तीन प्रतिशत बच्चे डिस्लेक्सिया के शिकार

इससे पीडि़त बच्चों को अच्छी देखभाल से किया जा सकता है ठीक

वीरेंद्र पांडेय
captureलखनऊ। मौजूदा परिवेश में भागदौड़ भरी जिन्दगी कुछ बच्चों के लिए समस्या का सबब बनती जा रही है। विशेषकर उन बच्चों में जो शिक्षा तथा सामाजिक कौशल में अन्य बच्चों की अपेक्षा धीमी गति से विकास करतें हैं। उन बच्चों की समस्या जाने बिना शिक्षकों तथा अभिभावकों द्वारा अनावश्यक दबाव डाला जाता है। जिसके कारण ये बच्चे अपने आप से ही संघर्ष करने लगते हैं। उसके बाद समाज में भी ऐसे बच्चे मुसीबत बन जाते हैं।
बाल न्यूरोलॉजी रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल भारत ने बताया कि ऑटिज्म डिस्लेक्सिया कोई बीमारी नहीं है। डिस्लेक्सिया पीडि़त बच्चों को पढऩे-लिखने में समस्या आती है, जिसमें बच्चों को शब्दों को पहचानने, पढऩे, याद करने और बोलने में परेशानी होती है। वे कुछ अक्षरों और शब्दों को पहचान तथा उच्चारण में समस्या आती है। उन्होंने बताया कि कुछ लोग डिस्लेक्सिया को मानसिक रोग से जोड़ते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। डिस्लेक्सिया से पीडि़त बच्चों को खास देखभाल से पूरी तरह ठीक किया जा सकता है।

डिस्लेक्सिया पीडि़त बच्चों के लिए 200 तरह की थेरेपी

डॉ. राहुल भारत लखनऊ में डिस्लेक्सिया पीडि़त बच्चों को इलाज तथा कांउसलिंग के माध्यम से उज्जवल भविष्य ुदिलाने की मुहिम चला रहे हैं। वह कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में न्यूरोलॉजी में प्रशिक्षित बाल रोग विशेषज्ञ के रुप में काम कर चुके हैं। उन्होंने बताया कि डिस्लेक्सिया विकार 3-15 साल उम्र के लगभग 3 प्रतिशत बच्चों में पाया जाता है। जब बच्चा स्कूल जाना शुरू कर देता है, तो उसमें दो प्रकार के विकार उत्पन्न होते हैं। पहली समस्या के तहत डिस्लेक्सिया के लक्षण दिखने लगते हैं और दूसरी समस्या में बच्चों में लक्षण का पता ही नहीं चल पाता। जिन बच्चों में समस्या का पता ही नहीं चल पाता उनकी संख्या लगभग 20 प्रतिशत है। उन्होंने बताया कि इस तरह के बच्चों का इलाज करने के लिए उनके पास 200 प्रकार की थेरेपी मौजूद है। उन्होंने बताया कि अपने देश में वह चाहे माता-पिता हों या स्कूल की शिक्षा-प्रणाली, डिस्लेक्सिया से पीडि़त बच्चों की समस्या को हल्के में लेते हैं और अनावश्यक दबाव बनाते हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय परिवार में बच्चे की अकादमिक क्षमता और प्रदर्शन को ही उसकी बुद्धि, ज्ञान और प्रतिभा का मानक मानते हैं। कुछ बच्चों को पढऩे में तकलीफ होती है, वो अक्षरों और शब्दों को समझ नहीं पाते। ऐसे बच्चे हर कक्षा में हो सकते हैं। ये समस्याएं जन्मजात हो सकती हैं। अगर हम इन्हें पहचान पाएं और इनके प्रति संवेदनशील हों तो इनसे बाहर निकला जा सकता है।

पोषण की कमी बच्चों के मानसिक विकास में बाधा: डॉ.मनीष

भाउराव देवरस अस्पताल के बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. मनीष शुक्ला के मुताबिक उनके पास अक्सर ऐसे अभिभावक आते हैं जो बच्चें को शिक्षा में कमजोर बताते हैं। ऐसे अभिभावकों में जागरूकता की कमी आगे चलकर बच्चों के लिए परेशानी खड़ी कर देती है। माता-पिता डिस्लेक्सिया और पढ़ाई में कमजोर होने को एक ही बात समझ लेते हैं लेकिन दोनों में फर्क है। पढ़ाई में कमजोर बच्चों की समझने की क्षमता धीमी होती है जबकि डिस्लेक्सिया में सिर्फ बच्चे का शब्द ज्ञान कमजोर होता है लेकिन बच्चे की बौद्धिकता के सामान्य स्तर से इसका कोई लेना-देना नहीं है। इन बच्चों का दिमाग काफी तेज होता है। बच्चों में कुपोषण इसका बड़ा कारण होता है। किसी बात को देर से समझ आना, ध्यान एकाग्र नहीं कर पाना, बार-बार कक्षा में दूसरे बच्चों से पीछे रह जाना आदि का कारण कुपोषण हो सकता है। बच्चे के जन्म से पहले और जन्म के बाद इसका खतरा बना रहता है। शुरुआती सालों में यदि बच्चों के पोषण का ध्यान नहीं रखा गया तो उसके मानसिक विकास पर इसका असर होना तय है। यह तंत्रिका तंत्र की समस्या है, जो जन्म पूर्व कारकों पर निर्भर करती हैं। माता के संतुलित आहार की कमी, धूम्रपान का सेवन इसके कारण हो सकते हैं।

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