जरूरी हैं साहित्य के नये प्रतिमान

आज जितना ज्यादा साहित्य लिखा जा रहा है, संभवत: इतना पहले कभी नहीं लिखा गया। भारत जैसे देश में इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रसार के रूप में देखा जाना चाहिए। पुराने समय में जिन समुदायों को साजिश के तहत पढऩे-लिखने से दूर रखा गया था, वे भी आज लेखन की दुनिया में खुद को मुखरता से अभिव्यक्त कर रहे हैं। संचार क्रांति ने लेखन की दुनिया में नये अवसर उपलब्ध कराये हैं। सोशल मीडिया ने हमें अभिव्यक्ति का एक व्यापक मंच दिया है। खास तौर पर वंचित समुदाय इसे अपनी आवाज का सशक्त माध्यम बना रहे हैं। नि:संदेह संचार क्रांति ने विचारों के साथ ही साहित्य के स्वरूप पर भी असर डाला है।
औपनिवेशिक गुलामी के दौर से अब तक हमारे देश की सामाजिक संरचना में व्यापक बदलाव आया है। उन दिनों जो लेखक और पाठक था, दोनों का संबंध खास वर्ग और वर्ण से ही था। या तो वह धनाढ्य था, या समाज का उच्च वर्ण। उच्च वर्ण का समाज अपनी सांस्कृतिक वापसी के नाम पर ‘आर्य’ मिथकों को पुनर्जीवित कर रहा था, उन्हें नया अर्थ देने की कोशिश कर रहा था। लेकिन, आज जब निचले कहे गये वर्णों के लोग खुद लिख रहे हैं, तो वैसे मिथकों पर सवाल भी उठ रहे हैं। आज ‘वाल्मीकि’ होने की बात नहीं ‘क्रौंच’ होने की बात की जा रही है। वाल्मीकि ने ‘मा निषाद’ कह कर कविता की धारा प्रस्फुटित की थी। आज का लेखक कहता है कि जिसको तीर लगी है, वह खुद अपनी बात कहेगा। सत्य को वही व्यक्त कर सकता है, जिसने उस जीवन को जिया है। यहीं से ही नये साहित्यिक प्रतिमानों की मांग खुले रूप में आने लगी है।
वैश्वीकरण के दबाव ने एक साथ कई प्रश्नों को धरातल से सतह पर ला दिया है। किसानों का जो मुद्ïदा धीरे-धीरे साहित्य और राजनीति दोनों जगहों से धूमिल होने लगा था, वह फिर से केंद्र पर आने लगा।
जमीन की वैश्विक लूट ने ‘जमीन’ को नया अर्थ दिया। अब जमीन के साथ ‘जल’ और ‘जंगल’ का मुद्ïदा भी जुड़ गया। इसके साथ ही जमीन पर अधिकार की लड़ाई के साथ जमीन बचाने की लड़ाई भी जुड़ गयी। उदारवादी नीतियों ने जनहित से जुड़े संवैधानिक प्रावधानों को संकुचित करना शुरू किया, तो फिर से लोकतंत्र के स्वरूप पर बहस होने लगी। इन सबके परिणामस्वरूप नक्सलबाड़ी आंदोलन पहले से ज्यादा मजबूत हुआ। विचार के क्षेत्र में ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ जैसी अवधारणा आयी। नये बनते ‘मेट्रो सिटी’ नये ‘मेंटल स्ट्रक्चर’ को जन्म दे रहे हैं।
आजादी के बाद शहरीकरण की प्रक्रिया के फलस्वरूप उभरते मध्य वर्ग ने जिस मुखरता से खुद को हिंदी में ‘नयी कविता’ और ‘नयी कहानी’ के रूप में अभिव्यक्त किया था, अब उसके ‘मैं’ का स्वरूप बदल गया। अब इसके समानांतर अस्मिता के स्वर के रूप में जिस ‘मैं’ का उदय हुआ, उसने ‘मैं’ के निजी अर्थ को खंडित कर उसे ‘सामाजिक’ अर्थ दिया। अस्मितावादी लेखक का ‘मैं’ उसके अपने पूरे समूह का ‘मैं’ है, और इस योजना के पीछे उसका वैचारिक आधार है, जो इतिहास, वर्तमान और भविष्य में अपने अस्तित्व की खोज करता है। नामवर सिंह ‘छायावाद’ में जो अर्थ ‘मैं शैली’ के लिए लगाते हैं, उसका वही अर्थ आज का अस्मितामूलक साहित्य ग्रहण नहीं करता है। समाज के विभिन्न हिस्सों से हो रही अभिव्यक्ति साहित्य के अब तक के प्रतिमानों को अपर्याप्त साबित कर रही है। आज साहित्य में किसानों के सवाल हैं, दलित, आदिवासी, स्त्री, अल्पसंख्यक और अन्य वंचितों के सवाल हैं। एक समय था जब माक्र्सवादी सौंदर्यबोध के अधीन इन विषयों को समझने का प्रयास किया जाता था। वर्ग संघर्ष पर आधारित मूल्य साहित्य में स्वीकृत था, लेकिन, आज वंचित समुदाय खुद अपनी वैचारिकी और नये सौंदर्यबोध की खोज कर रहे हैं। दलित लेखन अंबेडकर को अपनी वैचारिकी का आधार बना कर वर्ण-व्यवस्था से जुड़े मूल्यों पर तीखा प्रहार कर रहा है। स्त्री लेखन सामंती पुरुषवादी सोच और संस्था के विरुद्ध आवाज उठा रहा है। आदिवासी लेखन पूंजीवादी सामाजिक ढांचे और कथित सभ्यता पर ही सवाल खड़ा कर सहजीविता को अपना वैचारिक आधार बना रहा है। वहीं अस्मितावादी लेखन से इतर लेखन में वैश्वीकरण के रूप में नये साम्राज्यवादी शक्तियों का प्रतिरोध मौजूद है। गौरतलब है कि इतने सारे लेखन एक ही समय में हो रहे हैं, लेकिन अभी ये एक मंच पर एक साथ उपस्थित नहीं हैं। हर कोई अपना अलग-अलग मजबूत पक्ष तैयार कर रहा है। ऐसे में एक सामान्य पाठक के लिए आलोचना का प्रतिमान क्या हो सकता है? कैसे विभिन्न वैचारिक पृष्ठभूमि में रची रचनाओं का पाठ किया जाये? क्या सभी रचनाओं के लिए एक ही तरह का प्रतिमान होगा? यह सवाल नये प्रतिमानों की जरूरत से जुड़ा है।
केवल ‘दशकों’ के आधार पर साहित्य को नहीं समझा जा सकता है। हिंदी आलोचना को इस पर गंभीरता से विचार करना होगा। आज आलोचना में या तो केवल गैर-अस्मितावादी साहित्य पर बात हो रही है या केवल अस्मिता पर। इस तरह तो साहित्य को उसके संपूर्ण सत्य के साथ नहीं समझा जा सकता है और न ही समाज को इससे कोई दृष्टि मिल सकती है।
भारतीय संदर्भ में लिखी गयी रचनाओं को समझने का अपना भारतीय प्रतिमान होना चाहिए। पश्चिम की उत्तर आधुनिकता, या उत्तर संरचना की बातें पाठ को समझने में सहायक तो हो सकती हैं, लेकिन यह देशी परिस्थितियों में उपजी रचना के रचनाकार की मनोवैज्ञानिक संरचना को समझने में पूरी तरह समर्थ नहीं है।
आज ‘अयोध्या और मगहर के बीच’ के रूपक को पुराने मिथकीय संदर्भों से अलग रूप में देखना होगा। ‘बारिश मेरा घर है ’ या ‘विज्ञप्ति भर बारिश’ ‘नयी खेती’ की बात करती है। युवा लेखकों के ‘दिन बनने का क्रम’ वैश्वीकरण के दौर से पहले की रचनाओं से अलग है। आज ‘अंगार’ की जगह ‘अंगोर’ में सहजीविता की मांग हो रही है।
‘ग्लोबल गांव के देवता’ या ‘मारंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ की औपन्यासिक संरचना की सिर्फ सीमित परिधि नहीं है। आज की रचनाओं के विश्वबोध को केवल माक्र्सवाद, आंबेडकरवाद या अन्य किसी वाद के विभाजित रूप में देखना मुक्तिकामी संघर्ष के साझेपन से साहित्य को निरपेक्ष बनाना होगा।

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