भाजपा के निशाने पर बसपा के वोटर

  • दिग्गज बसपाइयों को अपने पाले में करने के बाद दलित वोट बैंक में सेंध लगाने में जुटी पार्टी
  • एक लाख चालीस हजार बूथ कमेटी बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में पकड़ मजबूत करने की कोशिश

सुनील शर्मा

captureलखनऊ। बहुजन समाज पार्टी के तमाम दिग्गज नेताओं को अपने पाले में करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों ने अब बसपा के वोट बैंक पर निगाह गड़ा दी है। इसके लिए भाजपा के चुनावी रणनीतिकारों ने बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की पूरी प्लानिंग कर ली है। भाजपा ने प्रदेश के सभी जनपदों में बूथ लेबल कमेटियां गठित करने के साथ ही अपने मंसूबे को अंजाम देने का काम भी शुरू कर दिया है। पार्टी ने बूथ प्रभारियों के साथ बूथ अध्यक्षों व संयोजकों को बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की जिम्मेदारी सौंप दी है। इतना ही नहीं बसपा के परंपरागत वोट बैंक को तोडऩे के लिए जातिगत आधार पर केन्द्रीय मंत्रियों को भी चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम दिया गया है।
उत्तर प्रदेश में बीजेपी 14 वर्षों से सत्ता से बाहर है। भाजपा को यहां के क्षेत्रीय दलों सपा और बसपा से करारी शिकस्त मिलती रही है। इससे सबक लेकर भाजपा ने यूपी चुनाव को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति में काफी बदलाव किया है। ऐसा माना जा रहा है कि सपा में मचे घमासान का सबसे अधिक लाभ बसपा को हो सकता है। इसलिए भाजपा ने बसपा और मायावती से असंतुष्टï नेताओं पर डोरे डालना शुरू कर दिया है। पार्टी के रणनीतिकारों ने एक-एक करके बसपा के तमाम दिग्गज नेताओं को अपने पाले में करने का काम बहुत ही शानदार ढंग से किया, जिसमें पूर्व सांसद व पांच मंडलों के कोआर्डिनेटर रहे जुगुल किशोर, बसपा के नेता विपक्ष की जिम्मेदारी संभाल रहे स्वामी प्रकाश मौर्य व मीडिया संयोजक ब्रजेश पाठक का नाम प्रमुख रूप से शामिल है। दिग्गजों को अपने पाले में करने के बाद अब पार्टी के रणनीतिकारों ने बसपा के परंपरागत और दलित वोट बैंक को अपने पक्ष में करने का काम शुरू कर दिया है। इसके लिए शुरुआत में बीजेपी के क्षेत्रीय नेताओं को जिम्मेदारी गई लेकिन उम्मीद के अनुरूप असर नहीं दिखा। इसलिए भाजपा ने दलित वोटों का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में करने से मकसद से प्रदेश में एक लाख चालीस हजार बूथ कमेटियां गठित कीं। इनके बूथ प्रभारी, अध्यक्ष और संयोजक भी मनोनोत किए जा चुके हैं। पार्टी ने बूथ प्रभारी, अध्यक्ष और संयोजक का चयन भी जातिगत आधार पर किया है। इन लोगों को 5 नवंबर से शुरू होने वाली परिवर्तन शंखनाद यात्रा को सफल बनाने की जिम्मेदारी दी गई है। इन पदाधिकारियों को यात्रा के संदेश को आम जन तक पहुंचाने का काम करना होगा। पार्टी सूत्रों के मुताबिक स्थानीय स्तर पर बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने का जिम्मा भी इन्हीं बूथ कमेटियों को दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिकबसपा के अधिकतर वोटर ग्रामीण क्षेत्रों से ही आते हैं। शहरी इलाकों के मुकाबले ग्रामीण क्षेत्रों में अपने वोट बैंक से बसपा हमेशा मजबूत रही है। इसलिए इन कमेटियों के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र में बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत
कर रही है।

हार के बावजूद बढ़ा बसपा को मिले वोटों का प्रतिशत

बहुजन समाज पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगाने का प्रयास कोई नई बात नहीं हैं। भाजपा के अलावा अन्य दलों ने भी दलितों को अपने पाले में करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाना शुरू कर दिया है। दलितों के यहां बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भी भोजन कर चुके हैं। उनके उत्थान के तमाम वादे भी कर चुके हैं। इसके बावजूद बसपा का वोटबैंक अडिग ही रहा। उत्तर प्रदेश में हुए विधान सभा के पिछले नतीजों में हार के बावजूद बसपा को मिले वोटों का प्रतिशत बढ़ा है। प्रदेश में अब तक हुए चुनाव में मात्र तीन से पांच फीसदी वोट इधर से उधर होने पर बड़े उलट फेर हुए हैं। यहां पर सपा व बसपा के बीच कड़ा मुकाबला होता रहा है। 2012 में हुए विधान सभा चुनाव में सपा को 19.12 फीसदी मिले। इसी के बल पर उसने 224 सीटें हासिल कर प्रदेश में सरकार बनाई। वहीं बसपा 25.91 फीसद वोट लेने के बाद केवल 80 सीटों पर सिमट गई थी। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक सपा में चल रही कलह से 2017 के विधान सभा चुनाव में बसपा को फायदा होने से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना तो तय है कि बीजेपी दलित वोट बैंक को लेकर काफी सक्रिय दिख रही है।

कांग्रेस के प्रयास के बावजूद नहीं खिसके दलित

कांगे्रस ने भी बसपा के दलित वोट बैंक में सेंध लगाने के काफी प्रयास किए थे। पार्टी के राष्टï्रीय उपाध्यक्ष व अमेठी सांसद राहुल गांधी ने दलितों के यहां भोजन करने के साथ ही यात्राएं भी निकालीं लेकिन पार्टी को कोई लाभ नहीं मिला। केन्द्रीय नेतृत्व ने भी दलितों को अपने साथ मिलाने की तमाम कोशिशें कीं लेकिन कांग्रेस की तरफ दलितों का झुकाव नहीं हुआ। राहुल गांधी से लेकर तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री तक के सारे प्रयास निरर्थक साबित हुए थे।

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