भाजपा में दलबदलुओं की भीड़ से टूट रही कार्यकर्ताओं के अच्छे दिनों की आस

  • बसपा, सपा और कांग्रेस से आने वाले नेता अपनों के लिए मांग रहे पार्टी का टिकट
  • प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों के लिए बीस हजार नेताओं ने पेश की दावेदारी

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

captureलखनऊ। भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो रहे अन्य दलों के बागियों की बाढ़ ने कार्यकर्ताओं के अच्छे दिनों की उम्मीद को धुंधला कर दिया है, क्योंकि लंबे समय से पार्टी की सेवा करने वाले कार्यकर्ताओं के बजाय अन्य दलों को छोडक़र बीजेपी में शामिल होने वाले नेताओं को खुश रखने की कोशिश की जा रही है। इतना ही नहीं उनके परिजनों और करीबियों को मनमुताबिक सीटों से टिकट दिलाने पर भी पार्टी हाईकमान की तरफ से विचार किया जा रहा है। इसकी आहट मिलते ही पार्टी में लंबे समय से काम करने वाले कार्यकर्ताओं के बीच गुटबाजी शुरू हो गई है। हालांकि पार्टी की तरफ से मुख्यमंत्री का कोई भी चेहरा पेश न करके गुटबाजी रोकने की प्रयास किया जा रहा है, लेकिन यदि टिकटों के बंटवारे में दलबदलुओं को खुश रखने की कोशिश की गई तो पुराने लोग नाराज हो जायेंगे। जो नुकसानदायक साबित हो सकता है।
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव करीब हैं, इसलिए सभी राजनीतिक दलों के नेताओं में खुद को बेहतर साबित करने और टिकट हासिल करने की होड़ मची हुई है। वरिष्ठ नेता अपनी राजनीतिक विरासत बढ़ाने या फिर बचाने के लिए सुरक्षित ठिकानों की तलाश कर रहे हैं। इसमें बसपा छोडक़र अन्य दल में जाने वाले नेताओं की संख्या सबसे अधिक है। इस पार्टी से अब तक सात कद्दावर नेता अलग होकर अन्य दलों का दामन थाम चुके हैं, जिसमें स्वामी प्रकाश मौर्य, ब्रजेश पाठक, पूर्व सांसद जुगुल किशोर का नाम प्रमुख है। वहीं कांग्रेस की पूर्व प्रदेश अध्यक्ष व प्रदेश की दिग्गज नेताओं में शुमार रीता बहुगुणा जोशी और उनके बेटे मयंक जोशी कांग्रेस छोडक़र भाजपा में शामिल हो गए हैं। इतना ही नहीं रीता के माध्यम से कांग्रेस के और भी कई वरिष्ठ नेताओं को भाजपा में शामिल करने की कोशिशें की जा रही हैं। जबकि भारतीय जनता पार्टी में प्रदेश स्तरीय संगठन से जुड़े नेताओं का बड़ा तबका बागियों को पार्टी में शामिल किए जाने के खिलाफ है। इसी वजह से कांग्रेस और बसपा से अलग होने वाले नेताओं को भाजपा में शामिल करने में देरी हुई। अंदरखाने में इस बात की भी चर्चा है कि लखनऊ के सांसद व केंद्र सरकार में गृहमंत्री राजनाथ सिंह समेत कई अन्य प्रमुख भाजपाई कांग्रेस छोडक़र भाजपा में आने वाली रीता बहुगुणा जोशी को पार्टी में शामिल कराने के खिलाफ थे। इसी वजह से रीता को शामिल करने में देरी भी हुई।

परिवारवाद में बदल रही निष्ठा

बसपा, कांग्रेस समेत अन्य दलों को छोडक़र भाजपा में शामिल हुए अधिकांश नेताओं की निष्ठïा परिवारवाद में बदल रही है। भाजपा नेतृत्व एक तरफ जहां इन्हें समायोजित करने के प्रयास में है, वहीं भाजपा के तमाम दिग्गज नेताओं ने भी अपने पुत्रों व परिजनों को चुनाव मैदान में उतारने की पूरी तैयारी कर ली है। पूर्व मंत्री लालजी टंडन के बाद एक अन्य केंद्रीय मंत्री भी अपने पुत्र को यूपी चुनाव में विधायक बनाना चाह रहे हैं। दिलचस्प यह है कि गोपालजी टंडन के पुत्र जिस क्षेत्र से विधायक हैं, केंद्रीय मंत्री के बेटे भी वहीं से टिकट मांग रहे हैं। इसलिए टिकटों को लेकर अंदरखाने राजनीति हो रही है। वहीं केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने पुत्र पंकज सिंह को भी राजनीतिक विरासत बढ़ाने के लिए चुनावी अखाड़े में उतार रखा है। जबकि पूर्व मंत्री ओम प्रकाश सिंह अपने पुत्र अनुराग सिंह के लिए टिकट मांग रहे हैं। इस तरह बीजेपी में अपनों के लिए टिकट मांगने वालों की फेहरिस्त काफी लंबी है।

भाजपा में टिकट के लिए जोड़-तोड़ शुरू

बसपा, सपा और कांग्रेस छोडक़र बीजेपी में शामिल होने वाले नेताओं ने अपनी मनमुताबिक सीटों से चुनाव लडऩे और पार्टी की तरफ से टिकट हासिल करने के लिए भागदौड़ शुरू कर दी है। 2014 में हुए लोक सभा चुनाव की तरह इस बार विधानसभा चुनाव में मोदी लहर चलने की उम्मीद पाले हुए करीब बीस हजार लोगों ने भाजपा की तरफ से प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों से टिकट के लिए दावेदारी पेश की है। पार्टी के अंदरखाने से मिली खबरों के मुताबिक अन्य दलों से आए नेता अपने लिए टिकट मांगने के साथ ही रिश्तेदारों और करीबियों के लिए भी टिकट का इंतजाम करने में जुटे हैं। बसपा छोडक़र भाजपा से जुडऩे वाले स्वामी प्रसाद मौर्या प्रदेश की 10 से अधिक विधानसभा सीटों पर अपने लोगों को टिकट दिलवाने की कोशिश में हैं जबकि रीता बहुगुणा जोशी खुद के लिए टिकट मांगने से साथ ही अपने बेटे को भी मनमुताबिक सीट से टिकट दिलाना चाहती हैं, ताकी उसका करियर सुरक्षित हो सके।

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