दादरी का दुख और चुनावी राजनीति की गहमा-गहमी

किसी भी दर्दनाक, खौफनाक, शर्मनाक, आपसी विवाद, छेड़छाड़ की घटना को हमारे नेता किस तरह सियासी रंग में रंग देतेCapture हैं, इसका प्रमाण है ग्रेटर नोएडा के दादरी का वह गांव जहां एक मुस्लिम बुजुर्ग की हत्या और उसके पुत्र की मरणासन्न स्थिति इस अफवाह के चलते कर दी गई दी गई कि उसने कथित रूप से गाय को मारा था। उत्तर प्रदेश में गौमांस पर विवाद नया नहीं है। हमेशा से एक पक्ष गौ हत्या का विरोध करता रहा है तो दूसरा वर्ग गौमांस का यह कहकर समर्थन करता चला आ रहा है कि कौन क्या खायेगा, इसका फैसला वह स्वयं ही करेगा। इसी विरोधाभास के चलते गाय की पूजा करने वाले और गौमांस का सेवन करने वालों के बीच विवाद अक्सर किसी न किसी रूप में सामने आ जाता है। दादरी के गांव की घटना को नेताओं ने जिस तरह से प्रचारित और प्रसारित किया, उससे तनाव का वातावरण पैदा हो गया। हालांकि सभी आरोपी पकड़ लिये गये हैं, लेकिन कुछ नेता ऐसा वातावरण तैयार कर रहे हैं कि पीडि़त को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की नहीं बल्कि उनकी (नेताओं) है।

उत्तर प्रदेश में क्या 2017 विधानसभा चुनाव के लिये राजनैतिक बिसात बिछने लगी है? हाल के दिनों में प्रदेश में जिस तरह से नेताओं की भडक़ाऊ बयानबाजी में तेजी और बाहरी नेताओं की आवाजाही बढ़ी है, उसे सियासी नजरिये से अनदेखा नहीं किया जा सकता है। सियासतदारों की नीयत में जिस तरह का दोहरापन नजर आ रहा है, वह देशहित और जातीय व्यवस्था के लिये खतरनाक है। नेतागण अपनी सियासी ‘हांडी’ में क्या पका रहे हैं, वह भले ही समझते हों कि इसकी जानकारी किसी को नहीं हैं, लेकिन ऐसा है नहीं। नेताओं की ‘हांडियों’ से निकलने वाली ‘महक’ यूपी की गंगा-जमुनी संस्कृति के लिये अभिशाप बनती जा रही है। प्रदेश में जनता के बीच विश्वास का माहौल कम हो रहा है तो तनाव का वातावरण बढ़ता जा रहा है। तमाम दलों के नेता अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकने के लिये विवाद की छोटी-छोटी घटनाओं और वारदातों को साम्प्रदायिक और राजनैतिक रंग देकर नफरत की आग भडक़ा रहे हैं। सभ्य समाज के लिये जो घटनाएं कलंकित होती हैं, उसका भी नेतागण राजनीतिकरण कर देते हैं। इसी के चलते प्रदेश कई बार दंगों की आग में झुलस चुका है। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में तो कई बार महौल बिगड़ चुका है। मुजफ्फरनगर, मेरठ, बरेली, मुरादाबाद, सहारनपुर, शामली आदि जिलों में नेताओं द्वारा भडक़ाई गई नफरत की आग न जाने कितनों को मौत की नींद सुलाकर घर तबाह कर चुकी है।
किसी भी दर्दनाक, खौफनाक, शर्मनाक, आपसी विवाद, छेड़छाड़ की घटना को हमारे नेता किस तरह सियासी रंग में रंग देते हैं, इसका प्रमाण है ग्रेटर नोएडा के दादरी का वह गांव जहां एक मुस्लिम बुजुर्ग की हत्या और उसके पुत्र की मरणासन्न स्थिति इस अफवाह के चलते कर दी गई दी गई कि उसने कथित रूप से गाय को मारा था। उत्तर प्रदेश में गौमांस पर विवाद नया नहीं है। हमेशा से एक पक्ष गौ हत्या का विरोध करता रहा है तो दूसरा वर्ग गौमांस का यह कहकर समर्थन करता चला आ रहा है कि कौन क्या खायेगा, इसका फैसला वह स्वयं ही करेगा। इसी विरोधाभास के चलते गाय की पूजा करने वाले और गौमांस का सेवन करने वालों के बीच विवाद अक्सर किसी न किसी रूप में सामने आ जाता है। दादरी के गांव की घटना को नेताओं ने जिस तरह से प्रचारित और प्रसारित किया, उससे तनाव का वातावरण पैदा हो गया। हालांकि सभी आरोपी पकड़ लिये गये हैं, लेकिन कुछ नेता ऐसा वातावरण तैयार कर रहे हैं कि पीडि़त को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की नहीं बल्कि उनकी (नेताओं) है। मीडिया भले इसमें कैसे पीछे रह सकता था, उसने भी गांव में डेरा डाल दिया। आखिर टीआरपी बढ़ाकर ही तो इलेक्ट्रानिक मीडिया अपना बिजनेस बढ़ाता है। तमाम प्रदेशों के जिन नेताओं ने कभी यूपी का रूख नहीं किया था वह ग्रेटर नोएडा के बिसाहड़ा गांव मे धूल उड़ाते मिले। हर नेता इस घटना को दुर्भाग्यपूर्ण बताने के साथ ही यह भी दोहरा रहा है कि इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, लेकिन वह खुद राजनीति करने से बाज नहीं आ रहा है। गांव पहुंचने वाले सभी नेता इंसानियत और भाईचारे की बात कर रहे थे जो नहीं पहुंच पाया वह मीडिया को बयान देकर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे।
यह संभव नहीं कि ऐसी घटनाओं पर राजनेता सक्रिय न हों और राजनीति न करें, लेकिन मुश्किल यह है कि राजनीति के नाम पर घटिया राजनीति हो रही है। राजनीति का मतलब है लोगों को जागरूक करना और दिशा देना, लेकिन अब ऐसे मामलों में सक्रियता दिखाने वाले नेता वोट बैंक को साधने और विरोधी दलों को कठघरे में खड़ा करने का ही काम करते हैं। इस घटना के बाद जहां भाजपा विरोधी दल यह माहौल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं कि इस वारदात के लिए केंद्र सरकार की रीति-नीति जिम्मेदार है वहीं दूसरी ओर भाजपा नेता इस घटना की गंभीरता को कम करने की कोशिश करते दिख रहे हैं। भाजपा नेतृत्व की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने बड़बोले नेताओं पर सख्ती से लगाम लगाए क्योंकि ऐसे नेता कुल मिलाकर उसकी जड़ें खोदने का ही काम कर रहे हैं। यदि इस तरह की घटनाएं पहले हो चुकी हैं तो इसका यह मतलब नहीं कि एक और ऐसी ही घटना की अनदेखी कर दी जाए। इस तरह की घटनाएं सभ्य समाज को कठघरे में खड़ा करने वाली हैं।
यह विचित्र है कि इसकी अनुभूति बिसाहड़ा गांव के लोगों को तो हो रही है, लेकिन राजनीतिक दल कहीं कोई सबक सीखते और समाज को दिशा देते हुए नहीं दिख रहे हैं। अभी तक किसी भी नेता की ओर से ऐसा कोई बयान सुनने को नहीं मिला कि यह घटना शर्मिंदा करने वाली है, लेकिन इसकी भी जरूरत है कि अवैध रूप से हो रही गोकशी पर रोक लगाई जाए। इसके उलट कुछ लोग यह संदेश देने की कोशिश करते दिख रहे हैं कि गोवध पर ज्यादा चिंतित और परेशान होने की जरूरत नहीं है। यह रवैया ठीक नहीं। तमाम आधुनिकता और प्रगति के बावजूद यह अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए कि औसत हिंदू गोवध को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दें। गोवध के संदेह में किसी की हत्या करने और गोवध पर आपत्ति प्रकट करने वालों में अंतर है। इस अंतर को ध्यान में रखा जाना चाहिए, लेकिन इसकी जानबूझकर अनदेखी की जा रही है। चूंकि अब यह स्पष्ट है कि बिसाहड़ा गांव पहुंच रहे नेताओं का मकसद सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना है इसलिए स्थानीय प्रशासन को सख्ती का परिचय देना चाहिए। उसे ऐसे नेताओं को गांव में प्रवेश करने से रोकना चाहिए जो माहौल खराब करने का काम कर रहे हैं।
हकीकत तो यही है कि ऐसी वारदातों के लिये सभी दल जिम्मेदार हैं। भाजपा और समाजवादी पार्टी नेतृत्व की यह जिम्मेदारी थी कि वह अपने बड़बोले नेताओं पर सख्ती से लगाम लगाती, लेकिन दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया। दोनों ही दलों के शीर्ष नेतृत्व को समझना होगा कि कुल मिलाकर ऐसी वारदातें उसकी जड़ें खोदने का ही काम करते हैं। दादरी कांड के बहाने ही हैदराबाद के ओवैसी और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल तक यूपी में अपनी सियासत चमकाने आ गये। यह विचित्र है कि इस बात की अनुभूति बिसाहड़ा गांव के लोगों को तो है, लेकिन राजनीतिक दल कोई सबक सीखने को तैयार नहीं हैं। अभी तक किसी भी नेता की ओर से ऐसा कोई बयान सुनने को नहीं मिला जिससे एहसास हो सके कि हमारे नेता समाज को जोडऩे का भी काम करते हैं।

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