ट्रंप के भारत प्रेम के मायने

अमेरिकी राष्टपति पद के लिए आगामी आठ नवंबर को होने वाले चुनाव से पहले रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप ने वहां बसे भारतीयों को अपने पाले में लाने की तगड़ी पहल की है। वे हिंदू और हिंदुस्तान के कसीदे पढ़ रहे हैं। यह पहली बार था जब ट्रंप ने इस चुनावी मौसम में भारतीय-अमेरिकियों के समारोह में शिरकत की। कश्मीरी पंडितों और आतंकवाद से पीडि़त बांग्लादेशी हिंदुओं द्वारा आयोजित समारोह में ट्रंप ने कहा, मैं हिंदू और भारत का एक बड़ा प्रशंसक हूं। अगर मैं चुना जाता हूं तो भारतीय और हिंदू समुदाय को व्हाइट हाउस में एक सच्चा दोस्त मिल जाएगा।
सवाल ये है कि ट्रंप को अचानक से भारत और हिंदुओं का ख्याल कैसे आने लगा? वे भारतीय समुदाय की मेहनत और उद्यमिता की तारीफ क्यों करने लगे? क्यों कहने लगे कि हिंदुओं और भारतीय-अमेरिकियों की पीढिय़ों ने हमारे देश को मजबूत किया है? एक बात ये भी लगती है कि अमेरिका में बसे भारतीयों को लेकर किए गए सर्वेक्षणों से साफ लग रहा है कि वे ट्रंप की बजाय डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के हक में हैं। रुझानों से समझ आ रहा है कि हर तीन में से दो भारतीय हिलेरी के साथ जा सकते हैं।
इस सर्वे को किया है एशियन अमेरिकन वाय्सेज-2016 ने । इन्हीं रुझानों के बाद ट्रंप भारतीयों को मलाई बांटने का वादा कर रहे हैं। अमेरिका में 30 लाख भारतीय हैं। आप मानकर चलिए कि अगर हिलेरी क्लिंटन अगली अमेरिकी राष्टï्रपति बनीं तो वहां बसे भारतीयों को अहम पदों पर लिया जा सकता है। वर्तमान में अमेरिका के नई दिल्ली में राजदूत रिचर्ड राहुल वर्मा को भी कोई खास जिम्मेदारी क्लिंटन दे सकती हैं। वर्मा को बराक ओबामा का भी खास माना जाता है। बहरहाल, अमेरिकी चुनावों को लेकर जिस तरह से भारतीय दिलचस्पी ले रहे हैं उससे साफ है कि भारतीय संसार के किसी भी देश में जाएं, वे राजनीति से दूर नहीं जा पाते। अमेरिका से लेकर ब्रिटेन और कनाडा से लेकर केन्या तक की संसद में भारतीय सियासत कर रहे हैं। उन्हें वोटर बने रहना ही मंजूर नहीं है। वे चुनाव लड़ते हैं। जीत-हार उनके लिए अहम नहीं होती।
देखा जाए तो हम हिंदुस्तानी सात समंदर पार कमाने-खाने के लिए ही नहीं जाते। वहां पर जाकर हिंदुस्तानी सत्ता पर काबिज होने की भी चेष्टा करते हैं। अगर ये बात न होती तो 22 देशों की पार्लियामेंट में 182 सांसद न होते। वे बढ़-चढक़र चुनावी गतिविधियों में भाग लेते हैं। त्रिनिडाड टोबेगो, केन्या, मलेशिया, दक्षिण अफ्रीका, ग्याना, कनाडा, ब्रिटेन जैसे देशों की पार्लियामेंट में भारतीयों का होना तो समझ आता है, क्योंकि इन देशों में भारतीय लंबे समय से जाकर बस रहे हैं। पर आप हैरान होंगे ये जानकर कि फ्रांस, जर्मनी, पनामा, जांबिया, जिम्बाव्वे जैसे देशों की पार्लियामेंट भी भारतीय पहुंचे हुए हैं।
अगर लघु भारत यानी मॉरीशस की बात करें तो वहां पर दो भारतवंशी-पूर्व प्रधानमंत्री नवीनचंद्र रामगुलाम और वर्तमान प्रधानमंत्री अनिरुद्ध जगन्नाथ राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं। पिछले चुनाव के बाद रामगुलाम के स्थान पर पूर्व राष्टï्रपति अनिरुद्ध जगन्नाथ प्रधानमंत्री बने। रामगुलाम राष्टï्रपति पद के लिए चुनाव लडऩा चाहते थे, लेकिन उन्हें अपनी संसदीय सीट पर हार का मुंह देखना पड़ा। उनके पिता शिवसागर रामगुलाम की अगुवाई में मॉरीशस को आजादी मिली थी। शिवसागर रामगुलाम इस देश के प्रमुख और प्रधानमंत्री रहे।
एक बात और। भारतीय जब तक देश में रहते हैं तब तक तो जाति उनके जेहन में रहती है। वे उम्मीदवार की जाति के आधार पर वोट भी देते हैं, पर वे ब्रिटेन में या बाकी जगह इन बातों को नहीं देखते। मलेशिया के चोटी के भारतवंशी नेता और कैबिनेट मंत्री रहे सैम वेली ने एक बार इस लेखक से कहा था कि उनके देश में सभी दल भारतीयों को टिकट देते हैं। वैसे भारतीयों की एक पार्टी मलेशियन इंडियन कांग्रेस भी है। इसकी स्थापना 1946 में हुई थी। वहां के भारतवंशी अपने मन से वोट देते हैं। वे उम्मीदवार के वादों और इमेज के आधार पर वोट करते हैं। उन्हें उम्मीदवार की जाति से कोई मतलब नहीं होता। हां, दक्षिण अफ्रीका इस लिहाज से अपवाद हो सकता है।
उधर, भारतवंशी कुल मिलाकर नेल्सन मंडेला की पार्टी अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (एएनसी) के साथ ही रहते हैं। जूमा का संबंध भी इसी पार्टी से है। पिछले साल दक्षिण अफ्रीका में आम चुनाव हुए तो राष्टï्रपति जैकब जुमा का साथ खुलकर दे रहे थे नटाल के भारतीय। जूमा के लिए भारतीयों के वोट अहम थे, क्योंकि उनकी सीट पर भारतीयों की आबादी खासी है। पूर्वी अफ्रीकी देशों जैसे केन्या, युगांडा और तंजानिया में लंबे समय से भारतीय मूल के लोग संसद में पहुंच रहे हैं।
केन्या की संसद में कुछ समय पहले संजीव विरदी पहुंची हैं। वह सिख हैं। एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि उन्हें केन्या की सत्तासीन यूनाइटेड रिपब्लिकन पार्टी ने देश की संसद के लिए नोमिनेट किया। वह वहां पर एशियाई समुदाय के लिए आमतौर पर और भारतीय समाज के हितों के लिए लगातार संघर्षरत रहती हूं। वह पार्लियामेंट में मकरादा प्रांत की नुमाइंदगी करती हैं। ब्रिटेन के पिछले साल मई में हुए आम चुनाव में भारतीय मूल के रिकॉर्ड 10 सांसद चुने गए हैं जिनमे इंफोसिस के सह संस्थापक नारायणमूर्ति के दामाद ऋषि सुनाक भी शामिल हैं।
उस चुनाव में वर्ष 2010 में हुए चुनाव का वह रिकॉर्ड टूट गया था जिसमें भारतीय मूल के आठ उम्मीदवारों की जीत हुई थी। भारतीय मूल के इन सांसदों में लीसेस्टर पूर्व से निर्वाचित कीथ वाज (लेबर पार्टी), विट्हम से प्रीति पटेल ( कंजरवेटिव पार्टी) और नारायण मूर्ति के दामाद ऋषि सुनाक (कंजरवेटिव पार्टी) भी शामिल हैं। इनके अलावा भारतीय मूल के विजई उम्मीदवारों में ईलिग साउथहॉल से वीरेंद्र शर्मा (लेबर पार्टी), वालसाल साउथ सीट से वैलेरी वाज (लेबर पार्टी), रीडिग वेस्ट सीट से आलोक शर्मा (कंजरवेटिव पार्टी), कैंब्रिजशायर उत्तर-पूर्व सीट से शैलेष वारा (कंजरवेटिव पार्टी), फेयरहैम सीट से सुएला फर्नांडिस (कंजरवेटिव पार्टी), दक्षिण-पूर्व लंदन सीट से सीमा मल्होत्रा (लेबर पार्टी) और विगन सीट से लीसा नैंडी (लेबर पार्टी) ब्रिटिश संसद में पहुंचे।
पिछले ब्रिटेन के संसदीय चुनाव में ही गोवा मूल के लेबर पार्टी उम्मीदवार किथ वाज के लिए अभिषेक बच्चन वोट मांग रहे थे। वाज चुनाव जीते। अभिषेक बच्चन ब्रिटेन के शहर लेस्टर में चुनाव प्रचार कर रहे थे। 58 साल के कीथ वाज भारतीय मूल के सबसे लंबे समय से रहने वाले सांसद हैं। कीथ ब्रिटेन में भारतीय समुदाय के मुद्दों को भी संसद में उठाते रहे हैं। अमेरिका के पड़ोसी देश कनाडा में पिछले साल अक्टूबर में हुए संसद के चुनाव में भारतीय मूल के 19 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। बहरहाल अब एक बात साफ है कि चुनाव में कोई भी जीते, अमेरिका में बसे भारतीयों के हित सुरक्षित रहेंगे।

 

Pin It