नोटबंदी से सबक ले सरकार

आठ नवंबर को 500 तथा 1000 रुपये के नोटों का चलन रातोंरात रोकने की घोषणा नीयत तथा क्रियान्वयन के पारस्परिक संबंध का मौलिक मुद्दा उजागर करती है। क्या किसी क्रिया के पीछे की सराहनीय मंशा उसके नकारा क्रियान्वयन को माफ कर देने की वाजिब वजह हो सकती है? अथवा, क्या क्रियान्वयन की खामियां उस मंशा का मूल्य ही कम कर देती हैं?
विचार तथा क्रिया के बीच का यही द्वंद्व नोटबंदी के फैसले के नतीजतन उपजी उथल-पुथल का केंद्रीय मुद्दा बन बैठा है। कई राजनीतिक दलों ने इसका समर्थन किया। नीतीश कुमार वैसे पहले नेताओं में एक थे, जिन्होंने कालेधन, कालेधन तथा आतंकवाद के बीच गंठजोड़ और नकली नकदी के खतरों से मुकाबले की सरकारी नीयत का खुल कर समर्थन किया। सच तो यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था में कालेधन की क्षयकारी व्याप्ति के मद्देनजर उसके उन्मूलन हेतु सरकार द्वारा उठाये गये कदम पर सही सोच का व्यक्ति सवाल नहीं खड़े कर सकता। पर, नीतीश कुमार उन नेताओं में भी आगे थे, जिन्होंने इसे लागू करने की तैयारी पर भी प्रश्न उठाये।
इन दोनों मतों में कोई विरोधाभास नहीं है। यदि नोटबंदी ने एक ही झटके में चलन की पूरी नकदी के 86 प्रतिशत को कागज के टुकड़ों में बदल दिया, तो यह उम्मीद रखना पूरी तरह वाजिब था कि इस कदम के नतीजों का पूर्वानुमान कर इसकी प्रक्रिया सहज करने की समस्त सावधानियां बरती गयी होंगी।
मगर, ऐसा लगता है कि सरकार इस कदम की नाटकीयता में इस कदर डूबी थी कि उसने इन बारीकियों की अनदेखी कर दी। इस घोषणा के पूर्व सरकार तथा प्रधानमंत्री द्वारा इन तथ्यों पर गौर किया जाना था कि लगभग 47 फीसदी आबादी बैंकिंग नेटवर्क से बाहर है, 30 करोड़ लोगों के पास कोई पहचान पत्र नहीं है, ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था का 98 प्रतिशत नकदी आधारित है तथा देश के सारे लेन-देन का 80 प्रतिशत नकद होता है। इसलिए चंद दिनों के दौरान देश की अर्थव्यवस्था में 16 लाख करोड़ के नये नोट डालने की दरकार थी, जिसके लिए बैंकों एवं एटीएम प्रणालियों को सुसज्जित कर लेना था।
इस कार्य की विराटता देखते हुए मैं नहीं समझता कि सरकार ने जरूरी तैयारियां पूरी कर रखी थी। 2,000 रुपये के नये नोटों का आकार आसानी से वर्तमान एटीएम प्रणाली के अनुरूप तय किया जा सकता था, ताकि इन मशीनों में फेर-बदल करने की जरूरत ही न पड़ती।
हालांकि, कालेधन पर वार करने का कोई ‘सही’ समय नहीं होता, फिर भी इस पहलू पर कुछ तो ध्यान दिया ही जा सकता था। यह पिछले फसल की कटाई तथा नये फसल की बुवाई की घड़ी है, जब लगभग सारा लेन-देन नकद ही होता है। यह विवाहों का वक्त भी है, जब एक अनुमान के अनुसार अगले कुछ ही दिनों में डेढ़ करोड़ शादियां संपन्न की जानी थीं, जबकि परेशान परिजन बैंकों तथा नकदी मशीनों के सामने कतारों में लगे हैं.
यह तथ्य अपनी जगह कायम है कि समांतर अर्थव्यवस्था का अंत सिर्फ नोटबंदी से ही नहीं हो सकता। अनुमान अलग-अलग हो सकते हैं, पर उनमें ज्यादातर इसकी तस्दीक करते हैं कि कालेधन का केवल छह फीसदी या उससे भी कम ही नकद है, बाकी सब बेनामी संपत्तियों, सोने-चांदी या विदेशों में सुरक्षित है। सरकार इन पर कैसे काबू करने जा रही है? इसके अतिरिक्त कालेधन के जन्म की जड़ों तक जाने की जरूरत भी है, जिनमें सबसे अहम चुनावी सुधार है, जिसमें कालेधन तथा राजनीतिक फंडिंग के बीच की ‘नार’ ही काट डालने की क्षमता है।
नोटबंदी की परेशानियां मध्य तथा निम्न आर्थिक-वर्ग ही क्यों झेलें, जबकि बड़ी मछलियां जाल से निकली जा रही हैं। अभी ही दलालों तथा कारोबारियों की एक जमात उभर आयी है, जो सामान्यजनों के जन-धन खातों तथा उनकी जायज बचतों के दुरुपयोग कर अपने कालेधन के 500 तथा 1,000 रुपयों को सफेद करने में लगे हैं। सरकार का तात्कालिक कर्तव्य यह है कि वह उन सामान्यजनों की परेशानियों के शमन के लिए सभी जरूरी कदम उठाये, जिनके पास नकदी तो है, पर वह काली नहीं है।
संसद की बहसों के दौरान तथा राज्य सरकारों द्वारा भी इस दिशा में कुछ रचनात्मक सुझाव आये हैं, जिन पर सरकार को भी रचनात्मक ढंग से गौर करने तथा हर वैसे व्यक्ति पर कालेधन के जमाखोरों से साठगांठ का ठप्पा लगाने से बाज आने की जरूरत है, जो सरकारी कृत्य का अंध समर्थन नहीं करता। अभी यह कह पाना संभव नहीं है कि यह परेशानी और कितने दिन बनी रहेगी तथा आर्थिक अस्तव्यस्तता का आकार और अवधि क्या होगी।
मगर इस पूरी प्रक्रिया से सीखा जानेवाला एक सामयिक सबक यह है कि अच्छी नीयत को भी उचित योजना तथा क्रियान्वयन की दरकार होती है। जरूरत इस बात की है कि सरकार यह सबक विनम्रता से स्वीकार करे, न कि उसकी अवज्ञा करे।

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