डेंगू, स्वास्थ्य सेवाएं और नाकामी

चिकित्सा सेवाओं के लगातार आधुनिक होते जाने के बाद भी डेंगू से लोगों की मौतों में इजाफा क्यों हो रहा है? क्या इसके लिए केवल सरकार जिम्मेदार है या फिर जनता में जागरूकता का अभाव भी इसकी भयावहता के लिए जिम्मेदार है? क्या महामारी का रूप ले रहे डेंगू की रोकथाम को सरकार दूसरी रणनीति बनाएगी या इसे सीजनल बीमारी मानकर टरका देने की अपनी प्रवृत्ति जारी रखेगी?

sanjay sharma editor5यूपी की पहली इंटरनेशनल महिला फुटबॉलर पूनम चौहान की डेंगू से मौत ने एक बार फिर इस बीमारी की भयावहता, सरकार की नीति और स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। डेंगू की भयावहता का आलम यह है कि इसने पूरे उत्तर भारत को अपनी चपेट में ले लिया है। उत्तर प्रदेश और दिल्ली समेत कई राज्यों में इस रोग ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली है। कई हजार इसकी चपेट में हैं। सरकारी अस्पतालों में रोजाना सैकड़ों नए मरीज पहुंच रहे हैं। अकेले प्रदेश की राजधानी लखनऊ में अब तक दो सौ लोगों की मौत डेंगू से हो चुकी है। इसकी चपेट में आकर तीन पुलिसकर्मियों की मौत हो चुकी है। तमाम कवायदों के बावजूद रोग पर नियंत्रण लगाने में चिकित्सा विभाग नाकाम रहा है। राजधानी में रोज डेंगू के नए मरीज भर्ती हो रहे हैं। रोग की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकारी अस्पतालों में मरीजों के इलाज के लिए जरूरी दवाएं तक खत्म हो गई हैं और उनकी भर्ती के लिए बेड खाली नहीं है। हालत यहां तक पहुंच गई है कि खुद इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच को इसके लिए स्वास्थ्य विभाग से जवाब-तलब करना पड़ा। लेकिन सवाल यह है कि आखिर समस्या इतनी भयावह क्यों हुई? चिकित्सा सेवाओं के लगातार आधुनिक होते जाने के बाद भी डेंगू से लोगों की मौतों में इजाफा क्यों हो रहा है? क्या इसके लिए केवल सरकार जिम्मेदार है या फिर जनता में जागरूकता का अभाव भी इसकी भयावहता के लिए जिम्मेदार है? क्या महामारी का रूप ले रहे डेंगू की रोकथाम को सरकार दूसरी रणनीति बनाएगी या इसे सीजनल बीमारी मानकर टरका देने की अपनी प्रवृत्ति जारी रखेगी? दरअसल, डेंगू एक मच्छरजनित बीमारी है और यदि साफ-सफाई पर ध्यान दिया जाए तो इसकी रोकथाम आसानी से की जा सकती है। लेकिन साफ सफाई की जिम्मेदारी उठाने वाला निगम पूरी तरह नाकाम रहा है। वह मच्छरों से निपटने के लिए पर्याप्त फागिंग तक नहीं करवा पा रहा है। लिहाजा स्थितियां भयावह हो जाती है। वहीं स्वास्थ्य विभाग इस रोग को लेकर समय-समय पर जागरूकता अभियान चलाकर इस पर नियंत्रण लगा सकता है लेकिन ऐसा नहीं किया जाता है। हैरत यह है कि खुद स्वास्थ्य विभाग अपनी कारगुजारी छिपाने की कोशिश कर रहा है। डेंगू से मौतों की संख्या छिपाने को लेकर हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने विभाग को फटकार तक लगाई है। कुल मिलाकर डेंगू से निपटने के लिए सरकार को न केवल अपने विभागों की कार्यप्रणाली को दुरुस्त करना होगा बल्कि इसके लिए एक कार्ययोजना बनाकर इस पर अमल भी करना सुनिश्चित करना होगा वरना स्थितियां इससे भी भयावह हो सकती हैं।

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