निगम के अधिकारियों का सुस्त रवैया स्मार्ट सिटी की राह में बन रहा रोड़ा

  • स्मार्ट सिटीज की दूसरी लिस्ट में जगह बनाने के बावजूद नहीं चेत रहे जिम्मेदार
  • अपना केबिन चमकाने के नाम पर नगर निगम का राजस्व लुटा रहे अधिकारी

अंकुश जायसवाल
captureलखनऊ। नगर निगम के अधिकारियों का स्मार्ट सिटी के प्रति रुझान कम होता जा रहा है। इसी वजह से स्मार्ट सिटी को डेवलप करने के काम को अब तक अमली जामा नहीं पहनाया जा सका है। शहर का शहरी विकास मंत्रालय की फास्ट ट्रैक में चुनाव होने के बाद भी पांच महीने बीत चुके हैं। इसके बाद भी नगर निगम की ओर से स्मार्ट सिटी को डेवलप करने का कोई कारगर कदम नहीं उठाया गया है। फिलहाल नगर निगम और स्मार्ट सिटी के अधिकारी अपना केबिन चमकाने में बेतहाशा पैसे खर्च कर रहे हैं। जबकि नगर निगम खुद आर्थिक तंगी से जूझ रहा है। उस पर करोड़ों का कर्ज बकाया है। इसलिए तय समय में स्मार्ट सिटी को डेवलप करने का काम शुरू और पूरा हो सकेगा। इस पर सवालिया निशान उठने लगे हैं।

जिम्मेदार कुछ भी बताने से झाड़ रहे पल्ला

नगर निगम के अधिकारी बड़े-बड़े दावे करने में व्यस्त हैं। यहां तक की मेयर भी बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हैं। लेकिन हकीकत में स्मार्ट सिटी का कोई भी कार्य अभी तक जमीनी स्तर पर नहीं दिख सका है। यदि कार्यों की प्रगति के बारे में निगम और स्मार्ट सिटी कार्यालय के अधिकारियों से पूछा जाता है, तो जिम्मेदार अधिकारी कुछ भी बताने से बचते नजर आते हैं। यदि काम शुरू हुआ होता और सबकुछ ठीक होता, तो अधिकारी खुद ही अपने बखान करते नहीं थकते। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है।
भारत सरकार ने लखनऊ सहित 13 शहरों को फास्ट ट्रैक में किया था शामिल
अधिकारियों के सुस्त रवैये के कारण ही जनवरी 2016 में शहरी विकास मंत्रालय की तरफ से जारी स्मार्ट सिटीज की लिस्ट में लखनऊ नहीं था। इससे राजधानी के लोगों को काफी निराशा हुई थी। तब गृहमंत्री राजनाथ सिंह और मेयर डॉ. दिनेश शर्मा की सिफारिशों और जनता के समर्थन की वजह से भारत सरकार ने लखनऊ समेत अन्य 13 शहरों को फास्ट ट्रैक में चुना था। इसे भाजपा का चुनावी स्टंट भी माना जा रहा है क्योंकि 2017 में यूपी में विधानसभा चुनाव होना है। इन सबके बावजूद स्मार्ट सिटी के डेवलपमेंट को लेकर निगम के अधिकारी गंभीर नहीं है।

पांच माह बाद भी जमीनी स्तर पर नहीं हुआ कोई काम

मई 2016 को लिस्ट जारी होने के पांच माह बाद भी जिम्मेदारों की ओर से जमीनी स्तर पर कोई कार्य नहीं किया गया है। फास्ट ट्रैक में चुने गये अन्य शहरों की अपेक्षा राजधानी में स्मार्ट सिटी को लेकर किया गया कार्य बेहद पीछे है। जिम्मेदारों के पास इसको लेकर कोई भी जवाब नहीं है। आलम ये है कि अपर नगर आयुक्त पीके श्रीवास्तव से कभी स्मार्ट सिटी के कार्यों की प्रगति के बारे में पूछा जाता है, तो उनकी ओर से सुस्त आवाज में एक ही जवाब आता है कि कुछ होगा तो बताएंगे। अब अपर नगर आयुक्त के इस जवाब से तो यही अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्मार्ट सिटी की सारी उपलब्धि केवल कागजों में ही है।
चकबस्त में बनेगा स्मार्ट सिटी का ऑफिस
लंबे समय के इंतजार के बाद आखिरकार स्मार्ट सिटी के निर्धारित ऑफिस बनने का रास्ता साफ हो गया है। अब तक यह लालबाग स्थित नगर निगम मुख्यालय में वैकल्पिक तौर पर चलाया जा रहा था। इसके लिए निर्धारित जमीन चकबस्त कोठी नंबर-1 से बीते दिनों पहले नगर निगम की टीम ने वर्षों के अवैध कब्जे को जमीदोज कर खाली करा लिया था। लेकिन इस पर काम कब से शुरू करेगा नगर निगम यह अभी तक एक सवाल है। स्मार्ट सिटी का कार्यालय बनने के बाद ही इसके कार्य की गति पकडऩे की बात सामने आ रही है।

कहीं मेट्रो तो नहीं बन रही स्मार्ट सिटी की राह में रोड़ा

विभागीय सूत्रों ने बताया कि स्मार्ट सिटी के कार्यों में गति न मिल पाने की वजह मेट्रो का निर्माण कार्य भी है। इसके चलते अधिकारी भी चुप्पी साधे हुए हैं। मुख्यमंत्री का प्रोजेक्ट होने की वजह से इसको वरीयता भी दी जा रही है। जबकि प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट स्मार्ट सिटी को लेकर अधिकारी गंभीर नहीं दिख रहे हैं। यही कारण है कि इस पर अधिकारी जवाब देने से बच रहे हैं।

कागजों में हो रहा स्मार्ट सिटी का काम

स्मार्ट सिटी के विकास की गति को लेकर अधिकारी भले ही गंभीर न हों लेकिन अपना केबिन चमकाने के नाम पर लाखों रुपये खर्च करने का काम शौक से कर रहे हैं। ऐसे में आर्थिक तंगी से जूझ रहे नगर निगम के अधिकारियों को राजस्व की फिजूलखर्ची का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रहता है। विभागीय सूत्रों की मानें तो अधिकारियों के केबिन में लगी टाइल्स अच्छी हालत में थीं। इसके बावजूद उसे तुड़वाकर दूसरी लगवाने की व्यवस्था की जा रही है। वहीं प्लाईबोर्ड, वुडिंग व नई वायरिंग से पूरे कैबिन का नक्शा बदलने की तैयारी चल रही है। जबकि अधिकारी पहले से चकाचक हालत में बने कमरों में बैठकर आसानी से काम कर सकते हैं।

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