली जाने वाली भाषाओं को मान्यता देने से जुड़े प्रावधान भी हैं। विधेयक में नवल पारसी, रूपनदेही, कपिलवस्तु, बांके, डांग, बरदिया को अन्य तराई प्रांत में शामिल करने का प्रस्ताव है, जिसे पांचवां प्रांत कहा जाएगा। दरअसल, नेपाल में अधिकांश मधेशी भारत मूल के हैं और पहाड़ी-मधेशी के बीच सरकार की दोहरी नीति का विरोध करते रहे हैं। कुल मिलाकर नेपाल सरकार का यह प्रयास सराहनीय है। यदि यह मामला सुलझ जाता है तो यह नेपाल सरकार की बड़ी उपलब्धि होगी। यह इस बात की ओर भी इशारा करता है कि युद्ध और हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकते। शांति और संवाद ही समस्याओं के समाधान का मूल मंत्र हैं।

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