पुतिन की रणनीति भी तो जानिए

राष्टपति पुतिन जूडो के साथ-साथ सांबो का भी पुरज़ोर अभ्यास करते रहे हैं। सांबो किसी जमाने में सोवियत रेड आर्मी में सिखाया जाने वाला मार्शल आर्ट था। जूडो और सांबो में दक्ष पुतिन को पता है कि कूटनीति में कब और कहां वार करना है। एशिया-प्रशांत में पुतिन ने जिस तरह से ‘पैराडाइम शिफ्ट’ किया है, उससे दिखने लगा है कि अमेरिका को कई मोर्चों पर मात खानी है। पाकिस्तान से एक साझा सैनिक अभ्यास ने कूटनीति को किस तरह से पलट कर रख दिया, वह भारत के साथ रूस के 45 हजार करोड़ के सौदे के बाद समझ में आता है।
गोवा शिखर सम्मेलन में भारत को क्या सचमुच वह सब कुछ हासिल हो गया, जिसके लिए हमारे रणनीतिकारों ने पूरी ताकत झोंक दी थी? ब्रिक्स सम्मेलन के बाद चीन ने जिस तरह से सुर बदला है, उससे ढोल पीटने वाले टीवी चैनलों को सबक लेना चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने बयान दिया कि किसी खास देश, जाति व संप्रदाय विशेष को आतंकवाद से जोड़े जाने का चीन विरोध करता है। पाकिस्तान आतंकवाद का ख़ुद शिकार रहा है और उसने इस वजह से बड़ी कुर्बानियां दी हैं। इस बयान से चीन की पाकिस्तान में जय-जय हो रही है। बावजूद इसके, एक सच यह भी है कि ‘दक्षेस’ और ‘बिम्सटेक’ में पाकिस्तान को अलग-थलग करने में भारत को सफलता मिली है। मगर, पूरी दुनिया में पाकिस्तान ‘आइसोलेट’ हो गया, इसका मुगालता पालना थोड़ा ज़्यादा हो जाता है।
लगता है साझा सैनिक अभ्यास रूसी कूटनीति का एक नया अस्त्र बन चुका है। 12 सितंबर को चीन और रूस ने साउथ चाइना सी में साझा नौसैनिक अभ्यास किये थे। इससे संदेश यही जा रहा था कि इस इलाके में रूस, चीन के साथ खड़ा है और समय पडऩे पर दक्षिण-पूर्व एशिया में अमेरिकी मंसूबों पर पानी फेरेगा।
मंगलवार से फिलीपींस के राष्टï्रपति रोडरिगो दुतेर्ते चीन की चार दिन की यात्रा पर हैं। दुतेर्ते ने बयान दिया है कि हम रूस, चीन के साथ साझा सैनिक अभ्यास करना चाहेंगे। दुतेर्ते ने कहा कि हम किसी भी सूरत में अमेरिका के साथ सैनिक साझीदारी नहीं करेंगे। फिलीपींस कुछ दिन पहले तक अमेरिका का सबसे बड़ा रणनीतिक पार्टनर था। सत्रह साल से फिलीपींस कूटनीतिक प्रयासों के ज़रिये चीन से साउथ चाइना सी विवाद सुलझा लेना चाहता था। बात जब बनी नहीं तो फिलीपींस ने 2013 में हेग स्थित अंतरराष्टï्रीय न्यायाधिकरण ‘पीसीए’ का दरवाज़ा खटखटाया। न्यायाधिकरण ने 12 जुलाई 2016 को संयुक्त राष्टï्र समुद्री क़ानून के अनुच्छेद 258 को आधार बनाकर फैसला दिया कि ‘नाइन डैश लाइन’ की परिधि में आने वाले जल क्षेत्र पर कोई ऐतिहासिक दावेदारी चीन नहीं कर सकता। चीन इस हार से तिलमिला गया और उसने घोषणा की कि हम ‘पीसीए’ का फैसला नहीं मानते।
वक्त कितनी तेज़ी से करवट बदलता है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण फिलीपींस-अमेरिका संबंध है। दुतेर्ते को सत्ता में आये साढ़े तीन माह ही हुए हैं, लेकिन उनकी ओबामा से बुरी तरह ठन गई है। देश में ड्रग के विरुद्ध अभियान में जो 3700 लोग मारे गये, अमेरिका ने उसे मानवाधिकार का मुद्दा बना लिया। उससे चिढ़े राष्टï्रपति दुतेर्ते ने पहले अमेरिकी राजदूत और फिर ओबामा को अपशब्द कहे। इस गाली कांड के बाद राष्टï्रपति दुतेर्ते, शी और पुतिन के परम मित्र हैं। दुतेर्ते चार दिन की चीन यात्रा में क्या गुल खिलाते हैं, यह देखना है। मगर, यह तो तय है कि रूस, एशिया-प्रशांत में चीन की मजबूती चाहेगा। बदले में फिलीपींस, रूसी मिल्ट्री हार्डवेयर का आयातक देश बन जाए तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। इससे पहले, मास्को-हनोई के संबंध भी मजबूत हुए हैं।
उफा से गोवा तक ब्रिक्स सम्मेलनों पर ग़ौर करें तो रूस और चीन पूरी तरह से कूटनीति के केंद्र में रहे हैं। गोवा में मोदी द्वारा पलक पांवड़े बिछाने के बावजूद राष्टï्रपति शी के स्टैंड में कोई बड़ा फकऱ् नहीं दिखा। चीन ने लश्करे तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों का जिक्र 109 पैरे के घोषणापत्र में होने नहीं दिया, मगर आईएस और जबात-अल-नुसरा के नाम जरूर हैं। इसका क्या मतलब निकालें? ब्रिक्स के बाद प्रेसिडेंट शी ढाका गये। 30 साल के बाद, किसी चीनी शासनाध्यक्ष का बांग्लादेश जाना हुआ है। राष्टï्रपति शी ने बांग्लादेश से 25 अरब डॉलर के निवेश और व्यापार पर हस्ताक्षर किये हैं। पांच माह पहले प्रधानमंत्री मोदी ढाका गये थे और मात्र दो अरब डॉलर के व्यापार पर हस्ताक्षर कर आये। कहां 25 अरब और कहां दो अरब! इसी से तुलना कर लें कि समय आने पर शेख़ हसीना किसकी ओर झुकेंगी। रूस से रक्षा प्रणाली को लेकर जितना बड़ा समझौता हुआ है, उससे लगता है मानो शीत युद्ध वाले दौर की वापसी हुई है। उस दौर में मिल्ट्री हार्डवेयर मंगाने के वास्ते हम सबसे अधिक मास्को पर निर्भर हुआ करते थे। क्या यह सिर्फ पाकिस्तान को रोकने के वास्ते हुआ ताकि इस्लामाबाद मास्को के और करीब न जाए? ब्रिस्क हो या बिम्सटेक, हमारी सारी कूटनीति पाकिस्तान केंद्रित हो गई है। उड़ी हमले के बाद अमेरिकी रवैये की समीक्षा करें तो लगता है कि पेंटागन एक मज़बूत दोस्त की तरह भारत के साथ खड़ा नहीं था। उड़ी के बाद युद्ध जैसी स्थिति न बने, उसके लिए सावधानी बरतने की हिदायत व्हाइट हाउस क्यों दे रहा था? अमेरिका सिर्फ आतंकवाद की भत्र्सना कर दे तो इस पर क्या हमें ख़ुश हो जाना चाहिए?
रूस, एशिया-प्रशांत में नई भूमिका में अवतरित हुआ है, इस सच को स्वीकार करना ही होगा। रूस, चीन को छोड़ नहीं सकता और पाकिस्तान, चीन से ऐसा चिपका है, जैसे बंदर का बच्चा अपनी मां से चिपकता है। जापान, वियतनाम और भारत को लगता है कि मास्को से बनाये रखो, वही चीन को काबू कर सकता है। लेकिन क्या अब पुतिन की वजह से चीन ‘एनएसजी’ की सदस्यता में भारत के विरुद्ध रोड़ा नहीं बनेगा? शायद उसका रास्ता निकट भविष्य में होने वाली सौदेबाजी से खुले। पुतिन एक तरह से एशिया-प्रशांत में संकटमोचक की भूमिका में दिखना चाहते हैं, लेकिन उसके पीछे रूस के व्यापारिक हितों की पूर्ति हर समय होनी चाहिए। ‘नार्थ-साउथ कॉरीडोर’ बनाने के वास्ते मास्को की यही मंशा थी कि ईरान के चाबहार पोर्ट से यूरोपीय संघ तक का रास्ता वाया अजरबैजान और रूस खुले। चीन को सेंट्रल एशिया से लेकर पोलैंड तक का मार्ग ग्वादर के बरास्ते चाहिए। अब तक हम यही मान रहे थे कि नई दिल्ली की काबुल से दोस्ती हो गई, तो किला फतह है। फिर भी यह दोस्ती गेम चेंजर का काम करेगी!

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