नोट बंदी, परेशानी और मोदी की भावुकता

सबसे बड़ा सवाल यह है कि मोदी को यदि जनता की परेशानियों की इतनी ही फ्रिक थी तो उन्होंने इसके लिए पूर्व तैयारी क्यों नहीं की? क्यों लोगों को काम-धाम छोडक़र बैंकों की कतार में खड़े होने के लिए मजबूर किया? मान भी लें इससे कालाधन रखने वालों को झटका लगा है लेकिन इसकी क्या गारंटी कि बैंक में जमा हो रहे जनता के पैसे का भविष्य में दुरुपयोग नहीं होगा?

sanjay sharma editor5पांच सौ और हजार के पुराने नोटों को प्रतिबंधित करने के अचानक लिए गए फैसले से जहां जनता बेहाल है वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सब कुछ ठीक करने के लिए लोगों से पचास दिन की मोहलत मांगी है। उन्होंने सार्वजनिक मंच से जनता से 30 दिसंबर तक इस अभियान में साथ देने की अपील की और कहा कि यदि इसके बाद किसी तरह की परेशानी हुई तो वे खुद बीच चौराहे पर किसी भी तरह की सजा दिए जाने के लिए तैयार हैं। वे अपने ताजा निर्णय को लेकर भावुक भी हुए। उन्होंने कहा कि कालाधन 70 साल की बीमारी है और उसे केवल 17 महीनों में मिटा देना है। एक बार सफाई हो जाती है तो मच्छर भी नहीं आता है। मोदी ने नोट बंदी के चलते जनता को हो रही परेशानियों का हवाला भी दिया। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि मोदी को यदि जनता की परेशानियों की इतनी ही फ्रिक थी तो उन्होंने इसके लिए पूर्व तैयारी क्यों नहीं की? क्यों लोगों को काम-धाम छोडक़र बैंकों की कतार में खड़े होने के लिए मजबूर किया? मान भी लें इससे कालाधन रखने वालों को झटका लगा है लेकिन इसकी क्या गारंटी कि बैंक में जमा हो रहे जनता के पैसे का भविष्य में दुरुपयोग नहीं होगा? फिलहाल हालत यह है कि बैंकों के पास पुराने नोटों के बदले देने के लिए नए नोट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हैं। घंटों कतार में लगने के बाद भी लोगों को पैसे नहीं मिल पा रहे हैं। अधिकांश एटीएम बंद हैं। लोग दैनिक जरूरतों की चीजों को खरीदने के लिए भी मोहताज हो गए हैं। सरकार को इतना बड़ा निर्णय लेते समय यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि देश के सभी बैंकों में पांच सौ के नए और सौ के नोट पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों। यही नहीं दो हजार के नोट के लिए एटीएम को अपडेट तक नहीं किया गया। यदि ऐसा किया गया होता तो शायद मोदी को जनता से मोहलत न मांगनी पड़ती। प्रधानमंत्री को समझना चाहिए कि पहले से ही परेशान जनता के लिए अतिरिक्त परेशानी के पचास दिन किसी सजा से कम नहीं हैं। देश भर में अफरातफरी का माहौल नहीं बनता। बैंकों के बाहर लोग हिंसक नहीं होते। सरकार यदि जरा भी सचेत होती तो पचास दिन की समयावधि को कम तो जरूर ही किया जा सकता था। प्रधानमंत्री को समझना चाहिए कि केवल भावुक अपील करने से यथार्थ नहीं बदल जाता है। परेशानियां कम नहीं हो जातीं। भावुकता परेशानियों की उबड़-खाबड़ चट्टान से टकराकर चूर-चूर हो जाती हैं। आखिर जनता कब तक ऐसी भावुक अपीलों पर अपने यथार्थ का बलिदान करेगी।

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