बदलते अमेरिका का संकेत

अंतत: अमेरिकी जनता ने तमाम सर्वेक्षणों और आकलनों को खारिज करते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका के 45वें राष्टï्रपति के रूप में डोनाल्ट ट्रंप को चुन लिया। ट्रंप की उम्मीदवारी सुनिश्चित होने से पहले ही कुछ अमेरिकी राजनीतिशास्त्रियों ने उन्हें अमेरिकी राजनीति में ‘इमर्जेंस’ के रूप में पेश किया था और माना था कि इस प्रकार के उभार भिन्न विचार, भिन्न योजना, लोगों को आकर्षित करने की भिन्न शैली एवं नयी क्षमता से युक्त होते हैं, जो प्राय: अप्रत्याशित परिणाम देते हैं।
खबरों में उनके प्रति लोगों में ‘हेट’ पक्ष को अधिक महत्ता दी गयी, जबकि ‘आइ लव यू बिट्स’ का बैंडविड्थ कहीं अधिक क्षमता वाला था। राजनीतिक विश्लेषक ही नहीं, हिलेरी और उनके रणनीतिकार भी यहीं पर धोखा खा गये। खैर, अब जब यह तय हो ही गया है कि डोनाल्ड ट्रंप अगले अमेरिकी राष्टï्रपति होंगे, तो ये सवाल भी सामने आ रहे हैं कि वे अमेरिका को कौन सी दिशा देंगे? दुनिया को वे किस तरह से प्रभावित करेंगे? क्या दुनिया शांति और निश्चिंतता की ओर बढ़ेगी?
वरिष्ठ अमेरिकी लेखक ने न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा है कि 9 नवंबर, फ्रेंच रिवोल्यूशनरी कैलेंडर के अनुसार 18वां ब्रूमेयर है। यह वही दिन है, जब 1799 में नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने कुछ लोगों के साथ रिवोल्यूशनरी सरकार के खिलाफ तख्तापलट का नेतृत्व किया था और स्वयं को प्रथम कांसुल के रूप में स्थापित कर विश्व इतिहास को पुनर्निर्देशित करनेवाली व्यवस्था पेश की थी।
उन्होंने यह भी लिखा है कि डोनाल्ड ट्रंप नेपोलियन नहीं हैं, लेकिन जो उन्हें सर्वसत्तावादी कॉमिक-ओपेरा रूप में देख रहे हैं, वे यह भी मान रहे होंगे कि विश्व इतिहास की इस पैरोडी में पुन: 18वें ब्रूमेयर पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। दरअसल, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनाव प्रचार के दौरान जिन बातों पर विशेष फोकस किया था, उसे देखते हुए ऐसे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।
ट्रंप ने अमेरिका में मुसलमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध तथा मस्जिदों पर निगरानी की बात की। उन्होंने अमेरिका व मैक्सिको के बीच एक बहुत बड़ी दीवार खड़ी करने के साथ-साथ जन्म से नागरिकता के समापन और ट्रांस-पैसिफिक संधि (टीपीटी) को रोकने की बात की। ये विषय उन्मादी राष्ट्रवाद, नस्लवाद, संरक्षणवाद, क्षेत्रीय संघर्ष और वार इनड्यूरिंग की पुनरावृत्ति का संकेत देते हैं, जिसका शिकार न केवल अफगानिस्तान व इराक हुए थे, बल्कि अन्य देश भी हुए।
ट्रंप ने अपने प्रचार अभियान के दौरान यह बात कई बार दोहरायी है कि मैं अपनी सेना को इतना बड़ा और ताकतवर बना दूंगा कि कोई हमसे झगडऩे की हिम्मत नहीं करेगा। ट्रंप के इस इरादे में सर्व अमेरिकावाद (पैनअमेरिकानिज्म) और सर्वसत्तावाद की संयुक्त झलक मिलती है।
ट्रंप गन कल्चर के समर्थक हैं। स्वाभाविक है कि गन लॉबी उनके साथ है, जिसकी वास्तविक जड़ें अमेरिकी मिलिट्री इंडस्ट्रियल कॉम्पलेक्स में हैं। यही वह पर्दे के पीछे की ताकत है, जिसने शीतयुद्ध काल में दुनिया को दो धड़ों में बांट कर युद्धोन्माद, सैन्यवाद और आतंकवाद पैदा किया। शीतयुद्ध समाप्त होने के बाद जब अमेरिकी हथियारों की मांग वैश्विक स्तर पर कम होने लगी और यह इंडस्ट्री मृत्यु की ओर बढऩे लगी, तो 9/11 की घटना हो गयी और आतंकवाद वैश्विक आतंकवाद में बदल गया, जिसके खिलाफ अमेरिकी नेतृत्व में वैश्विक युद्ध लड़ा गया।
ट्रंप ने अमेरिका के युवा वर्ग का समर्थन उसी तरह से पाया, जैसे 2009 में ओबामा ने पाया था। यह दिखाता है कि अमेरिका इन आठ वर्षों में कितना बदल गया है। आज अमेरिकी मध्यवर्ग की दिलचस्पी अमेरिका की शांतिप्रियता में कम, राष्ट्रवाद, संरक्षणवाद, अनुदारता में कहीं अधिक दिख रही है। हालांकि, ट्रंप यह कह रहे हैं कि हमारे पास बेहतरीन आर्थिक योजना है। इस योजना के जरिये वे अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना कर देंगे। उनका यह भी कहना है कि हम दुनिया के उन सभी देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनायेंगे, जो हमारा दोस्त बनना चाहता है।
यहां दो प्रश्न है। एक यह कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के जिस पक्ष की वे पैरोकारी कर रहे हैं, उसका चरित्र न ही उदात्त है और न ही शांतिवादी। तो क्या आनेवाले समय में दुनिया के सामने नये किस्म के संकट आनेवाले हैं? दूसरा, जो उनके दोस्त हैं, उनके साथ मजबूत रिश्ते बनायेंगे, तो क्या बुश का वह नारा फिर प्रभावी होगा कि या तो आप अमेरिका के साथ अथवा आतंकवाद के साथ?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ब्लादिमीर पुतिन रूस को सोवियत संघ युग में ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हैं और ट्रंप अमेरिका को, इसलिए आज निष्कर्ष जो भी हो, लेकिन परिणाम बहुत अच्छा होने की संभावना कम है। भारत के लिए ट्रंप सिद्धांतत: लाभदायक हो सकते हैं क्योंकि वे पाकिस्तान और चीन के विरोधी हैं। लेकिन, भारत की ताकत और संभावनाएं भारत की ज्ञान आधारित इंडस्ट्री में निहित है। चूंकि ट्रंप संरक्षणवादी राह बनाने की बात कर रहे हैं, इसलिए वे भारत के लिए नुकसानदेह अधिक हो सकते हैं।
(लेखक विदेश मामलों के जानकार हैं)

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