नोटबंदी के फैसले से परेशान किसानों ने विधानसभा के सामने फेंके आलू, मची लूट

  • लोगों को मुफ्त में वितरित किया धान और आलू मोदी सरकार के विरोध में जमकर की नारेबाजी
  • कहा, मंडियों में नहीं खरीदी जा रही फसल, गेंहूं की फसल की बुआई के लिए नहीं हैं पैसे
  • खाद और बीज खरीदने के लिए नहीं है पैसा

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
captureलखनऊ। नोटबंदी के फैसले से परेशान किसानों ने आज विधानसभा के सामने अपने आलू बिखेर दिए। इस दौरान किसानों ने वहां मौजूद लोगों को मुफ्त में आलू और धान का वितरण किया। किसानों ने यह प्रदर्शन भारतीय किसान युनियन के बैनर तले किया। किसानों का कहना है कि मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले से उनकी फसल बिक नहीं पा रही है। मंडियों में मायूसी छाई है। मंडी व्यापारी पैसा न होने की बात कह कर उनके आलू की खरीद नहीं कर रहे हैं।

भारतीय किसान यूनियन के आह्वïन पर हजारों किसान विधानसभा के सामने पहुंचे। यहां उन्होंने आलू बिखेर कर नोटबंदी का विरोध किया। इस दौरान किसानों ने सरकार विरोधी नारे भी लगाए। किसानों का कहना है कि केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले के कारण उनको अपनी फसलों को बेचने में काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मंडी में उनकी आलू की फसल की खरीदी नहीं हो रही है। उनका कहना है कि पैसे के अभाव में किसान न तो आलू बेच पा रहा है और न ही धान। बैंक से पैसे नहीं मिल पाने के कारण किसान अगली फसल की बुआई तक नहीं कर पा रहा है। खेत खाली पड़े हैं। पैसा न होने के कारण वे गेंहू और अन्य फसलों की खेती तक नहीं कर पा रहे हैं। उनके पास खाद और बीज तक के लिए पैसे नहीं हैं। किसानों ने कहा कि नहरों में पानी नहीं आ रहा है। रही सही कसर बिजली विभाग की मनमानी ने निकाल दी है। भाकियू के बैनर तले किसान नेता हरनाम सिंह की अगुआई में विधानसभा के सामने एकत्र हुए किसानों ने जोरदार प्रदर्शन किया। गौरतलब है कि गत आठ नवंबर को मोदी सरकार ने कालेधन पर नियंत्रण लगाने के लिए नोटबंदी का फैसला लागू किया था। इसके बाद से लोग काफी परेशान थे। ठीक रबी की फसल के मौके पर आए इस फैसले ने किसानों को बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया।

राहत न मिलने से आक्रोश

किसानों को सरकार की घोषणा के बावजूद राहत नहीं मिल पा रही है। सरकार ने किसानों को पचास हजार प्रति सप्ताह निकालने की लिमिट बांधी है। लेकिन यह पैसा भी उन्हें नहीं मिल पा रहा है। इसकी एक वजह बैंकों में नगदी का न होना है। इसके चलते वे काफी परेशान है। यही नहीं सरकार के नियम के कारण सहकारी बैंकों से भी उन्हें राहत नहीं मिल पा रही है। इससे प्रदेश के किसान बेहद खफा हैं।

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