नेक फैसले पर अमल की मुश्किल

पुराने बड़े नोटों के अचानक निरस्त किए जाने के बाद से मचे देशव्यापी हडक़ंप को देखकर इन पंक्तियों की लेखिका को कवि (टीएस एलियट) की पंक्ति याद आ रही है – एक सही काम गलत वजह से कर बैठना (टु डू द राइट डीड फॉर द रौंग रीजन)। काले पैसे की बाढ़ रोकने हेतु एक विशाल देशव्यापी कोशिश करना एकदम सही था, किंतु जिस अफरातफरी में जिस तरह बिना जमीनी स्तर की पूर्व-तैयारी के इस काम को अंजाम दिया गया, उससे काले धन के विरोधियों के बीच भी भारी अव्यवस्था और असंतोष उफन चले हैं। तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों से ऐन पहले इस कदम पर सरकार की मूल मंशा और सत्तारूढ़ पार्टी के खजाने को लेकर जो तमाम तरह के कड़वे सवाल सरकार के विरोधी धड़ों ने उठाने थे, वे लगातार मीडिया में उठ रहे हैं। और वे सच हैं कि गलत इस पर तर्क सुनने का मूड गुस्साई जनता के बीच नहीं है। इससे कई न्यस्तस्वार्थी धड़ों द्वारा कालेधन के खिलाफ उठाई गई इस मुहिम के खिलाफ मानसिकता बनाई जा रही है, जो दु:खद है। लेकिन बिना बैंकिंग संस्थाओं को भरोसे में लिए या नई मुद्रा के वितरण की मशीनरी को परखे और उसे अतिरिक्त बल दिए हठात् घोषित कदम का लडख़ड़ाना लगभग तय था।
काले धन पर हमारे यहां समय-समय पर सतही भाषणबाजी तो बहुत होती रही है, किंतु अक्सर वह विपक्षी दल के संसाधनों तथा चुनाव प्रचार को स्याह संदिग्ध बनाने की मंशा से ही की जाती है। काली पूंजी के विविध आयामी स्वरूप, फैलाव की वजहों और अलग-अलग क्षेत्रों में उसके चलन की बाबत आम जनता को बहुत कम जानकारी मिल सकी है। इससे आम धारणा बनी है कि काला धन यानी तिजोरी या तलघर में छुपाए गए नोटों के ग_र। दरअसल, सच यह है कि आज कालेधन का सिर्फ 26 फीसदी भाग बोरों या तिजोरियों में बंद नोटों का है। शेष काली पूंजी तो एक प्रवाहित धारा है, जो कर चोरी के ग्लेशियरों से उपजने के बाद सोने, हथियारों, ड्रग्स के व्यापारियों की मदद से अलग-अलग धाराओं में बंटती तथा बड़ी मात्रा में विदेशों को पठा दी जाती है। फिर वहां से उसे नाना तिकड़मी तरीकों से सफेद बनाकर देश में निवेश के लिए लाया जाता है और उससे जो कमाई हो, उसे कर विभाग से छुपाकर फिर बाहर भेजा जाता है। इस सारे चक्र में नाना सत्तारूढ़ सरकारों, उनके विश्वस्त बाबुओं तथा नियामक एजेंसियों की अनिवार्य और सक्रिय मिलीभगत होने के कई प्रकरण सामने आते रहे हैं। पर अधिकतर मामलों में प्रमाण नहीं मिलते या गवाह मुकर या मर जाते हैं और पार्टी चलती रहती है। ऐसी बहुधा गुणों वाली चंचला पूंजी को धनकुबेर नोटों के रूप में तलघर की बोरियों में क्योंकर बंद रखें, जबकि उसका फायदेमंद प्रवाह उसे दुगुना-चौगुना बना सकता है? इसलिए ताजा मुहिम जो अब तक नोटों के रूप में जमा काले पैसे को ही लक्षित करती दिखती है, यदि आगे बढक़र बड़े बैंक डिफॉल्टर उद्योगपतियों, गुप्त विदेशी खातों में नामित लोगों व ज्ञात कर चोरों तक नहीं जाती, तो वो काले धन के एक छोटे हिस्से को ही बाहर ला पाएगी।
अब आते हैं उस करदाता मध्यवर्ग पर, जो इस समय घंटों इंतजार के बाद भी खाली हाथ एटीएम मशीनों और भीड़ से ठंूसे बूथ के बीच हकबकाया हुआ खड़ा है। रिजर्व बैंक गवर्नर का हस्ताक्षरित हर सरकारी नोट तो वादा करता है कि वह धारक को अमुक राशि देगा; पर ईमानदार धारक पा रहा है कि वह एटीएम या चेक की मार्फत अपनी सुरक्षित समझी गई पूंजी तक भी नहीं पहुंच सकता। इस मौके पर उसका गुस्सा, खासकर बुजुर्गों, बच्चों, हारी-बीमारी तथा शादी-ब्याह के झंझटों से जूझते लोगों तथा गृहणियों का आक्रोश हमको जायज लगता है। क्या बैंकों में सुरक्षित अपनी गाढ़ी कमाई तथा बचत तक गाढ़े समय में उनकी पहुंच को पहले से कुछ सुविचारित पूर्व कदमों द्वारा आसान और निरापद बना देना उस सरकार का दायित्व नहीं था जो आज मुद्रा रद्दोबदल की इन तकलीफदेह घडिय़ों में उनको देशहित में कुर्बानी देने और एटीएम मशीनों की दुरुस्ती तक धीरज बनाए रखने का प्रवचन देने बैठ गई है?
बताया जा रहा है कि इस मुहिम का अंतिम लक्ष्य जनता को देश में नकद लेन-देन से बचाकर उसे कार्ड द्वारा पैसे के ऑनलाइन लेन-देन से जोड़ देना है। इससे कुल कमाई तथा खर्चे से जुड़े एक-एक पैसे का हिसाब-किताब रखा जा सकेगा। कराधान बढ़ेगा, करचोरी असंभव हो जाएगी और काली कमाई का बड़ा स्रोत खत्म हो जाएगा। बहुत अच्छे। कालेधन की समाप्ति के लिए ऑनलाइन खरीदारी व रिटेल उद्योग को बढ़ावा दिया जाना भी गलत नहीं है। लेकिन देश में आज सिर्फ 10 लाख कंप्यूटरीकृत सेल रजिस्टर हैं। यह तादाद इस उद्योग के चीन या अमेरिका के दसवें भाग जितनी भी नहीं। इनकी मार्फत कितनी जनता मोबाइल की मदद से ही सही, ई-खरीदारी कर सकती है? सरकारी आंकड़ों के उजास में यह भी भ्रमकारी साबित होता है कि हमारे अधिकतर कामकाजी लोग बड़ी तादाद में बचत कर बैंकों में रख रहे हैं और मोबाइल बैंकिंग अब चुटकियों का खेल बन रही है। आज भी हमारे देश का 90 फीसदी कमासुत वर्ग किसानी, छोटी-मोटी दुकानदारी, रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं और दिहाड़ी शहरी निर्माण कार्यों, फैक्टरियों या खेत पर काम करने वाले मजदूरों का है। इस अनारक्षित तबके की सारी दैनिक कमाई तथा खर्च नकदी से ही होता है। ठीक है, प्रधानमंत्री जन-धन योजना के तहत इस वर्ग को जद में लाकर देश में 25.4 करोड़ लोगों के लिए बैंक खाते खुल गए हैं और उसके बल पर 19.3 करोड़ भारतीय आज डेबिट कार्ड धारक बन गए हैं। किंतु इनका उपयोग वे ई-कॉमर्स या ई-बैंकिंग को नहीं, एटीएम से पैसा निकालने को ही प्राय: करते हैं। पंचायतों को लैपटॉप देकर ई-कॉमर्स से गांव के गांव जोड़े तो गए हैं, पर प्राय: कागजों पर। बिजली, कनेक्टिविटी तथा सर्वर सबकी व्यवस्था खराब है। इस सबमें बुनियादी सुधार लाए बिना हम किस बूते कैशलेस अर्थव्यवस्था की जुमलेबाजी करें?
हालिया घटनाएं दिखा रही हैं कि प्रति एक लाख आबादी पर 200 एटीएम मशीनें गहरी जरूरत पडऩे पर जनता के लिए कितनी नाकाफी तथा अक्षम साबित हुई हैं। न उनमें बहुचर्चित 2000 रुपए के नए नोट समा सकते हैं, न ही पर्याप्त मात्रा में सौ के नोट उनके भीतर डाले जा सकेंगे। लिहाजा राजधानी के अधिकतर एटीएम भी सिर्फ दो घंटे बाद खलास हो जा रहे हैं। उधर गांवों में देवोत्थानी एकादशी से ब्याह के लगन खुल गए हैं, तिस पर धान कटाई का सीजन है, जिसके कटाई मजदूरों की 1400 रुपए की दैनिक कैश दिहाड़ी भी किसान नहीं दे पा रहा। सो उसका अलग हाहाकार है। अंग्रेजी कहावत है कि दौडऩे से पहले इंसान को चलना ठीक से सीख लेना चाहिए। कालेधन की अलक्ष्मी का विसर्जन जरूर अच्छा खयाल है, लेकिन उसे दौड़ाने से पहले हमारी व्यवस्था को खुद अपने ढांचे को सही तरह चलना सिखाना होगा, वरना नाक के बल गिरने का खतरा बनता है।

Pin It