…तो अरबों रुपये पचा गई भाजपा

सवाल यह है कि आखिर ये जमीनें नोटबंदी फैसले के लागू होने से ठीक पहले ताबड़तोड़ ढंग से क्यों खरीदी गईं? क्या भाजपा अपने धन को रियल एस्टेट में लगाकर नोटबंदी के असर से अपने को बचाने की कोशिश तो नहीं कर रही थी? क्या विपक्ष के इन आरोपों को मान लिया जाए कि मोदी सरकार का नोटबंदी का फैसला लीक हुआ और भाजपा ने इसके लागू होने से पहले अपने कालेधन को ठिकाने लगा दिया?

sajnaysharmaसंसद में नोटबंदी के फैसले पर विपक्ष की घेरेबंदी के बीच भाजपा द्वारा अरबों की जमीनें खरीदने के खुलासे ने मोदी सरकार की मुसीबतें और बढ़ा दीं हैं। फैसले से ठीक पहले भाजपा के राष्टï्रीय अध्यक्ष अमित शाह के इशारे पर भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं ने अरबों रुपये की जमीनों की डील फाइनल की। इस खुलासे के बाद विपक्ष ने भाजपा पर कालेधन को सफेद करने का आरोप लगाया है। साथ ही पूरे मामले की जांच कराने की मांग की है। सवाल यह नहीं है कि पार्टी कार्यालयों के निर्माण के लिए भाजपा ने जमीन खरीदी। जमीन खरीदना अपराध नहीं है। सवाल यह है कि आखिर ये जमीनें नोटबंदी फैसले के लागू होने से ठीक पहले ताबड़तोड़ ढंग से क्यों खरीदी गईं? क्या भाजपा अपने धन को रियल एस्टेट में लगाकर नोटबंदी के असर से अपने को बचाने की कोशिश तो नहीं कर रही थी? क्या विपक्ष के इन आरोपों को मान लिया जाए कि मोदी सरकार का नोटबंदी का फैसला लीक हुआ और भाजपा ने इसके लागू होने से पहले अपने कालेधन को ठिकाने लगा दिया? तथ्यों से पुष्टिï होती है कि भाजपा ने इन जमीनों की खरीदी नोटबंदी का फैसला आने के दो माह पूर्व करनी शुरू कर दी थी। दरअसल, आठ नवंबर को मोदी सरकार ने देश में 500 और 1000 के नोटों को बंद करने का ऐलान किया था और भाजपा ने सितंबर से अक्टूबर माह के बीच ताबड़तोड़ जमीनें खरीदीं। मोदी सरकार की माने तो उसने नोटबंदी की तैयारी छह माह पूर्व शुरू की थी यानी भाजपा के कुछ नेताओं तक इसकी गोपनीयता का खुलासा हो चुका था और उन्होंने आनन-फानन में इन नोटों को जमीनों की खरीद के जरिए ठिकाने लगाया। खरीदी में अधिकांशत: नगद भुगतान किया गया। अब भले ही भाजपा सफाई दे रही हो कि जमीन खरीदने की प्रक्रिया काफी दिनों से चल रही है, तथ्य और समय दोनों ही उसके तर्कों को खारिज करते नजर आ रहे हैं। कुल मिलाकर धुआं उठा है तो आग भी कहीं न कहीं लगी ही होगी। फिलहाल इस खुलासे ने मोदी सरकार और भाजपा दोनों को कटघरे में खड़ा कर दिया है। इसने कालेधन के खिलाफ मोदी सरकार की मंशा पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सरकार को विपक्ष और जनता दोनों को जवाब देना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ तो फिर कभी जनता देशहित के नाम पर कष्टïों को सहने की किसी सरकार की अपील को इतने शिद्दत से स्वीकार नहीं करेगी। यह सरकार की साख का भी सवाल है।

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